शादी को दो दिन बीत चुके थे…
लेकिन मयूर सर के मन में जैसे कोई बात ठहरी हुई थी…
एक ऐसी बात, जो वर्षों से दिल में थी… पर शब्दों तक कभी पहुँच ही नहीं पाई।
कई बार उन्होंने फोन उठाया…
कई बार वापस रख दिया…
आख़िरकार उन्होंने हिम्मत की और रुशाली को फोन कर दिया।
फोन की घंटी बजी…
रुशाली ने स्क्रीन देखी…
दिल की धड़कन जैसे एक पल को ठहर गई।
उसने फोन उठाया—
“हेलो…”
मयूर सर की आवाज़ हमेशा की तरह धीमी, सधी हुई और सम्मान से भरी थी—
“हेलो रुशाली… अगर तुम व्यस्त न हो… तो क्या आज मुझसे मिल सकती हो…? कुछ बातें करनी थीं… बहुत दिनों से मन में हैं…”
उनकी आवाज़ में आग्रह था… लेकिन दबाव नहीं…
स्नेह था… लेकिन मर्यादा भी।
रुशाली ने धीरे से कहा—
“हाँ… कहाँ मिलना है…?”
शाम को दोनों एक शांत झील के किनारे मिले।
शाम ढल रही थी।
झील के किनारे हल्की हवा बह रही थी।
आसमान में सुनहरी रोशनी ऐसे घुल रही थी…
जैसे दिन भी किसी को विदा कहने से पहले ठहर गया हो।
रुशाली वहाँ पहुँची तो मयूर सर पहले से खड़े थे।
जैसे ही वह पास आई… मयूर सर ने हल्का सा सिर झुकाकर कहा—
“कैसी हो… रुशाली…?”
वो हमेशा की तरह उसका नाम पूरे सम्मान से लेते थे…
जैसे नाम नहीं… कोई अनमोल चीज़ हो। और उनकी आवाज़ में वही पुराना अपनापन था…
और नया सम्मान भी।
कुछ नाम
जब सम्मान से पुकारे जाते हैं
तो दिल में फूल-से खिल उठते हैं…
रुशाली ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“ठीक हूँ…”
दोनों कुछ पल चुप रहे…
लेकिन इस खामोशी में झिझक कम… अपनापन ज़्यादा था।
मयूर सर ने धीरे से कहा—
“रुशाली… मैं तुमसे एक बात पूछूँ…? अगर तुम्हें बुरा न लगे…”
“पूछिए…”
“इन पाँच सालों में… तुम खुश थीं…?”
सवाल साधारण था…
पर आवाज़ में इतनी सच्चाई थी कि रुशाली की आँखें भर आईं।
उसने झील कीओर देखते हुए कहा—
““जी रही थी…
पर कुछ लोग… दिल में ऐसे बस जाते हैं
कि उनके बिना खुश होना… सीखा नहीं जाता…”
मयूर सर चुप हो गए।
फिर बहुत धीमे बोले—
“जब तुम दूर गई… तब समझ आया… कि तुम मेरे लिए कितनी खास हो…
तुम्हारी हँसी… तुम्हारी बातें… तुम्हारा बेवजह मुस्कुराना…
और हाँ… मेरा काम करते समय मुझे परेशान करना भी…”
वो हल्का सा मुस्कुराए…
लेकिन आँखों में नमी थी।
“अस्पताल वही था… जिंदगी वही थी…
पर उसमें रौनक नहीं रही थी…”
रुशाली की पलकों पर आँसू आ गए…
लेकिन उसने उन्हें गिरने नहीं दिया।
कुछ देर बाद मयूर सर ने बहुत संकोच से पूछा—
“रुशाली… क्या इन वर्षों में… तुम्हारी जिंदगी में… कोई आया…?”
रुशाली ने सच छिपाया नहीं—
“एक था… ट्रेनिंग के समय…
वो मुझे पसंद करता था…
लेकिन मैंने मना कर दिया…”
मयूर सर ने धीरे से पूछा—
“क्यों…?”
रुशाली ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा—
“क्योंकि मेरे दिल में पहले से कोई था…
और उसके रहते किसी और के साथ अन्याय नहीं कर सकती थी…”
मयूर सर ने गहरी साँस ली।
उनकी आँखों में एक अजीब सा सुकून उतर आया।
कुछ पल बाद रुशाली ने पूछा—
“और आपकी जिंदगी में… कोई आया…?”
मयूर सर ने शांत स्वर में कहा—
“हाँ… एक असिस्टेंट थी…
बहुत अच्छी लड़की थी… और शायद मुझे पसंद भी करने लगी थी…
लेकिन मैंने उसे साफ कह दिया… कि मैं उसका सम्मान करता हूँ…
पर मेरे दिल में कोई और है…”
रुशाली की आवाज़ बहुत धीमी हो गई—
“कौन…?”
मयूर सर ने पहली बार बिना झिझक उसकी आँखों में देखा—
“तुम… रुशाली…”
कुछ स्वीकार
देर से आते हैं
पर जब आते हैं
तो उम्र भर का सुकून दे जाते हैं…
हवा जैसे थम गई।
रुशाली की आँखों से आँसू बह निकले।
मयूर सर ने उन्हें देखा… लेकिन बिना पूछे हाथ नहीं बढ़ाया।
बस धीरे से बोले—
“अगर अनुमति हो… तो क्या मैं… तुम्हारे आँसू पोंछ सकता हूँ…?”
रुशाली ने हल्का सा सिर हिला दिया।
मयूर सर ने बहुत सावधानी से… बहुत आदर से… उसके आँसू पोंछे।
सच्चा प्रेम
छूने से पहले
अनुमति माँगता है…
और निभाने से पहले
सम्मान देना सीखता है…
कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे।
फिर मयूर सर ने धीमे स्वर में कहा—
“रुशाली… मैंने कभी तुमसे नहीं कहा कि मैं तुम्हे चाहता हूँ…
क्योंकि उस समय मुझे लगा… तुम्हारे सपने मेरी चाहत से बड़े हैं…और मुझे मेरे परिवार की ख्वाहिश का ख्याल रखना था!
मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से तुम रुक जाओ… मैं चाहता था… तुम अपने सपनों की ऊँचाई छुओ।
मुझे डर था… कहीं मेरी चाहत तुम्हारी उड़ान को छोटा न कर दे…”
उन्होंने आगे कहा—
“पर सच यह है… कि मैं तब भी तुम्हे चाहता था…
और आज भी चाहता हूँ…
और शायद… जीवन भर चाहता रहूँगा…”
रुशाली की आवाज़ काँप गई—
““मैं उड़ तो गई…
पर हर ऊँचाई पर नीचे देखा…
तो आप ही आप दिखे…”
रात उतर रही थी…
और पानी में शहर की रोशनी झिलमिला रही थी।
दोनों मुस्कुरा दिए…
जैसे पहली बार एक-दूसरे को पूरी तरह समझ पाए हों।
कुछ देर बाद मयूर सर ने बहुत धीरे… बहुत सच्चाई से कहा—
“रुशाली… आज मैं तुम्हें रोकना नहीं चाहता…
ना ही बाँधना चाहता हूँ…
बस एक प्रस्ताव रखना चाहता हूँ…”
अगर तुम्हें लगे कि मैं इस योग्य हूँ…
अगर तुम्हें लगे कि मैं तुम्हारा सम्मान जीवन भर कर सकूंगा… तुम्हारी खुशी… और तुम्हारे सपनों को हमेशा अपने से ऊपर रख सकूँगा…
तो क्या तुम… मेरे साथ… अपना जीवन बिताना चाहोगी…? क्या तुम मेरी जीवनसाथी बनोगी...?”
कोई घुटनों पर बैठना नहीं…
कोई दिखावा नहीं…
बस सच्चाई।
रुशाली ने उनकी आँखों में देखा…
वहाँ कोई जल्दबाज़ी नहीं थी…
सिर्फ सच्चा प्रेम… और गहरा सम्मान था।
उसने धीरे से कहा—
“हाँ… मयूर सर…”
बस एक शब्द…
लेकिन उसमें पाँच साल की प्रतीक्षा थी… और जीवन भर का भरोसा भी।
मयूर की आँखों में राहत उतर आई।
उन्होंने बस इतना कहा—
“धन्यवाद… रुशाली…
मेरे प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए…”
रुशाली मुस्कुरा दी—
हवा थोड़ी ठंडी हो गई थी…
पर उनके बीच एक नई गर्माहट जन्म ले चुकी थी।
कुछ रिश्ते
वक्त से नहीं बनते…
इंतज़ार से बनते हैं…
और जो इंतज़ार से बनें
वो अक्सर उम्र भर चलते हैं…
रात गहराने लगी थी…
लेकिन दोनों के दिल में एक नई सुबह उतर चुकी थी…
उस रात जब दोनों अलग-अलग रास्तों से अपने घर लौटे…
आसमान में चाँद पूरा था…
जैसे बरसों बाद दो
मयूर सर खिड़की के पास खड़े देर तक उसी मुस्कान को याद करते रहे…
और उधर रुशाली तकिये में चेहरा छुपाकर मुस्कुराती रही…
दोनों के दिल में अब एक ही सवाल था—
क्या अब सचमुच वो दिन आने वाला है…
जब ये साथ सिर्फ मुलाक़ातों तक नहीं…
ज़िंदगी तक होगा…?
कुछ कहानियाँ
मिलन पर खत्म नहीं होतीं…
असली कहानी तो
मिलन के बाद शुरू होती है…
आगे क्या होगा…
जब मयूर अपने परिवार से रुशाली का नाम लेंगे…
और पहली बार दोनों परिवार आमने-सामने होंगे…?