मल्होत्रा का महल
मल्होत्रा का महल…घर कम, ऐलान ज़्यादा था।
ऊँचे काले लोहे के गेट उन पर सुनहरे शेर का निशान बना था।
दोनों ओर बंदूकधारी गार्ड चौबीसों घंटे खड़े रहते थे ।
बिना इजाज़त कोई अंदर कदम नहीं रख सकता था।
गेट के अंदर घुसते ही अंदर एक लम्बी सड़क दिखाई देती है उसके दोनों तरफ विदेशी पेड़ो से सजाया गया था।
सड़क से निकल ते ही महँगी गाड़ियाँ कतार दिखाई देती है।
जैसे हर एक अपने मालिक की ताक़त का प्रदर्शन कर रही हो।
महल सफ़ेद संगमरमर से बना था।
ऊँचे खंभे, बड़ी काँच की खिड़कियाँ,
और बीच में भव्य सीढ़ियाँ जो ऊपर दो हिस्सों में बँट जाती थीं।
देखने में वह स्वर्ग जैसा था—
पर उसमें गर्माहट नहीं थी।
दीवारें खूबसूरत थीं,
पर उनमें अपनापन नहीं था।
ऐसा लगता था जैसे हर ईंट किसी राज़ को छुपाए बैठी हो।
अंदर फर्श इतना चमकदार था कि झूमरों की रोशनी उसमें उतर जाती।
दीवारों पर पूर्वजों की तस्वीरें टंगी थीं—
हर चेहरा सत्ता और कठोरता की कहानी कहता हुआ।
नौकर-चाकर चुपचाप चलते।
यहाँ कोई ऊँची आवाज़ में नहीं हँसता।
कोई बेवजह सवाल नहीं पूछता।
यह घर प्यार से नहीं… नियमों से चलता था।
डाइनिंग टेबल इतनी बड़ी थी कि बीस लोग बैठ सकते थे,
लेकिन खाने के समय सन्नाटा छाया रहता।
हर शब्द नपा-तुला, हर नज़र सावधान।
आर्यन का कमरा महल के ऊपरी हिस्से में था—
शानदार, स्टाइलिश, पर सलीके से व्यवस्थित।
उसकी बालकनी से पूरा परिसर दिखता था—
जैसे वह अपने ही साम्राज्य को देख रहा हो।
बाहर से यह महल शान था।
आर्यन इसी ठंडे वैभव में पला-बढ़ा था।
उसने बचपन से सीखा था—
ताक़त ही सच है।और इस ताकत के सामने सब को
झुकाया जाता है। उसे विशवास था कि वो राजा है और सब उसके गुलाम।
शाम का समय था।
सूरज डूब रहा था, और सुनहरी रोशनी महल की सफ़ेद दीवारों पर पड़कर उसे और भव्य बना रही थी।
काली लंबी कार धीरे-धीरे गेट के सामने आकर रुकी।
लोहे के भारी गेट अपने-आप खुल गए।
कार्तिक ने खिड़की से बाहर देखा—
उसकी नीली आँखों में हल्की-सी ठंडक थी,
जैसे वह किसी इमारत को नहीं…एक किले को देख रहा हो।
यह घर नहीं था, यह सत्ता का किला था।
आर्यन मुस्कुराया—“वेलकम टू माय वर्ल्ड।”
कार्तिक ने बस हल्की-सी मुस्कान दी।
आज उसे एक अजीब सी बेचैनी घेरे हुई थी , उसका दिल अजीब ढंग से धड़क रहा था।
कार लंबी ड्राइववे से होती हुई मुख्य दरवाज़े तक पहुँची।
दरवाज़े के दोनों ओर खड़े गार्ड ने झुककर सलाम किया।
आर्यन ने घमंड से सिर हिलाया और गाड़ी को आगे की ओर बढ़ा दिया ...दरवाज़ा खुला।
अंदर संगमरमर का विशाल हॉल दिखाई दिया
ऊपर चमकता झूमर,दीवारों पर बड़े-बड़े पेंटिंग्स।
सीढ़ियाँ ऐसे उठती हुईं जैसे किसी साम्राज्य की ओर जाती हों।
एक नौकर आगे बढ़ा—“सर आप दोनों का इंतज़ार कर रहे हैं।”छोटे मालिक
कार्तिक ने एक पल के लिए हॉल को देखा,इस जगा ठंडी हवा, भारी सन्नाटा…था ।एक डर का माहौल ,
जैसे यहाँ बहुत कुछ छुपाया गया हो।
आर्यन उसके करीब आया।
धीरे से बोला—“डर तो नहीं लग रहा?”
कार्तिक ने उसकी तरफ देखा।
उसकी नीली आँखें बिल्कुल स्थिर थीं।
“डर?”
उसने धीमे से कहा—किस बात का डर में तो बस
“चीज़ें याद रहा हूं।
आर्यन ने उसकी बात पर हल्की-सी हँसी छोड़ी—
उसे लगा कार्तिक उसकी दुनिया से प्रभावित हो रहा है।
पर सच्चाई यह थी—कि कार्तिक हर कोना, हर चेहरा, हर रास्ता याद कर रहा था।
उसकी नज़र ऊपर बालकनी पर गई। किसी की परछाईं दिखाई दी —
शायद आर्यन के पिता थे।
महल के भीतर कदम रखते हुए,कार्तिक ने महसूस किया—
यह वही जगह है ,जहाँ कई लोगों की ज़िंदगियाँ तय होती है। जहाँ लोगों की जिंदगी और मौत का खेल खेला जाता था।
और आज…वह खुद उस खेल का हिस्सा बनकर अंदर आया था।
आर्यन ने उसका हाथ थाम लिया—“अब तुम मेरे साथ हो।”तुम डरने की कोई जरूरत नहीं है।
कार्तिक ने बिना विरोध हाथ रहने दिया।
चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
दिल में संकल्प लिए उसने कदम बढ़ाया।
“मैं तुम्हारे साथ हूँ…महल की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए
उसे एक अजीब-सी अनुभूति हुई—
जैसे वह शिकार बनकर आया हो।
और उसे पता था—यह महल जितना मजबूत दिखता है,
उसे कही अधिक गहरा है।
महल की ऊपरी मंज़िल पर एक लंबा गलियारा था।
दीवारों पर महँगे पेंटिंग्स,और बीच-बीच में गार्ड सर झुकाया खड़े थे।
आर्यन एक भारी लकड़ी के दरवाज़े के सामने रुकता है। कुछ देख वही खड़ा रहता है जैसे सोच रहा हो अंदर जाना है ,या नहीं । उसने हाथ बढ़ाया और हल्का-सा दस्तक दिया।
“आइए। ” अंदर से गहरी आवाज़ आई
न बहुत तेज़ ,न बहुत धीमी।
पर ऐसी कि सुनते ही रीढ़ में सिहरन दौड़ जाए ।
दरवाज़ा खुला। कमरा विशाल था।
गहरे रंग की लकड़ी की दीवारें,भारी परदे,और बीच में एक बड़ी मेज़।
मेज़ के पीछे बैठे थे—
विक्रम मल्होत्रा।
आर्यन के पिता।
उनकी उम्र पचास के आसपास होगी।
उनसे बाल सफेद हल्के से सफेद थे ,तेज नज़र,
और चेहरे पर ऐसी स्थिरता जैसे भावनाएँ उन्होंने बहुत पहले त्याग दी हों।
उन्होंने धीरे-धीरे नज़र उठाई।
पहले आर्यन को देखा।
फिर मुझे
वह नज़र साधारण नहीं थी—जाँचती हुई। तौलती हुई।
जैसे कोई इंसान नहीं, एक की हिसाब किताब की मसीन सामने खड़ी हो।जिसके चेहरे पर एक भी भाव समझना मुश्किल था।
आर्यन ने कहा—“डैड, ये कार्तिक है।”
कुछ पल सन्नाटा छाया रहा ।
विक्रम मल्होत्रा कुर्सी से उठे।
धीरे-धीरे आगे बढ़े।
उनके कदमों की आवाज़ संगमरमर पर साफ़ सुनाई दे रही थी।
वे कार्तिक के सामने आकर रुके।
“तो… तुम वही हो।”उनकी आवाज़ में हल्की-सी ठंडक थी।
कार्तिक ने बिना झिझक उनकी आँखों में देखा।
नीली आँखें स्थिर थीं।
“जी।”
विक्रम ने हल्की-सी मुस्कान दी—मुस्कान नहीं… एक संकेत।
“तुम्हारी चर्चा सुनी है। तुम पढ़ाई में बहुत तेज़ हो …और दिमाग से भी।”
कार्तिक शांत रहा।
विक्रम उसके चारों ओर हल्का-सा घूमे।
जैसे कोई योद्धा दूसरे योद्धा की चाल पहचान रहा हो।
“आर्यन… जल्दी लोगों पर भरोसा नहीं करता,”
उन्होंने कहा।
“लेकिन जिस पर करता है…उसे आसानी से जाने नहीं देता।”
आर्यन मुस्कुराया।
उसे लगा यह स्वीकृति है।
पर कार्तिक ने उस वाक्य के भीतर छुपी चेतावनी पकड़ ली।
विक्रम ने फिर सीधे कार्तिक की ओर देखते हुए कहा ।
“इस घर में दो चीज़ें सबसे ज़्यादा कीमती हैं—ताक़त…
और वफ़ादारी।”
कमरे की हवा और भारी हो गई।“अगर तुम यहाँ खड़े हो,
तो समझ लो…
तुम्हें दोनों साबित करनी होंगी।”
कुछ सेकंड तक दोनों की नज़रें टकराईं।
फिर कार्तिक ने धीमे, पर स्पष्ट स्वर में कहा—मुझे पता है
“मैं जो भी करता हूँ…पूरी तरह करता हूँ।”
विक्रम के चेहरे पर एक हल्की-सी चमक आई।
जैसे उन्होंने कुछ पहचान लिया हो।
“अच्छा है,”उन्होंने कहा।“मुझे अधूरे लोग पसंद नहीं।”
सन्नाटा फिर छा गया।
आर्यन ने कार्तिक के कंधे पर हाथ रखा—
गर्व से।
पर विक्रम की नज़र अभी भी कार्तिक पर थी।
और उस नज़र में एक सवाल था—यह लड़का सच में हमारे साथ है…
या कुछ और?
कार्तिक ने महसूस किया—
यह आदमी आर्यन से कहीं ज़्यादा खतरनाक है।
आर्यन भावनाओं से चलता है।
विक्रम… हिसाब से।
कमरे से बाहर निकलते हुए
कार्तिक ने एक बात तय कर ली—
अगर इस साम्राज्य को गिराना है,
तो पहले इसकी जड़ को समझना होगा।
और वह जड़…
अभी-अभी उसके सामने खड़ी थी।