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विद्यापीठ पास होने के कारण आकाशवाणी के निदेशक का विद्यापीठ के हिन्दी-विभाग में आना-जाना होने लगा और गुजरात-वैभव के द्फ़्तर में भी ! जहाँ हिन्दी-भाषी साहित्यकारों का खूब स्वागत-सत्कार किया जाता | वे ऐसे लोगों को जोड़ने लगे जिनकी साहित्य में रुचि थी |हर सप्ताह उनका अनुरोध रहता कि संस्था का कोई न कोई सदस्य अपने घर पर गोष्ठी रखे लेकिन सबके लिए यह संभव न हो पाता, वो नाराज़ हो उठते ;
"अनामिका जी ! आपको मैं स्वयं फ़ोन करता हूँ फिर भी आप नहीं आतीं तो आपको फ़ोन करना बंद कर दूँगा ---"एक दिन वे सबके सामने गोष्ठी में बोले |
एक मिनिट को अनामिका झिझकी, आख़िर आकाशवाणी के निदेशक थे वे , कुर्सी अपने नीचे जाने कितनों को शरण देती है | लेकिन अनामिका प्रत्युत्तर में बोल उठी ;
"जी, बिलकुल, जैसा आप ठीक समझें ----"
वो खिसिया गए, पूछा;
"आतीं क्यों नहीं आप --?"
"जी, हरेक की परिस्थिति अलग-अलग होती है, ज़रुरी तो नहीं कि मैं अपने परिवार से समय निकाल सकूँ --फिर कहीं कुछ ऐसा मिलता हो जिसको पाकर कुछ मन प्रसन्न तो हो ----"अनामिका को अच्छी तरह याद था जब एक आकाशवाणी की गोष्ठी में उसको निमंत्रण मिला था, साथ ही दो/तीन और कवियों को भी आमंत्रित किया गया था, संचालन उसे करना था | अचानक उन कवियों में से किसी बैंक से पधारा युवा हिन्दी अधिकारी बोला था ;
“मैंने तो आज तक कोई कविता ही नहीं लिखी, पता नहीं मनुज जी ने मुझे क्यों बुलाया ?”
अब क्या पता भाई क्यों बुलाया ? बुलाने वाला जाने या आने वाला जाने –इसीलिए अनामिका को निदेशक महोदय पर ख़ासी चिढ़ हो आई थी | ख़ैर, ठीक-ठाक संचालन ने कार्यक्रम तो ठीक ही कर दिया था लेकिन अनामिका के मन में प्रश्न उगा था कि ऐसे खानापूरी करने वाले कार्यक्रमों का कितना महत्व ?उसने निदेशक महोदय से इस बात का ज़िक्र भी पूरे ज़ोर-शोर से किया था | स्वाभाविक था, वे चिढ़ गए थे | ख़ैर, उनके फ़ोन भी आते रहे, वह अपनी सहूलियत के अनुसार जाती भी रही और कार्यक्रम चलते भी रहे |यह उन्हीं दिनों की बातें हैं जब लंबी सुस्त छुट्टियों यानि विवाह के व बच्चों के जन्म के ‘इंटरवल’ के बाद अनामिका के दिमाग में फिर से शिक्षा का भूत सवार हुआ था |
उन्हीं दिनों अनामिका को आकाशवाणी में एक नया चेहरा दिखा, बिल्कुल प्रभावहीन व्यक्तित्व का वह व्यक्ति उसके पास आया |
“आप ही अनामिका जी हैं ?”
“जी –कहिए ---“
“आइ एम ----न्यू हिन्दी ऑफ़िसर—“उसने अपना क्या नाम बताया, अनामिका को याद नहीं है किन्तु उसे उस बंदे का व्यवहार कुछ अजीब सा लगा | उसने प्रश्नवाची दृष्टि से उसे देखा |
अनामिका बाहर निकलने के लिए आकाशवाणी के गेट की ओर बढ़ ही रही थी | गेट के पास ही वहाँ की टेलीफ़ोन ऑपरेटर का छोटा कमरा था जिसकी खिड़की में बैठी वह मुस्कुरा रही थी |
“ एक कप कॉफ़ी चलेगी ?”वह उससे पूछ रहा था | अनामिका की दृष्टि टेलीफ़ोन ऑपरेटर की खिड़की में से झाँकती दो आँखों पर पड़ी जो उसे संकेत से मना कर रही थी |
“जी, धन्यवाद मैं अभी विविध भारती से चाय पीकर आई हूँ –“वह आगे चल दी |
कमाल का बंदा है !’तू कौन, मैं खाँमाखाँ ! न जान, न पहचान !
“एक कप कॉफ़ी ही तो ---“
“थैंक्यू---“वह आगे बढ़ गई |
अजीब सा ही लगा उसे वह बंदा, उसने अपना सिर झटका और ऑटो की ओर बढ़ गई |
इस बार कई दिनों से उसके पास आकाशवाणी का कोई संदेश नहीं आया था, कई दिन हो गए थे उधर से निकले हुए | एक घनी बरसात के दिन अचानक दरवाज़े पर घण्टी बजी |
“मम्मा !आपसे कोई मिलने आया है ---“दृष्टि ने अनामिका को पुकारा |
अनामिका ने देखा, वही आकाशवाणी वाला आदमी था |
“आप ?कैसे ?” अनामिका बौखला गई | उस दिन मौसम भी कुछ गीला सा था, रात घिरने लगी थी | विवेक भी शहर से बाहर थे |
“दरसल, मैं इधर से गुज़र रहा था, ज़ोर से बारिश आ गई | तुरंत आपका ध्यान आया, सोचा एक कप चाय तो पिला ही देंगी---“ अजीब इंसान था !
साधना बहन से बात होने पर अनामिका ने उस दिन की बात जब उनसे साझा की, उन्होंने स्पष्ट कहा था ;
“हाँ, वो भाई कानपुर से ‘एढोक बेसिस’पर आए हैं | बिलकुल लिफ़्ट मत दीजिएगा---“
उसे पहले ही वह कोई सनकी लग रहा था, अब उसे अपने सामने देखकर वह आश्चर्यचकित थी |
“आइए न अंकल, बाहर भीग रहे हैं आप ---“दृष्टांत जी ने अपनी ‘अतिथि देवो भव’की तहज़ीब दिखा दी | जब तक अनामिका कुछ कहती, वह बंदा गीले जूतों समेत अंदर प्रवेश कर चुका था |
“आप गीले हैं, प्लीज़ डाइनिंग चेयर पर बैठ जाइए –“अनामिका को बेमन से कहना पड़ा |
बच्चों से कहकर वह चाय बनाने चली गई, चाय पिलाकर टरका दे उसे, सिर पड़ा है तो | उस दिन रामी भी जल्दी चली गई थी |
‘यह दृष्टांत भी ---‘बड़बड़ करते हुए उसने एक प्याला चाय बनाई और कुछ नाश्ते के साथ उन महाशय के लिए चाय अंदर ले चली | तब तक दृष्टांत और दृष्टि उससे ऐसे घुलमिल चुके थे मानो वह इस परिवार का कितना पुराना मित्र हो !
“आप चाहें तो मैं आकाशवाणी में आपको नौकरी दिलवा सकता हूँ ---“ चाय सुड़कते हुए उसने कहा |
“जी, नहीं मेरी कोई इच्छा नहीं है ---“चाय पीए और जान छोड़े |
“बहुत अच्छी चाय है, ---आपका पता मुझे आकाशवाणी से मिल गया था –“
वह बोलता रहा और अनामिका प्रतीक्षा में रही कि बंदा उठे तो बच्चों को खाना दे |
“थैंक्यू, चाय के लिए –“ उसने बाहर की ओर पाँव बढ़ाए और तेज़ बौछार देखकर फिर अंदर कर लिए |
“मैं –दरअसल बहुत दूर रहता हूँ, साबरमती की तरफ़, वहाँ जाना कैसे हो पाएगा ?”कुछ रुककर बोला;
‘रात काटने को कोई जगह मिल जाती तो ---!”
अनामिका का माथा ठनका ---
“माफ़ करिए, मैं आपकी कोई सहायता नहीं कर सकती –आप प्लीज़ ---“वह दो क़दम आगे बढ़ा ही था कि अनामिका ने आगे बढ़कर ज़ोर से दरवाज़ा बंद कर लिया |
बच्चे उसका मुँह देख रहे थे | उन्होंने कभी भी अपनी माँ को इस रूप में नहीं देखा था |बाद में दृष्टांत जी की खूब खबर ली गई और बच्चों को समझाया गया कि किसी भी अजनबी को घर में घुसाने की ज़रूरत नहीं है |बाद में साधना बहन से पता चला था कि वह बंदा न जाने कितने लोगों के साथ ऐसा व्यवहार कर चुका था |
अब तो बिलकुल पट्टी चिपक गई दोनों भाई-बहनों के दिमाग में ! कुछ दिनों बाद विवेक के एक चचेरे भाई आए|समय की बात है दोनों भाई-बहन उस समय घर में अकेले थे |उस घर में कमरे की सैटिंग कुछ ऐसी थी कि दोनों भाई-बहन जब डाइनिंग-टेबल पर चढ़कर अपने पाँव लटकाकर बैठते तो नीचे की ओर जाती हुई सीढ़ियों की ओर पाँव होते और दोनों टेबल पर बैठ, जंगले में से पावों को निकालकर हिलाते हुए बैठे रहते | तीन मंज़िल का मकान था, स्वाभाविक था ऊपर की मंज़िल पर जाने वाले भी उन्हीं सीढ़ियों से ऊपर जाते थे |
एक दिन विवेक के चचेरे भाई विनय शहर में किसी काम से आए, घर पहुँचे | अंदर डाइनिग-टेबल पर बैठे-बैठे ही इंक्वायरी कमीशन बैठ गया | कौन ? कहाँ ?कैसे? किससे ? सारे प्रश्नोत्तर हो गए | बेचारे विनय बच्चों के प्रश्नों के उत्तर देते –देते पस्त हो गए लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला | इन बच्चों ने कभी उन्हें देखा ही नहीं था सो, दरवाज़ा नहीं खोलना है कि डोज़ अभी काम कर रही थी | अभी डोज़ को ज़्यादा दिन नहीं हुए थे सो, प्रभाव बाकी था |
थक-हारकर विनय बेचारे सीढ़ियों से नीचे उतर ही रहे थे कि विवेक व अनामिका सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मिल गए | विवेक भाई को देखकर खुश हो गए लेकिन उनसे आना भी पहली बार मिल रही थी | ऊपर आकर विनय ने पूरी कहानी सुनाई तो आना ने आँखें तरेरीं |
“आपने ही तो उस दिन सिखाया था ---“दृष्टि को बड़ा खराब लगा | अपने आप हमें सिखाती हैं, फिर दूसरे के सामने आँखें तरेरती हैं !
“तो क्या ---उस दिन कितना लंबा लेक्चर दिया था मम्मी ने !” दृष्टांत कैसे पीछे रहता, उसे भी किसी अजनबी के सामने माँ का आँखें दिखाना अच्छा नहीं लगा था !यानि दोनों बच्चे माँ से नाराज़ थे |
विनय इस बात पर खूब हँसे और दोनों बच्चों का माँ से समझौता करवाया |