Bhakt Prahlaad - 5 in Hindi Spiritual Stories by Siya Kashyap books and stories PDF | भक्त प्रह्लाद - 5

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भक्त प्रह्लाद - 5

देवताओं के साथ युद्ध

अपने अंतःपुर दुर्ग और राज्य की विनाशलीला देखकर हिरण्यकशिपु क्रोध के मारे फुफकार उठा। रानी कयाधू के अंतःपुर में न होने की बात उसे सबसे अधिक चिंतित कर रही थी। वह इसी बारे में सोच-विचार कर ही रहा था कि उसे कोई अपनी ओर आता दिखाई दिया। जब वह निकट आ गया तो हिरण्यकशिपु के मुख से सहसा ही निकल पड़ा, “सेनापति तुम !”

“हाँ महाराज!” सेनापति इल्वल ने अपना मस्तक झुकाते हुए कहा।

“यह सब क्या है, इल्वल ?” सेनापति को देखते ही हिरण्यकशिपु के धैर्य का बाँध जैसे टूट गया, “असुरराज के दुर्ग की दुर्दशा और अंतःपुर का विनाश करने का दुस्साहस ब्रह्मांड के किस प्राणी ने किया है? किसने अपनी मृत्यु को ललकारा है, इल्वल ?”

सेनापति इल्वल कुछ क्षण के लिए मौन रहा, फिर उसने हिरण्यकशिपु के राज्य से तपस्या के लिए निकल जाने के बाद राज्य पर जो-जो विपत्तियाँ और कष्ट आए थे, जिनके कारण राज्य तहस-नहस हो गया था — सभी विवरण हिरण्यकशिपु को कह सुनाया। उसने बताया कि अचानक ही न जाने कैसे देवताओं ने उन पर आक्रमण कर दिया। इस बार उनकी सेना हमारी सेना से अधिक थी, जिस कारण हमें हार का सामना करना पड़ा।

हिरण्यकशिपु एकटक इल्वल के मुख को देखता रहा, फिर उसने प्रश्न किया, “और रानी कयाधू ?” “महाराज! महारानी कयाधू को बंदी बना लिया गया।” इल्वल ने लड़खड़ाते स्वर में कहा।

हिरण्यकशिपु के मुख से रानी कयाधू का नाम सुनते ही इल्वल काँप उठा। ऐसा लगा, मानो उसके कंठ से कभी कोई स्वर फूटा ही न हो। उससे कुछ बोलते नहीं बन रहा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह कहे भी तो क्या कहे, क्या बताए? यही कि रानी कयाधू को देवराज इंद्र बंदी बनाकर देवलोक ले गया, फिर अगले ही क्षण उसके मस्तिष्क में बिजली सी कौंधी कि यदि उसने रानी कयाधू के बंदी होने की बात हिरण्यकशिपु को बताई तो वह उसे जीवित नहीं छोड़ेगा। अभी वह इसी तरह की बाते सोच ही रहा था कि तभी हिरण्यकशिपु क्रोध के मारे चीख पड़ा, “सेनापति! तुमने मेरे प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया। मैंने पूछा कि रानी कयाधू कहाँ हैं ?” “म....मह....महाराज!” हिरण्यकशिपु गर्जना करते हुए बोला, “तुम हमारे क्रोध को और बढ़ा रहे हो।”

“क्या कह रहे हो?” हिरण्यकशिपु की आँखों में क्रोध की रक्तिम ललिमा साफ दृष्टिगोचर हो रही थी। वह अपनी तलवार म्यान से बाहर निकलाते हुए बोला, “ऐसा दुस्साहस किसने किया ?” “महाराज! हम महारानी कयाधू की रक्षा नहीं कर सके। इंद्रदेव उन्हें बंदी बनाकर अपने साथ ले गया।" इल्वल ने डरते-डरते बताया।

रानी कयाधू के बंदी होने की बात सुनकर हिरण्यकशिपु की भुकृटि तन गई, ”बंदी! और वह भी इंद्र द्वारा...” इससे उसके क्रोध की कोई सीमा न रही। देवताओं से बदला लेने के लिए वह आतुर हो उठा। उसने तुरंत इल्वल को युद्ध की तैयारी करने का आदेश दिया।

सेनापति इल्वल ने हिरण्यकशिपु के आदेशानुसार तुरंत अपनी बिखरी हुई सेना को संगठित किया। इसके पश्चात् हिरण्यकशिपु ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा, “मेरे वीर योद्धाओ, जिस मनोरथ के लिए मैं अपने राज्य से गया था, वह पूर्ण हुआ। अब तुम्हें किसी भी शक्ति से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। अब मैं वह दिव्य शक्ति अर्जित कर चुका हूँ, जो सृष्टि में किसी के भी पास नहीं है। तीनों लोकों में मुझे परास्त करने वाला कोई नहीं है। परास्त की बात तो दूर, मेरे सामने ठहरने वाला भी कोई योद्धा इस सृष्टि में नहीं है। ब्रह्मा के दिए वरदान से मैंने अमरत्व प्राप्त कर लिया है। अब तुम सब यह भलि भाँति जान लो कि मैं सृष्टि में सर्वशक्तिमान बन गया हूँ।”

हिरण्यकशिपु की बात सुनकर सेनापति इल्वल की छाती गर्व से चौड़ी हो गई। वह मन ही मन विचार करने लगा कि अब पता चलेगा देवताओं को, जिन्होंने हमारे राज्य में इतनी विनाशलीला की, इतना विध्वंस किया। वह अपना खड्ग लहराते हुए बोला, “महाराज ! हमें शीघ्रातिशीघ्र अपने शत्रु देवताओं से प्रतिशोध लेना चाहिए।”

“हाँ-हाँ महाराज!” एक अन्य सेनापति नमुचि भी इल्वल की हाँ में हाँ मिलाते हुए बोला, “देवताओं ने हम पर जो अत्याचार किए, हमें उनसे इसका प्रतिशोध शीघ्रातिशीघ्र ही लेना चाहिए।”

अपने वीर योद्धाओं का यह उत्साह देखकर हिरण्यकशिपु के होंठों पर एक कुटिल मुसकान खिल गई। उसके आँखों में क्रूरता की चमक कौंधने लगी। वह अपने दाँत पीसते हुए बोला, “हम केवल देवताओं को ही नहीं, बल्कि तीनों लोकों और चौदह भुवनों को भी अपने अधीन कर लेंगे।”

“ऐसा ही होगा, महाराज!” सेनापति इल्वल ने अपना खड्ग लहराते हुए कहा, “हमें बस आपकी आज्ञा भर की देर है। हमारी सेना देवगणों से प्रतिशोध लेने के लिए तत्पर है।”

अपने वीर योद्धाओं का साहस व उत्साह देखकर हिरण्यकशिपु का मन प्रसन्न हो उठा। उसने पूरी शक्ति के साथ देवताओं पर आक्रमण करने के लिए कूच किया। दूसरी ओर, जब देवताओं को पता चला कि आसुरी सेना पूरी शक्ति एवं वेग से स्वर्गलोक की ओर बढ़ी चली आ रही है तो वे चिंतित हो उठे। कोई कहता कि चलो, यहाँ से भाग चलो, तो कोई कहता कि यों कायरों की तरह भागना उचित नहीं है और कोई कहता कि उनसे संधि कर ली जाए। इस प्रकार सभी देवता आपस में विचार-विमर्श कर ही रहे थे कि तभी उन्हें एक सैनिक ने आकर सूचना दी कि आसुरी सेना देवलोक के द्वार पर आ धमकी है। यह सूचना पाकर सेनापति कार्तिकेय ने देवताओं को युद्ध करने की आज्ञा दी। अभी देवता पूरी तरह सँभल भी नहीं पाए थे कि हिरण्यकशिपु के नेतृत्व में विध्वंस मचाते हुए असुरों ने देवलोक में प्रवेश किया। देवता उनके सामने अधिक देर तक न ठहर सके और बात ही बात में उन्हें पराजय का मुख देखना पड़ा। देवलोक पर हिरण्यकशिपु का अधिकार हो गया। अप्सरा-कुंज, नंदन कानन और इंद्रासन सबकुछ हिरण्यकशिपु के अधिकार में आ गया।

असुरों के आतंक से भयभीत होकर देवताओं को इधर-उधर भागकर छिपने के लिए विवश होना पड़ा। देवताओं को पराजित करने के बाद भी हिरण्यकशिपु के भीतर जल रही प्रतिशोध की ज्वाला शांत नहीं हुई, क्योंकि देवताओं के सबसे बड़े रक्षक भगवान् विष्णु से प्रतिशोध लेना अभी शेष था। भगवान् विष्णु तो उसके सबसे बड़े बैरी थे, क्योंकि वराह के रूप में उन्होंने उसके भाई हिरण्याक्ष का वध जो किया था। यही बात रह-रहकर उसे व्याकुल कर रही थी। वह सोच रहा था कि कब उसका सामना विष्णु से हो और वह अपना प्रतिशोध पूरा करे।

देवलोक को अपने अधीन करने के पश्चात् हिरण्यकशिपु ने चारों ओर यह आदेश जारी कर दिया कि जो भी विष्णु और अन्य देवताओं का नाम लेगा तथा उनकी पूजा-अर्चना करेगा, उसे प्राणदंड दिया जाएगा। किसी में भी उसके आदेश की अवहेलना करने का साहस न था और जो ऐसा नहीं करता, उसे अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता था।

असुर ऋषि-मुनियों और सत्पुरुषों पर मनमाने ढंग से तरह-तरह के अत्याचार करने लगे। देवताओं के स्थान पर हिरण्यकशिपु की पूजा करवाई जाने लगी और जो ऐसा नहीं करता था, उसे असुरों का कोपभाजन बनना पड़ता था। देवताओं पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् भी हिरण्यकशिपु का मन खिन्न था। बारंबार उसकी आँखों के सामने अपनी प्रिय रानी कयाधू की छवि प्रकट हो रही थी, जो उसकी खिन्नता को और अधिक बढ़ा रही थी। हिरण्यकशिपु देवलोक को भस्मीभूत करने हेतु विचार कर ही रहा था कि तभी एकाएक वहाँ देवर्षि नारद का आगमन हुआ।

“नारायण-नारायण!” देवर्षि ने चिर-परिचित ढंग से अपने परमेश्वर का सुमिरण किया और वीणावादन करते हुए हिरण्यकशिपु का भी जयकार किया, “असुरराज की जय हो! बड़ी ही प्रसन्नता का विषय है कि आपका यशोगान त्रिलोक में गूँज रहा है।”

“देवर्षि!”हिरण्यकशपु विषैले स्वर में बोला, “यह आपके लिए प्रसन्नता का विषय कैसे हो सकता है ? स्पष्ट कहा जाए तो यह आपके लिए शोक का, विषाद का विषय है।”

“आप ऐसा क्यों सोचते हैं, असुरराज !” देवर्षि बोले।

“क्योंकि आप देवर्षि जो हैं और देवलोक अब असुरों के आधिपत्य में सिसकियाँ भर रहा है।” असुरराज का स्वर अपेक्षाकृत और विषैला हो गया, “आप स्वयं अपनी आँखों से देख सकते हैं कि देवगण यहाँ से पलायन कर गए हैं और अब असुरों से भयभीत होकर इधर-उधर छिपते फिर रहे हैं। आप ही बताइए कि यह देवर्षि के लिए प्रसन्नता का विषय किस प्रकार हो सकता है ?”

“असुरराज! शक्तिशाली को ही शासन करने का अधिकार होता है।” देवर्षि विषय को अपनी इच्छानुसार परिवर्तित करते हुए बोले, “और आपने स्वयं सिद्ध कर दिया है कि बुद्धि, बल, वीरता और धीरता में आप अनन्य हैं। इसी कारण आप देवलोक पर विजय पाने में सफल हुए हैं। आप जैसे बुद्धिमान, बलवान, धैर्यवान और वीर्यवान राजा को पाकर देवलोक अपने सौभाग्य पर क्यों न इठलाएगा और भला यह हमारे लिए प्रसन्नता का विषय क्यों न होगा, असुरराज ?”

“देवर्षि! देवलोक की हाहाकारी और विपरीत परिस्थितियों में भी आपकी निष्पक्ष विवेचना ने हमारा मन प्रसन्न कर दिया।” असुरराज हिरण्यकशिपु देवर्षि नारद के शब्दजाल से सम्मोहित-सा हो गया और उनके प्रति विषैला भाव त्यागकर सम्मान प्रकट करते हुए बोला, “देवर्षि! देवताओं के साथ यद्यपि हमारा शत्रु-भाव है, तथापि हम आपकी गणना अपने शत्रुओं में नहीं करते। अतः पधारिए! आसन ग्रहण कीजिए। असुराज हिरण्यकशिपु के दरबार में आपका स्वागत है।”

देवर्षि ने नि:संकोच होकर असुरराज द्वारा दिए गए आसन को स्वीकार करते हुए गंभीर स्वर में कहा, “असुरराज! आपके देवलोक-विजय से भी अधिक प्रसन्नता की बात मैं आपको सुनाना चाहता हूँ। क्या आप इसके लिए तैयार हैं ?”

“असुरों के लिए देवलोक-विजय से भी अधिक प्रसन्नता की बात और कुछ नहीं हो सकती, देवर्षि!” हिरण्यकशिपु के स्वर में किसी प्रकार की उत्तेजना अथवा उत्साह का समावेश नहीं था, “किंतु आप जो कुछ भी कहना चाहते हैं, नि:संकोच होकर कहिए, हम सुनने के लिए तैयार हैं।”

“असुरराज! असुर सम्राज्ञी सती कयाधू के कुशल-मंगल का समाचार मिलना क्या आपके लिए देवलोक-विजय से भी अधिक प्रसन्नता का विषय नहीं है ?” देवर्षि ने कहा।

“निश्चित रूप से, देवर्षि!” हिरण्यकशिपु एकाएक अपने सिंहासन से उठ खड़ा हुआ और उत्तेजित स्वर में बोला, “आप प्रिय कयाधू के विषय में क्या जानते हैं, और वह इस समय कहाँ है ?”

“चिंतित न होइए, असुराज!” देवर्षि ने हिरण्यकशिपु को सांत्वना दी, “सती कयाधू कुशलतापूर्वक हैं और इस समय मेरे आश्रम में पूर्ण रूप से सुरक्षित हैं। वे ही नहीं, बल्कि आपका प्रिय पुत्र प्रह्लाद भी स्वस्थ एवं सुरक्षित है।”

“देवर्षि!” असुरराज ने देवर्षि नारद को आँखों ही आँखों से मूक आभार प्रकट किया और कहा, “क्या मेरी प्रिय और पुत्र को कभी मेरा स्मरण भी हो आता है ?”

“अवश्य असुरराज! वे दोनों आपको प्रतिदिन स्मरण करते हैं और....।” देवर्षि कहते-कहते रुक गए।

“और क्या देवर्षि ?” हिरण्यकशिपु की उत्तेजना चरम पर थी।

“सती कयाधू तो प्रतिदिन नहीं, बल्कि प्रतिक्षण आपका स्मरण करती रहती हैं।” देविर्ष ने बताया।

“अच्छा!” लंबी-लंबी डग भरते हुए हिरण्यकशिपु देवर्षि के आसन के सामने जा पहुँचा, “मेरे नेत्र प्रिय कयाधू का मुखमंडल देखने के लिए व्याकुल हैं, मेरे हृदय की धड़कनें अपनी प्रिया से भेंट करने हेतु तीव्र से तीव्रतम हुई जा रही हैं और मेरा रोम-रोम कयाधू कयाधू पुकार रहा है। देवर्षि! प्रिय कयाधू और मेरे मिलन के प्रतीक प्रिय पुत्र प्रह्लाद को अंक में भरने के लिए मेरी बाँहें रोमांचित हो रही हैं। मुझे अतिशीघ्र उनके पास ले चलिए देवर्षि ! मैं आपका अत्यंत आभारी होऊँगा।”

“अवश्य असुरराज!” देवर्षि आसन छोड़कर खड़े हो गए और धीरे-धीरे एक दिशा की ओर बढ़ने लगे, किंतु अब भी उनकी उँगलियाँ वीणा के तारों को झंकृत कर रही थीं और उनकी जिह्वा से बारंबार 'नारायण नारायण' का स्वर प्रस्फुटित हो रहा था।

हिरण्यकशिपु का जैसे सृष्टि के किसी भी पदार्थ के प्रति कोई आकर्षण न हो, वह इस प्रकार निर्विकार भाव से मस्तक झुकाए धीरे-धीरे देवर्षि के पीछे चल रहा था। वास्तव में यह अपनी प्रिय रानी कयाधू और पुत्र प्रह्लाद के प्रति उसके असीम प्रेम का प्रवाह था। इसी आवेग में वह अपने पद, मान और गौरव आदि को विस्मृत कर बैठा था।

आश्रम पर पहुँचकर देवर्षि ने असुरराज को अंदर जाने दिया और स्वयं बाहर ही रुक गए। अंदर जाकर असुरराज ने देखा कि कयाधू एक ओर आसन पर विराजमान है। उसके मुखमंडल पर एक अनोखा तेज दप-दप कर रहा है, जबकि नन्हा पुत्र प्रह्लाद माता की गोद में बैठा उसके आँचल से खेल रहा है।

हिरण्यकशिपु ने कई बार तीव्र आहट करके कयाधू की विचार तंद्राभंग की तो वह पति को सम्मुख पाकर तेजी से उठी और दौड़कर उसके चरणों में गिर पड़ी। हिरण्यकशिपु ने सप्रेम उसे उठाकर अपने हृदय से लगा लिया। उनका पुत्र प्रह्लाद अचानक घटित परिस्थिति को समझ नहीं पाया, किंतु जब कयाधू ने उसे बताया कि 'वे' उसके पिता हैं तो वह ‘पिताश्री-पिताश्री’ कहकर हिरण्यकशिपु के चरणों से लिपट गया। हिरण्यकशिपु ने उसे गोद में उठाकर प्रेम किया।

पति-पत्नी और पुत्र एक-दूसरे से मिलकर बड़े प्रसन्न हुए। उनकी आँखों में आँसुओं की बाढ़ सी आ गई थी, किंतु उनकी प्रसन्नता की भी कोई सीमा न थी।