ruho ka soda - 9 in Hindi Fiction Stories by mamta books and stories PDF | रूहों का सौदा - 9

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रूहों का सौदा - 9

​अध्याय 9: अतीत की परछाइयाँ – एक रहस्यमयी आगमन

​वर्तमान का कोलाहल और चिंताएँ जैसे थम सी गईं और समय का चक्र पीछे की ओर घूमने लगा। पंद्रह वर्ष पहले की एक ऐसी ही धुंधली और बरसाती रात थी। 'विशाल गुरुकुल' के ऊँचे द्वार बंद थे और बाहर बादलों की गर्जना पहाड़ियों को कँपा रही थी।​वह अज्ञात पथिक

​आधी रात का समय था जब मुख्य द्वार पर तैनात प्रहरी ने देखा कि घने कोहरे को चीरती हुई एक आकृति द्वार की ओर बढ़ रही है। वह व्यक्ति पूरी तरह से काले लबादे में लिपटा हुआ था, जिससे उसका चेहरा देख पाना असंभव था। उसकी चाल में एक अजीब सा ठहराव और गरिमा थी, जैसे वह किसी साधारण राज्य का नागरिक न होकर कोई सिद्ध पुरुष या योद्धा हो।

​प्रहरी ने अपनी भाला आगे किया, "ठहरो! इस प्रहर गुरुकुल के द्वार केवल मृत्यु या महागुरु की आज्ञा के लिए खुलते हैं। तुम कौन हो?"

​उस रहस्यमयी व्यक्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने धीरे से अपने लबादे के भीतर से एक छोटे से शिशु को निकाला, जो गहरे लाल रंग के रेशमी वस्त्रों में लिपटा हुआ था। वह बच्चा ठंडी हवाओं के बीच भी शांत था, उसकी आँखों में वह अबोधपन नहीं था जो अक्सर नवजातों में होता है, बल्कि एक गहरी स्थिरता थी।​नामकरण और वचन

​द्वार के रक्षकों ने तुरंत भीतर सूचना भेजी। कुछ ही पलों में स्वयं महागुरु, जो उस समय युवा थे, द्वार पर उपस्थित हुए। जैसे ही महागुरु की नज़र उस व्यक्ति और उस बालक पर पड़ी, उनके चेहरे का रंग उड़ गया। वे दोनों एक-दूसरे को जानते थे, लेकिन बिना एक शब्द बोले, उस अज्ञात व्यक्ति ने बालक को महागुरु की गोद में सौंप दिया।

​"इसका नाम क्या होगा?" महागुरु की आवाज़ में एक अज्ञात कंपन था।

​उस रहस्यमयी व्यक्ति ने अपनी भारी और गूँजती आवाज़ में केवल एक शब्द कहा—"रुद्र।"

​"यह शिव का अंश भी है और प्रलय का संकेत भी। इसे उस युद्ध के लिए तैयार करना महागुरु, जिसके बारे में शास्त्रों में केवल चेतावनी दी गई है।" इतना कहकर वह व्यक्ति अंधेरे में ओझल हो गया, जैसे वह कोहरे का ही एक हिस्सा हो। महागुरु उसे पुकारते रह गए, लेकिन पीछे केवल बारिश की आवाज़ और उस नन्हे बालक की टकटकी लगाती आँखें रह गई थीं।​गुरुकुल का पहला दिन

​अगली सुबह जब गुरुकुल के अन्य आचार्यों ने उस बालक को देखा, तो सबके मन में प्रश्न थे। "यह किसका पुत्र है?" "इसका कुल क्या है?" महागुरु ने उन सभी प्रश्नों को एक ही वाक्य में शांत कर दिया— "आज से यह गुरुकुल का पुत्र है। इसका कुल यह आश्रम है और इसकी पहचान इसकी वीरता होगी।"

​बचपन से ही रुद्र अन्य बालकों से अलग था। जहाँ अन्य बच्चे खेल-कूद में समय बिताते, रुद्र घंटों शस्त्र-शाला के बाहर बैठकर आचार्यों को अभ्यास करते देखता रहता। उसकी आँखों में वह मासूमियत कभी नहीं दिखी, जो एक बच्चे में होनी चाहिए; वहां हमेशा एक लक्ष्य था, एक अधूरापन था जिसे वह शायद खुद भी नहीं समझता था।

​यहीं से उस   प्रेम की   और 'वीरता की गाथा' का बीज बोया गया था। वह बालक, जिसे एक रहस्यमयी परछाईं ने छोड़ा था, आज उसी गुरुकुल की सबसे बड़ी चिंता और आशा दोनों बन चुका था।