ruho ka soda - 11 in Hindi Fiction Stories by mamta books and stories PDF | रूहों का सौदा - 11

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रूहों का सौदा - 11

​क्या रुद्र उस 'सत्य' को झेल पाएगा जिसे महागुरु 'कैद' कह रहे थे? और क्या वह शिखर-मुकाबले की पहली ही चुनौती में जीवित बच पाएगा, जहाँ हार का अर्थ केवल प्रतियोगिता से बाहर होना नहीं, बल्कि अस्तित्व का मिट जाना था?

​मैदान में बिखरी वह लकड़ी की तलवार और सिसकियाँ भरता रुद्र—यह दृश्य किसी का भी हृदय पिघलाने के लिए पर्याप्त था। रुद्र का विलाप केवल थकान की वजह से नहीं था, बल्कि उस भारी बोझ की वजह से था जो उसके किशोर कंधों पर बिना पूछे डाल दिया गया था।

​एक पिता का स्पर्श

​तभी, रुद्र को अपने कंधे पर एक भारी लेकिन कोमल हाथ का स्पर्श महसूस हुआ। उसने चौंककर पीछे देखा, तो उसकी धुंधली आँखों के सामने महागुरु खड़े थे। रुद्र ने जल्दी से अपने आँसू पोंछने की कोशिश की और लड़खड़ाते हुए खड़े होकर अपना सिर झुका लिया।

​"क्षमा करें महागुरु... मैं... मैं बस विचलित हो गया था," रुद्र ने धीमी आवाज़ में कहा।

​महागुरु ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने नीचे झुककर वह फेंकी हुई तलवार उठाई और उसे रुद्र के हाथ में थमा दिया। "रोना कमजोरी नहीं है रुद्र, बल्कि यह प्रमाण है कि तुम्हारे भीतर अभी भी एक कोमल हृदय जीवित है। एक पत्थर कभी योद्धा नहीं बन सकता, केवल वह मनुष्य बन सकता है जो दर्द को महसूस करना जानता हो।"

​रहस्यमयी कक्ष की ओर

​महागुरु उसे अपने साथ अपने निजी कक्ष की ओर ले गए, जहाँ साधारणतः किसी भी छात्र का जाना वर्जित था। वहाँ चारों ओर जड़ी-बूटियों की गंध और पुरानी पांडुलिपियों की खुशबू थी। महागुरु ने उसे एक आसन पर बिठाया और खुद उसके सामने बैठ गए।

​"तुम घर जाना चाहते हो?" महागुरु ने अचानक पूछा।

​रुद्र की आँखों में फिर से चमक आ गई, "क्या मेरा कोई घर है महागुरु? क्या इस दुनिया में कोई ऐसा है जो मेरी प्रतीक्षा कर रहा है?"

​भविष्य की चेतावनी

​महागुरु ने एक लंबी सांस ली और खिड़की से बाहर चमकते ध्रुवतारे की ओर देखने लगे। "रुद्र, तुम्हारा घर वह नहीं है जहाँ से तुम आए हो, बल्कि वह है जिसे तुम्हें बचाना है। यह आगामी मुकाबला केवल जीतने के लिए नहीं है। हमारे आर्यावर्त की सीमाओं पर एक ऐसा अंधेरा बढ़ रहा है जो शास्त्रों और मर्यादाओं को निगल जाएगा। उस अंधेरे को रोकने के लिए एक ऐसी रोशनी चाहिए जो खुद आग में तपकर बनी हो।"

​उन्होंने रुद्र की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "जिस दिन तुम उस शिखर-मुकाबले को जीत लोगे, उस दिन तुम्हें न केवल अपने अतीत का सच पता चलेगा, बल्कि तुम्हें वह मार्ग भी दिखेगा जो तुम्हें तुम्हारे अपनों तक ले जा सकता है। लेकिन उस मार्ग पर केवल वही चल सकता है जिसने अपने आंसुओं को अपनी शक्ति बना लिया हो।"

​एक नया संकल्प

​महागुरु की बातों ने रुद्र के भीतर सोई हुई अग्नि को फिर से प्रज्वलित कर दिया। उसे अब समझ आ रहा था कि उसकी ट्रेनिंग केवल उसे कष्ट देने के लिए नहीं, बल्कि उसे उस सत्य के योग्य बनाने के लिए थी जो अब तक उससे छिपाया गया था।

​रुद्र ने महागुरु के चरण स्पर्श किए और दृढ़ता से कहा, "मैं तैयार हूँ महागुरु। अब न आँखें रोएंगी और न ही कदम लड़खड़ाएंगे। मैं वह मुकाबला जीतकर दिखाऊंगा।"