Shahad ki Gudiya - 1 in Hindi Fiction Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई ( 1)

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई ( 1)

                       शहद की गुड़िया - 1       

       15 अक्टूबर 2003 को दिल्ली की अस्पताल में मेरा जम्म हुआ था. उस वक़्त वक़्त तेज बारिश हो रही थी.मुझे देखकर मेरे माता पीता खुश हो गये थे.   

       मैं काफ़ी शरारती थी. नर्स ने मुझे पिता के हाथो में थमाया तो मैंने उन की ऊँगली पकड़ ली थी.   

       रूढ़ि के मुताबिक मेरी जन्म कुंडली बनाई गईं थी. ज्योतिष ने खुद इस बात की आगाही की थी और समर्थन दिया था.   

       " यह लड़की बड़ी मस्ती खोर और नटखट बनेगी.. " 

        मम्मी ने मुझे देखकर कहां था. आँखे मेरी जैसी है पर जिद उस के पापा जैसी हैं.    

        जब मैं तीन साल की हुई तो साड़ी पहनकर लाली लिपस्टिक लगाकर सज धज गईं थी. सब मुझे नन्ही राज कुमारी कहते थे.जब मैं पहली बार स्कुल गईं तो धरना दिया था.जमीन पर लेट गईं थी. और चिल्लाने लगी थी.

         "मुझे घर जाना हैं. "

          यह देखकर मेरे पिताजी देखते ही रह गये थे.         हमारी स्कुल में एक मैडम थी जिस का नाम. ज्योति था जो काफ़ी खड़ूस थी. एक बार मैंने उस के लंच बॉक्स मैं जिन्दा मेढक रख दिया था..   

         उसे देखकर वह चिल्लाने लगी थी. उस की यह चीख सारी स्कुल में गूंज उठी थी. और मैं अलग कोने में ख़डी रहकर मुस्कुरा रही थी.       

        ज़ब में छठी कक्षा में थी तो स्कूल की घंटी दस मिनिट पहले बजा दी थी. यह देखकर प्रिंसिपल भी चिढ गये थे लेकिन उन्हें पता नहीं चला थी की यह मेरी हरकत थी.      

       ज़ब मैं आठवीं कक्षा में थी मैंने लाइब्रेरी की सारी किताबें उलट सूलट कर दी थी. यह देखकर लाइब्रेरी की मेडम चकमक खा रही थी. इसे कोई बुक आसानी से मिल नहीं पाई थी. उन्हें लगा था लाइब्रेरी में भूत आ गया था.       

         दसवीं कक्षा में मैंने प्रिंसिपल और चपरासी को नेम प्लेट बदल दी थी. सुबह जो हंगामा हुआ था उस से मैं अपनी हंसी रोक नहीं पाई थी.     

        बेचारे प्रिंसिपल चपरासी की केबिन में चले गये थे.         

       बारहवीं कक्षा में फेयर वेल समारोह में मैंने केक में नमक मिला दिया था.. उस से भी बड़ा हंगामा हो गया था. लेकिन मैं मुस्कुरा रही थी. सब के चेहरे पहली ही बाईट में देखने लायक हो गये थे और मैं दूर खडे मुस्कुरा रही थी. केक वाला किस्सा यादगार हो गया था.         

        कॉलेज का पहला दिन भी काफ़ी रोमांचक और दिलचस्प था. मैंने रेगिग से बचने के लिये लड़को को कहां था की मैं ग्रुप लीडर हूं.      

        सब लोग सुनकर हैरान हो गये थे. इतनी छोटी गुड़िया ग्रुप लीडर?!      

         मैंने लोगो के दुख के बारे में बहुत कुछ देखा था तब से तय किया था मैं दुखी लोगो को सहारा दूंगी.. उनको उज्जवल भावी के सपने दिखाउंगी, उन्हें सही रास्ता दिखाउंगी.       

       बहुत छोटी उम्र में मैंने यह शुभ कार्य का आरम्भ किया था. चार लड़कों की नामर्दानगी और कायरता ने मुझे यह मार्ग सुझाया था.       

        चलो उसके के बारे में भी बतादू.       

       सब से पहले आर्यन नाम का लड़का मेरी जिंदगी में आया था. उस से मेरी दोस्ती हो गईं थी. प्यार भी हो गया था.      

      एक बार हम दोनों भारी बारिश में केंटीन के पीछे फ़स गये थे. मेरी सफ़ेद कुर्ती बुरी तरह बदन से चिपक गईं थी. आर्यन की भूखी नजर उसे घूर रही थी. उस वक़्त दोनों के दिल जोर से धडक रहे थे.   

      आर्यन ने अपनी जैकेट उतारकर मुझे पहनाने की कोशिश की थी पर उसके हाथ कांप रहे थे.   

       उसने अपने हाथो जैकेट पहनाया उस वक़्त उस का हाथ मेरी छाती को छू गया. देखकर मेरे भीतर एक आग सी भड़क उठी थी.

       उस ने हाथ उठाने की जगह  मेरी आँखों में देखा. उस पल मुझे गर्मी का एहसास हुआ था जो बारिश के पानी से ठंड हो गईं थी.   

       हम दोनों इतने करीब थे की सिर्फ दिल की धड़कने सुनाई दे रही थी.          

       आर्यन धीरे से मेरे होठो की और झुक गया और मेरे होठो को कसकर अपने होठो से दबोच लिया और मैं पिघल गईं.

       उसने कसकर मुझे अपनी बाहों में झकड़ लिया. बारिश की हर बूंद गर्मी बढ़ा रही थी.

       आर्यन ने उसके हाथ मेरी कमर पर सरका लिये. मैंने अपनी आँखे बंद कर ली.           

       उस ने मुझे दीवार के साथ कसकर दबोच लिया. उसके का हर स्पर्श मेरे बदन में आग भड़का रहा था.   

       मेरी भीगी कुर्ती दोनों के बीच पर्दा बन गईं थी.    

       उस ने कुर्ती को कंधे से नीचे सरका लिया. वह नीचे गिर गईं. उस ने मेरे कानो में कुछ कहां और उस ने मुझे कसकर पकड़ लिया.                

       उस पल उतनी गर्म थी की ठंड का एहसास खत्म हो गया. उस के सांसों की गर्मी मेरी गर्दन महसूस कर रही थी.     

      उस ने धीरे से एक और कदम उठाया जिसे मेरी जुबान बया नहीं कर सकती. मेरी धड़कन बिल्कुल बेकाबू हो गईं. वह मेरी खुल्ली छाती को निहार रहा था. उस की धड़कने तेज थी पर वह कुछ नहीं कर पाया था.     

      फिर भी उस ने मेरी नंगी छाती पर पर रख दिया जिस से मेरा पूरा बदन काँपने लगा.   

      उस वक़्त बारिश की बुंदे मेरे बदन को पिघला रही थी.       

      आर्यन ने अपनी नजर होठो से हटकर मेरी चूँचीयो पर टिका दी.         

      लेकिन वह कुछ नहीं कर पाया. उस ने कोशिश की पर वह आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जूटा पाया. वह मुझे घूरता रहा. वह एक कच्चा खिलाडी था. वह मेरी भीगी जुल्फों को हटाकर भाग गया.       

     उस वक़्त मुझे समझ आ गया. वह मेरे कुछ काम का नहीं था.      

      उसके जाने के बाद बारिश में मैं अकेली ख़डी थी.. दिल से नाराज थी. थोड़ी नाराजगी और बेचैनी भी थी. 

      मैं किसी को तरस रही थी. कोई आये और मेरी गर्मी को समजे. उस का उपचार करें.       

       उस रात मैं बिल्कुल सो नहीं पाई थी.. अधूरा एहसास मुझे तड़पा रहा था.     

      उस रात घर पहुंच कर मैं अपनी भीगी कुर्ती उतरकर आईने के सामने नंगी खड़ी होमेरा बदन उस की कायरता को कोष रहा था. जो मेरे दिल को जला रहा था.     

      आर्यन के हाथो का निशान देखकर मुझे उससे अफ़सोस रहा था, क्यों दिल लगाया था?                  .......... ...........        ( क्रमशः)