Monalisa Smile - 5 in Hindi Horror Stories by Sanjay Kamble books and stories PDF | Monalisa Smile - 5

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Monalisa Smile - 5


वह घबराते हुए उठा और स्टोर रूम के दरवाजे की ओर देखा। वह अब आधा खुला था।

"ये… ये कैसे हो सकता है?"

 उसका दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया। खुले दरवाजे से धीरे से भीतर दाखिल हुआ। कमरे के भीतर लाइट नहीं थी। उसने अपना मोबाइल निकाला और टॉर्च शुरू की।

" रमेश , कहां है तू.."

अपने दोस्त को आवाज लगाते हुए वह एक एक कदम आगे बढ़ने लगा। पूरा स्टोर रूम देख लिया, अब वह स्टोअर रूम के आखिरी छोर तक पहुंच गया था। पर उसका दोस्त कहीं नहीं था तभी उसके कानों पर दरवाजा खुलने की आवाज आई। उसने पीछे मुड़कर देखा तो स्टोर रूम के उस दरवाजे से उसका दोस्त बाहर जाता दिखाई दिया। 

" अरे रमेश, रुक जा। कहां जा रहा है।"

अपने दोस्त को आवाज लगाते हुए वह स्टोर रूम के उस दरवाजे के तरफ दौड़ने लगा। स्टोअर रूम काफी बड़ा था। दौड़ते हुए वह दरवाजे तक पहुंचा और बाहर गया तो उसका दोस्त मेंटल एसाइलम के आखिरी छोर पर जाता दिखा और अंधेरे में गुम हो गया। वह रास्ता तहखाने की तरफ जाता था । उसने दोबारा दौड़ लगाई और तेजी से सीढ़ियां उतर कर नीचे आया। पर तभी कुछ कदमों पर स्थीत दाईं तरफ के कमरे का वह दरवाजा एकदम से बंद होने की आवाज आई।

वह उस कमरे के पास पहुंचा और दरवाजा पीटते हुए बोला।

" रमेश मुझे पता है तु अंदर है। जल्दी से मोनालिसा को लेकर बाहर आ, वरना मैं डॉक्टर को फोन कर दूंगा। "
तभी दरवाजा खुलने की आवाज आई। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। पोस्टमार्टम रूम का दरवाजा उसके सामने था—पुराना, जंग खाया हुआ और डरावनी चुप्पी से भरा।

उसने धीरे से हाथ बढ़ाया और कांपते हुए दरवाजे को धक्का दिया। दरवाजा एक अजीब सी चरमराहट के साथ खुला, मानो किसी ने अंदर से उसे जबरदस्ती रोक रखा था।

अंदर घना अंधेरा पसरा था। उसने जैसे ही मोबाइल की टॉर्च जलाने के लिए बटन दबाया, टॉर्च एक पल के लिए चमकी और फिर झपककर बंद हो गई।

कमरे में अंधेरा और भी घना हो गया।

उसने घबराते हुए मोबाइल को जोर-जोर से हिलाया, टॉर्च फिर से जली। हल्की-हल्की रोशनी में उसने चारों ओर नजरें दौड़ाईं।

पोस्टमार्टम रूम की दीवारों पर पुराने खून के धब्बे सूखकर काले पड़ चुके थे। टाइल्स जगह-जगह से टूटी हुई थीं। लोहे के कई जंग लगे औजार एक टेबल पर अस्त-व्यस्त पड़े थे, जैसे किसी ने इनका इस्तेमाल कर किसी को चीरा हो और फिर जल्दी में छोड़ दिया हो।

टॉर्च की हल्की रोशनी में कोने-कोने पर जमी गहरी धूल और मकड़ी के जाले भी साफ नजर आ रहे थे।

फिर अचानक…

बिजली की एक झलक कमरे में चमकी और तुरंत बंद हो गई।

उसका शरीर सुन्न हो गया था।

कुछ देर तक वह हिम्मत जुटाकर खड़ा रहा, लेकिन तभी उसे लगा जैसे कोई उसके ठीक पीछे खड़ा हो। किसी की ठंडी सांसें उसकी गर्दन के पास महसूस हो रही थीं।

उसका गला सूख गया।

उसने घबराकर धीरे-धीरे सिर घुमाया, लेकिन पीछे सिर्फ अंधेरा था।

फिर...

कमरे की बत्तियाँ अचानक एक पल के लिए फिर से जल उठीं और उसने जो देखा, उससे उसकी रूह काँप गई।

सामने पोस्टमार्टम टेबल पर एक सफेद कपड़े में लिपटी हुई लाश रखी थी।

"ये क्या है ?"

उसका बदन बुरी तरह काँपने लगा।

लाश पूरी तरह से सफेद चादर में लिपटी थी, लेकिन उसके पैरों की दिशा कुछ अजीब थी, जैसे शरीर को जबरदस्ती मोड़ा गया हो।

उसने हिम्मत जुटाकर कमरे में आगे कदम बढ़ाया। हर कदम के साथ उसकी धड़कन और तेज होती गई।

फिर...

बत्तियाँ फिर से बुझ गईं!

कमरा दोबारा अंधेरे में डूब गया।

अचानक, उसे अपने पीछे किसी के भारी-भरकम कदमों की आहट सुनाई दी।

"कौन है?" 

उसने कांपती आवाज में पूछा, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

फिर अचानक...बत्तियाँ फिर से जल उठीं, और इस बार उसने जो देखा, उसने उसकी आत्मा को जैसे शरीर से बाहर निकाल दिया।

पोस्टमार्टम टेबल पर पड़ी लाश का सफेद कपड़ा खिसक चुका था। टेबल पर मोनालिसा की लाश सफेद कपड़े में लिपट कर रखी हुई थी। इतनी देर से उसके दिल में बसा डर थोड़ा काम हो गया। मोनालिसा के खूबसूरत जिस्म को देखकर वह बोला।

"साले इतना नाटक करने की क्या जरूरत थी.. अगर सीधे-सीधे बोल देता के पुराने पोस्टमार्टम रूम में आ जाना, तो मैं आ जाता..। चल अब तु भी बाहर आ। बहुत काम करना है । " 

इतना कह कर वह अपने दोस्त को इधर उधर ढुंढते हुए आवाज लगाने लगा।‌ तभी उसे अपने पीछे कुछ हलचल होती सुनाई दे। उसने पीछे मुड़कर देखा तो पोस्टमार्टम टेबल पर पड़ी उस लाश का चेहरा दोबारा किसी ने ढक दिया था। 

" रमेश नाटक बंद कर बाहर आ। और क्या इसका मुंह ढक रहा है। "

कहते हुए उसने झट से लाश के ऊपर से झट से वह सफेद कपड़ा पुरी तरह से हटा दिया। और सामने का नज़ारा देख जैसे उसके दिल ने एक पल के लिए धड़कना ही बंद कर दिया। पोस्टमार्टम टेबल पर मोनालिसा की नहीं बल्कि उसी के दोस्त की लाश पड़ी थी। वो भी उसके पेट के उपर का ही हिस्सा था। आधी लाश गायब थी। कांपते हाथों से उसने टोर्च की रोशनी फर्श पर डाली तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई तो पूरी जमीन खून से लाल हो गई थी। उसके हाथ-पैर सुन्न हो गए।

और तभी टेबल पर पड़ी लाश के मुंह से एक दर्द भरी कराह निकली जिसे सुनकर वह डर के मारे एकदम से पीछे की तरफ हट गया पर खून पर पैर फिसलने की वजह से वो जमीन पर गिर पड़ा और उसी के साथ मोबाइल बंद हो गया। फर्श पर फैले गीले चिपचिपे खून से उसका शरीर भीग चुका था। उस बेहद डरावने और घिनौने अहसास ने उसे भीतर से झकझोर कर रख दिया था।

अंधेरे में उसे सिर्फ अपने इर्द-गिर्द किसी की खौफनाक मौजूद की महसूस हो रही थी । घबराकर उसके हाथ जमीन पर गीरे मोबाइल को तलाश रहे थे पर हाथ लग रहा था तो खून और सिर्फ खून। उसने पीछे मुड़कर देखा तो दरवाजा आधा खुला था। वह झट से उठा और दरवाजे की तरह दौड़ने लगा। पर लग रहा था जैसे कोई उसी तेजी के साथ उसपर झपटने के लिए दौड़ रहा है। पर वो पुरी जान लगाकर दरवाजे की तरफ दौड़ने लगा। सांस फूलने लगी, दिल जोर से धड़कने लगा, , गला सूख चूका था। आंखों में मौत का साया नजर आने लगा, अब उसे अपना अंत नजर आ चुका था। वो डरावना साया उसपर झपट ही पड़ा था पर तभी वो दरवाजे से बाहर निकल गया। उसके साथ ही दरवाजा बंद हो गया। पर बगैर पीछे मुडे वो दौड़ता रहा। गिरते-पडते हैं वह तहखाना से बाहर निकाला और ऑफिस रूम की तरफ भागने लगा। दौड़ते हफ्ते ऑफिस रूम के भीतर पहुंचा और लैंडलाइन कनेक्शन से डॉक्टर को फोन लगाया।  

" डॉक्टर... डॉक्टर... डॉक्टर साहब, जल्द से जल्द अस्पताल आईये। "



"क्या हुआ.. तुम इतना हांफ क्यो रहे हो ?"



" डॉक्टर साहब ,यहां कुछ भयानक हो रहा है। आप जल्दी आईये।"



" क्या बकवास कर रहे हो ? तुम होश में तो हो या पी रखी है ?"



"डॉक्टर साहब, मां कसम मैंने शराब नहीं पी। आप जल्दीसे यहां आईये, वो मोनालिसा की लाश गायब हो चुकी है, और रमेश।" 

इतना कहकर वो फूट-फूटकर रोने लगा।

 "रमेश को क्या हुआ ? और तु रो क्यों रहा है ?"



" रमेश को किसी...."

 आगे कुछ बोलता इससे पहले फोन कट हो गया और बाहर कहीं शॉर्ट सर्किट से बिजली चली गई। अब पूरे अस्पताल में जानलेवा अंधेरा और गहरी खामोशी फैल गई। और उस खामोशी में उसे अपने दिल की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी। छोटी सी आवाज भी होती तो वह सिहर उठता। बीना आवाज किए उसने धीरे से टेबल का ड्रावर खिंचकर भीतर हाथ डालकर टटोलने लगा, एक टॉर्च हाथ लग गई। बटन दबाकर टॉर्च शुरू की और उस टोर्च की रोशनी में अपने आजू-बाजू देखने लगा। पर गहरी खामोशी के अलावा से कुछ नहीं था। तभी उसे अपने कमरे के बाहर किसी के चलने की आवाज सुनाई दी। पर बाहर जाकर देखने की उसमें बिल्कुल भी हिम्मत नहीं थी। वो चुपचाप उस कमरे के एक कोने में दुबककर बैठा डॉक्टर साहब का इंतजार करने लगा। रह-रहकर उसका शरीर सिहर उठता। तभी झट से दरवाजा खुला और......


क्रमशः