भाग 1
शाम का आसमान हल्के सुनहरे रंग में डूब रहा था। हवेली के पुराने बरामदे में जलती पीली लाइटें उस अतीत को रोशन कर रही थीं, जो कभी खुशियों से भरा था और आज सिर्फ़ साज़िशों की परछाइयों में जकड़ा हुआ था।
आरव मल्होत्रा—शहर का सबसे ताक़तवर बिज़नेसमैन, जिसकी एक नज़र लोगों को ऊपर उठा देती थी और एक फ़ैसला उन्हें मिट्टी में मिला देता था—आज पहली बार अपने ही दिल से हार रहा था।
उसके सामने खड़ी थी
मीरा सिद्दीकी।
वही मीरा…
जिसे उसने कभी अपनी रूह से भी ज़्यादा चाहा था।
और वही मीरा…
जिसके नाम से अब उसके सीने में नफ़रत आग बनकर जलती थी।
मीरा ने हल्का गुलाबी शॉल ओढ़ रखा था। बालों में छोटे-छोटे फूल, जैसे उसने जानबूझकर बीते कल को अपने साथ बाँध लिया हो। उसकी आँखों में डर था, मगर उससे भी ज़्यादा कुछ और—अडिग मोहब्बत।
आरव ने एक क़दम आगे बढ़कर कहा,
“तुम्हें यहाँ आने की हिम्मत कैसे हुई?”
मीरा की आवाज़ काँप गई,
“क्योंकि ये जगह कभी मेरी भी थी… और तुम भी।”
एक पल को हवेली खामोश हो गई।
पाँच साल पहले…
मीरा उस दिन कॉलेज की लाइब्रेरी में अकेली बैठी थी। बाहर बारिश हो रही थी और किताबों की खुशबू में भीगी हवा किसी जादू की तरह महसूस हो रही थी।
“ये किताब तुम्हारी है?”
मीरा ने सिर उठाया।
सामने खड़ा था आरव—सफेद शर्ट, स्लीव्स मुड़ी हुईं, आँखों में वो गुरूर जो अक्सर अमीर लड़कों में दिखता है… मगर उसमें कुछ अलग था। एक बेचैन सी सच्चाई।
“हाँ,” मीरा ने धीरे से कहा।
आरव मुस्कराया।
“तो फिर मैं यहीं बैठ सकता हूँ?”
यहीं से शुरू हुई थी वो कहानी…
जो मोहब्बत से गुनाह तक पहुँची।
दिन बीतते गए। आरव का गुरूर मीरा की सादगी में घुलने लगा। मीरा की खामोशी आरव की बेचैनी को सुकून देने लगी।
एक दिन आरव ने कहा,
“मीरा, मैं तुम्हारे बिना साँस नहीं ले सकता।”
मीरा ने जवाब नहीं दिया…
सिर्फ़ उसकी आँखों में देखा।
और वही जवाब था।
वो रात… जिसने सब बदल दिया
हवेली में शादी की तैयारियाँ थीं। आरव के पिता—विक्रम मल्होत्रा, शहर के सबसे बड़े उद्योगपति—मीरा को कभी स्वीकार नहीं कर सकते थे।
“एक मामूली लड़की हमारी बहू नहीं बन सकती,”
विक्रम ने ठंडे स्वर में कहा।
आरव चीखा,
“वो मामूली नहीं है! वो मेरी ज़िंदगी है!”
मीरा बाहर खड़ी सब सुन रही थी।
उस रात मीरा अचानक गायब हो गई।
और अगली सुबह…
आरव के पिता की हत्या हो चुकी थी।
हर सबूत मीरा के ख़िलाफ़ था।
वर्तमान में…
“तुमने मेरे पिता को मारा था,”
आरव की आवाज़ ज़हर बन चुकी थी।
मीरा रो पड़ी।
“अगर मैंने मारा होता… तो आज ज़िंदा रहने की हिम्मत नहीं होती।”
आरव ने उसका हाथ पकड़ा।
ज़ोर से।
“मैंने तुम्हें हर दिन मरा हुआ माना है, मीरा। और आज तुम लौट आई हो… क्यों?”
मीरा ने उसकी आँखों में देखा।
“क्योंकि सच्चाई अब और नहीं दबाई जा सकती।”
उसने अपना दुपट्टा थोड़ा हटाया।
उसकी कलाई पर एक पुराना निशान था—जलने का।
“जिस रात तुम्हारे पिता मरे… उसी रात मुझे मारने की कोशिश हुई थी।”
आरव का दिल धक से रह गया।
एक अधूरा सच
मीरा ने बताया कि कैसे उसे हवेली से ज़बरदस्ती बाहर फेंक दिया गया था। कैसे किसी ने उसके हाथ में चाकू थमाकर सबूत बनाए। कैसे उसने पाँच साल ज़िंदा रहकर सिर्फ़ एक ही चीज़ सँजोकर रखी—आरव का प्यार।
“मैं भागी नहीं थी, आरव,”
मीरा ने कहा।
“मुझे भगाया गया था।”
आरव की आँखें भर आईं।
उसने धीरे से मीरा को अपनी बाहों में खींच लिया।
पहली बार पाँच साल बाद…
दो टूटे दिल एक-दूसरे से टकराए।
उनके होंठ एक-दूसरे के बेहद क़रीब थे।
वही पल—जो इमेज में क़ैद है।
मगर इस बार मोहब्बत आसान नहीं थी।
अंतिम पंक्तियाँ (भाग 1 का क्लाइमैक्स)
आरव ने मीरा के माथे से माथा लगाकर कहा—
“अगर तुम बेगुनाह हो…
तो ये मोहब्बत फिर से जिएगी।”
और फिर उसकी आवाज़ बदल गई—
“और अगर तुमने मुझे धोखा दिया…
तो यही मोहब्बत तुम्हारी सबसे बड़ी सज़ा बनेगी।”
मीरा ने आँखें बंद कीं।
क्योंकि वो जानती थी—
सच सामने आने वाला था…
और ये कहानी अभी शुरू हुई थी।