चैप्टर 3 — शिकायत
क्लासरूम में सन्नाटा ठहरा हुआ था।
रेयांश दरवाज़े पर खड़ा था। उसकी निगाहें सीधी सावी पर टिकी थीं।
“तुम्हें अभी मेरे साथ चलना होगा।”
सावी का दिल जोर से धड़क रहा था, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं… सख़्ती थी।
वो धीरे से खड़ी हुई।
“मैं अनजान लोगों के साथ क्यों जाऊँ?” उसकी आवाज़ साफ और ठंडी थी।
“तुम कौन हो?”
पूरी क्लास सांस रोके देख रही थी।
रेयांश कुछ पल उसे देखता रहा। जैसे वो बहुत कुछ कहना चाहता हो… मगर कह नहीं सकता।
अथर्व आगे बढ़ा।
“सुनाई नहीं दिया? वो नहीं जाएगी।”
रेयांश की नजर अब अथर्व पर गई।
दोनों के बीच हवा भारी हो गई।
सावी ने फिर पूछा —
“तुम कौन हो?”
इस बार रेयांश ने जवाब दिया।
“अभी नहीं बता सकता।”
“क्यों?” सावी की भौंहें सिकुड़ीं।
“क्योंकि अगर बता दिया… तो तुम्हारी जिंदगी बदल जाएगी।”
“पहले ही बदल चुकी है!” सावी की आवाज ऊँची हो गई।
“कल हमला हुआ… तुम अचानक आ गए… और अब मुझे कह रहे हो कि तुम्हारे साथ चलूँ? बिना वजह? बिना पहचान?”
रेयांश चुप रहा।
उसकी चुप्पी… जवाब से ज्यादा खतरनाक थी।
सावी ने सिर हिलाया।
“नहीं। मैं कहीं नहीं जा रही।”
वो अपनी सीट पर बैठ गई।
रेयांश ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा —
उस नजर में गुस्सा नहीं था… बस बेचैनी।
फिर वो मुड़ा और बाहर चला गया।
ब्रेक टाइम
कॉरिडोर में फुसफुसाहटें थीं।
“वो रेयांश है ना?”
“बहुत अजीब है…”
“कहीं वही तो—”
सावी ने सब अनसुना किया।
अथर्व उसके साथ चल रहा था।
“तूने सही किया,” उसने कहा, “ऐसे कोई भी उठाकर ले जाएगा क्या?”
सावी ने गहरी सांस ली।
“मुझे डर लग रहा है… लेकिन उससे नहीं।”
“तो किससे?”
“उसकी चुप्पी से।”
अथर्व रुक गया।
“सावी… मुझे ये सब ठीक नहीं लग रहा। वो कुछ छिपा रहा है।”
“तो बताए ना!” सावी झुंझलाई, “मैं कोई बच्ची नहीं हूँ।”
अथर्व ने तुरंत कहा —
“तो चल प्रिंसिपल के पास।”
सावी चौंकी।
“क्या?”
“कम्प्लेन करते हैं। उसने क्लास में आकर जबरदस्ती की। ये नॉर्मल नहीं है।”
सावी कुछ पल सोचती रही।
उसे लगा शायद वो ओवररिएक्ट कर रही है…
लेकिन फिर उसे याद आया — हमला… बाइक… वो शब्द — ‘अब देर हो चुकी है।’
उसने सिर हिला दिया।
“ठीक है।”
प्रिंसिपल ऑफिस
कमरे में औपचारिक सन्नाटा था।
प्रिंसिपल ने ध्यान से सारी बात सुनी।
“उसने आपको धमकाया?” उन्होंने पूछा।
“सीधे नहीं…” सावी ने कहा, “लेकिन… वो अजीब था। जैसे उसे कुछ पता है। और वो मुझे जबरदस्ती ले जाना चाहता था।”
अथर्व ने जोड़ा —
“और कल जो हमला हुआ था… उसी के तुरंत बाद वो पहुंच गया।”
प्रिंसिपल की भौंहें सिकुड़ीं।
“हम इस मामले को गंभीरता से लेंगे।”
उन्होंने तुरंत सिक्योरिटी को बुलाया।
उसी वक्त — कॉलेज गेट के बाहर
रेयांश अपनी बाइक के पास खड़ा था।
उसका फोन बजा।
“उन्होंने शिकायत कर दी है,” दूसरी तरफ से आवाज आई।
कुछ सेकंड चुप्पी।
रेयांश ने आँखें बंद कीं।
“ठीक है।”
“अब क्या करेंगे?”
उसने धीरे से कहा —
“अब वो मुझसे और दूर जाएगी।”
“तो छोड़ दीजिए।”
रेयांश की आँखें खुलीं।
“नहीं। छोड़ना होता तो पहले ही छोड़ देता।”
उसने कॉलेज की बिल्डिंग की तरफ देखा।
ऊपर तीसरी मंजिल की खिड़की में सावी खड़ी थी।
उनकी नजरें मिलीं।
सावी ने तुरंत नजरें हटा लीं।
उस पल… रेयांश के चेहरे पर पहली बार हल्की चोट दिखी।
लेकिन वो पल भर का था।
उसने हेलमेट पहना।
“अब खेल खुलेगा,” उसने फोन पर कहा, “और वो अभी सच से बहुत दूर है।”
शाम
कॉलेज में खबर फैल चुकी थी।
सिक्योरिटी ने रेयांश को कैंपस से अस्थायी रूप से बैन कर दिया।
अथर्व को राहत मिली।
“देखा? अब वो पास नहीं आएगा।”
लेकिन सावी को अजीब सा खालीपन महसूस हुआ।
क्या उसने सही किया?
वो खुद से लड़ रही थी।
उसी वक्त उसका फोन वाइब्रेट हुआ।
अनजान नंबर।
उसने उठाया।
दूसरी तरफ खामोशी।
फिर बहुत धीमी आवाज —
“तुमने गलती की है।”
सावी का खून ठंडा पड़ गया।
“कौन?”
“अब कोई तुम्हें खुले में नहीं बचाएगा।”
कॉल कट।
सावी के हाथ कांपने लगे।
अथर्व ने उसका फोन पकड़ा।
“किसका था?”
सावी की आवाज सूखी थी।
“शायद… सच का।”
खिड़की के बाहर अंधेरा घिर रहा था।
और इस बार…
खतरा छिपकर नहीं आ रहा था।