The decade of dry bread in Hindi Fiction Stories by DrAnamika books and stories PDF | सूखी रोटियों का दशक

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सूखी रोटियों का दशक

सूखी रोटियों का दशक
1
1991 की गर्मियों में जब गाँव के कुएँ सूखने लगे, तब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि सिर्फ पानी नहीं, आने वाले सालों में आदमी की उम्मीद भी सूख जाएगी।
बिहार के उस छोटे से गाँव—हरिहरपुर—में रामसहाय रहता था। उम्र कोई चालीस के आसपास, पर चेहरे पर बुज़ुर्गों जैसी थकान।
उसके पास डेढ़ बीघा ज़मीन थी—जो काग़ज़ में उसकी थी, पर पेट के काम नहीं आती थी।
घर में पत्नी सरस्वती, बूढ़ी माँ और दो बच्चे—गुड्डी और मोहन।
उस दिन सरस्वती ने चूल्हा नहीं जलाया।
“आज भी?” माँ ने पूछा।
सरस्वती ने सिर झुका लिया।
“कल से अनाज नहीं है।”
रामसहाय बाहर आँगन में बैठ गया।
पुरुषों की चुप्पी अक्सर भूख से भारी होती है।
2
1990 का दशक गाँव के लिए अजीब था।
रेडियो पर “नए सुधार”, “बाज़ार”, “विकास” जैसे शब्द गूँजते थे,
पर हरिहरपुर में उनका मतलब सिर्फ इतना था—
काम कम, दाम ज़्यादा।
खेतों में पहले जो सौ दिन का काम मिलता था, वह अब तीस में सिमट गया था।
ठेकेदार बाहर के मज़दूर लाने लगे—सस्ते, बेआवाज़।
रामसहाय ने शहर जाने की सोची।
माँ ने कहा,
“शहर पेट नहीं भरता, बेटा।”
रामसहाय बोला,
“गाँव भी अब नहीं भरता, अम्मा।”
3
पटना की झुग्गी बस्ती में रामसहाय ने पहली रात बिताई।
चारों तरफ़ पन्नी, धुआँ, पेशाब की गंध और भूख।
काम मिला—ईंट ढोने का।
दस घंटे की मज़दूरी—पच्चीस रुपये।
शाम को उसने दो सूखी रोटियाँ खरीदीं।
खाते समय उसे बच्चों का चेहरा दिखा—
और रोटी गले में अटक गई।
4
गाँव में सरस्वती ने बच्चों को समझाना सीख लिया था।
“आज उपवास है।”
गुड्डी बोली,
“माँ, उपवास भगवान के लिए होता है न?”
सरस्वती ने कहा,
“हाँ।”
वह यह नहीं बता सकी कि गरीबी में
हर दिन भगवान के नाम पर ही काटना पड़ता है।
मोहन स्कूल नहीं गया।
मास्टर ने कहा था—
“फ़ीस नहीं है तो पढ़ाई भी नहीं।”
भूख सिर्फ पेट नहीं खाती,
वह भविष्य भी खा जाती है।
5
1993 में अकाल जैसी स्थिति बनी।
सरकारी गोदामों में अनाज था,
पर गाँव तक पहुँचते-पहुँचते गायब हो जाता।
पंचायत ने सूची बनाई—
पर उसमें वही नाम थे
जिनके घर पहले से भरे थे।
रामसहाय का नाम नहीं था।
सरस्वती ने पहली बार महुआ बीनकर बेचा।
उस पैसे से नमक और चावल लायी।
माँ ने कहा,
“नमक ज़्यादा डाल देना—भूख कम लगेगी।”
6
एक दिन गाँव में अफ़वाह फैली—
“फलाँ गाँव में एक औरत भूख से मर गई।”
लोग बोले—
“झूठ होगा।”
भूख पर विश्वास करना
हमारी आदत में नहीं है।
पर अगले महीने हरिहरपुर में भी एक बूढ़ा मर गया।
पोस्टमार्टम में लिखा गया—
“कमज़ोरी।”
भूख का कोई कॉलम नहीं होता।
7
1995 में रामसहाय लौट आया।
शहर ने उसे बीमार और चुप लौटा दिया था।
उसने बच्चों को देखा—
मोहन की हड्डियाँ उभर आई थीं,
गुड्डी की आँखों में चमक नहीं थी।
सरस्वती ने कहा,
“अब शहर मत जाना।”
रामसहाय बोला,
“तो क्या करें?”
दोनों के पास कोई जवाब नहीं था।
8
उस साल सूखा पड़ा।
खेतों में दरारें थीं—
जैसे ज़मीन भी शिकायत कर रही हो।
एक रात रामसहाय ने सुना—
मोहन नींद में बुदबुदा रहा था,
“माँ, रोटी…”
वह बाहर निकल गया।
आदमी जब रोता है,
तो अंधेरे की तलाश करता है।
9
सरस्वती ने अपने गहने बेच दिए
दो चूड़ियाँ और नथ।
उस पैसे से अनाज आया।
घर में पहली बार महीनों बाद चूल्हा जला।
माँ ने कहा,
“आज त्योहार है क्या?”
सरस्वती मुस्कराई।
भूखे घर में
रोटी ही त्योहार होती है।
10
1997 में सरकार ने काम योजना शुरू की।
रामसहाय को नाला खुदाई का काम मिला।
दस दिन में मज़दूरी मिली—
सीधे हाथ में, बिना काट-छाँट।
उस रात घर में दाल बनी।
बच्चों ने पूछा,
“माँ, रोज़ बनेगी?”
सरस्वती ने कहा,
“देखेंगे।”
गरीबी में भविष्य
हमेशा अनिश्चित काल में होता है।
11
1998 आते-आते हालात थोड़े बदले।
बहुत अच्छे नहीं—बस इतने कि
भूख रोज़ न आए।
रामसहाय अब भी गरीब था,
पर पूरी तरह बेबस नहीं।
उसने मोहन को फिर स्कूल भेजा।
मास्टर ने इस बार कुछ नहीं कहा।

डॉ अनामिका-