Nafrat wala Pati, Mohabbat wali Jindagi - 3 in Hindi Motivational Stories by Rameshvar Gadiya books and stories PDF | नफ़रत वाला पति, मोहब्बत वाली ज़िंदगी - 3

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नफ़रत वाला पति, मोहब्बत वाली ज़िंदगी - 3

अस्पताल से घर लौटते वक्त अर्जुन ने मेरा हाथ पूरे रास्ते नहीं छोड़ा।
पहले जो आदमी मुझसे दूरी बनाकर रखता था…
आज वही मेरी उंगलियाँ ऐसे थामे हुए था जैसे डर हो कि मैं फिर कहीं खो न जाऊँ।
गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए मैंने धीरे से पूछा—
“आप इतने चुप क्यों हैं?”
वह कुछ पल मुझे देखता रहा।
“अगर उस रात तुम्हें कुछ हो जाता… तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाता,” उसकी आवाज़ भारी थी।
मेरे दिल में हल्की-सी मुस्कान आ गई।
“तो आपको फर्क पड़ता है?”
उसने गाड़ी साइड में रोकी।
पहली बार… उसने बिना झिझक मेरी आँखों में देखा।
“फर्क?”
“मीरा… तुम अब मेरी आदत बन चुकी हो।
और आदतें इतनी आसानी से नहीं छोड़ी जातीं।”
मेरे गाल हल्के-से लाल हो गए।
घर पहुँचे तो उसने सबको सख्त हिदायत दे दी—
“मीरा की देखभाल में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।”
मैं कमरे में बैठी थी।
कंधे पर पट्टी थी, हल्का दर्द था… लेकिन दिल में अजीब-सी शांति थी।
दरवाज़ा धीरे से खुला।
अर्जुन अंदर आया।
उसके हाथ में दूध का गिलास था।
मैं हैरान रह गई।
“आप…?”
वह हल्का-सा मुस्कुराया।
“डॉक्टर ने कहा है दवा के साथ दूध जरूरी है।”
मैंने चिढ़ाते हुए कहा—
“इतनी परवाह क्यों?”
वह मेरे सामने बैठ गया।
“क्योंकि तुमने मेरे लिए गोली खाई है।”
कमरे में सन्नाटा था।
मैंने धीमे से कहा—
“अगर फिर से मौका मिले… तो फिर खाऊँगी।”
वह अचानक गंभीर हो गया।
“ऐसी बात दोबारा मत कहना,” उसकी आवाज़ गहरी थी।
वह धीरे-धीरे मेरे करीब आया।
इतना करीब… कि उसकी साँसें मेरे चेहरे को छू रही थीं।
“तुम्हें अंदाजा भी है, तुम्हारे बिना मैं क्या बन जाऊँगा?”
मैंने फुसफुसाकर पूछा—
“क्या?”
“खाली…” उसने आँखें झुका लीं।
उस एक शब्द में इतना दर्द था कि मेरा दिल भर आया।
मैंने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया।
“तो फिर मुझे कभी दूर मत कीजिए।”
उसने पहली बार बिना डर के मेरा हाथ थामा।
मजबूती से… अपनेपन से।
रात गहरी हो चुकी थी।
बारिश फिर से शुरू हो गई थी।
मैं बालकनी में खड़ी थी। ठंडी हवा मेरे चेहरे को छू रही थी।
अचानक पीछे से गर्माहट महसूस हुई।
अर्जुन ने धीरे से मेरे कंधों पर शॉल डाल दी।
“ठंड लग जाएगी,” उसने फुसफुसाकर कहा।
मैंने पलटकर उसकी तरफ देखा।
“आपको कैसे पता मुझे बारिश पसंद है?”
वह हल्का-सा मुस्कुराया।
“शादी के बाद से हर बार जब बारिश होती है… तुम चुपके से बालकनी में आ जाती हो।”
मैं चौंक गई।
“आप नोटिस करते थे?”
“तुम्हें लगता है मैं कुछ नहीं देखता?” उसकी आँखों में शरारत थी।
दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
बारिश की बूंदें हवा के साथ अंदर आ रही थीं।
वह मेरे और करीब आ गया।
“मीरा…” उसने मेरा नाम बहुत धीमे से लिया।
मेरी सांसें रुक-सी गईं।
“क्या अब भी तुम्हें लगता है कि मैं तुमसे नफ़रत करता हूँ?”
मैंने सिर हिलाया—
“नहीं…”
“तो फिर?” उसने धीरे से पूछा।
मैंने हिम्मत जुटाई।
दिल जैसे बाहर आ जाएगा।
“तो फिर शायद… आप मुझसे प्यार करते हैं।”
वह कुछ पल मुझे देखता रहा।
फिर उसने अपना माथा मेरे माथे से टिका दिया।
“शायद नहीं,” उसकी आवाज़ धीमी और सच्ची थी,
“मैं सच में तुमसे प्यार करने लगा हूँ।”
मेरे दिल की दुनिया जैसे रुक गई।
इतने दिनों की दूरी… नफ़रत… गलतफहमियाँ…
सब उस एक इकरार में पिघल गईं।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
उसने धीरे से मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया।
उसकी उंगलियाँ मेरे गालों को छू रही थीं…
नरमी से… सावधानी से… जैसे मैं कोई कीमती चीज़ हूँ।
“तुम्हें खोने का डर मुझे हर पल सताता है,” उसने स्वीकार किया।
मैंने हल्के से मुस्कुराकर कहा—
“तो मुझे अपने पास रखिए।”
उसने धीरे-धीरे झुककर मेरे होंठों के करीब आकर रुक गया।
“अगर तुम मना कर दो तो?” उसने फुसफुसाया।
मैंने आँखें खोलकर उसकी तरफ देखा।
“आज नहीं…”
और अगले ही पल… हमारे बीच की दूरी खत्म हो गई।
वह स्पर्श तेज़ नहीं था…
न ही अधीर…
बल्कि गहरा… सच्चा… और अपनापन भरा।
जैसे दो टूटे हुए दिल पहली बार एक-दूसरे में सुकून पा रहे हों।
बारिश की आवाज़, धड़कनों की रफ्तार…
सब मिलकर उस पल को हमेशा के लिए यादगार बना रहे थे।
कुछ देर बाद मैं उसकी बाहों में थी।
उसका हाथ मेरे बालों में उलझा हुआ था।
“मीरा…” उसने धीरे से कहा।
“हम्म?”
“अब चाहे दुश्मन कितने भी क्यों ना हों…
मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
मैंने उसकी छाती पर सिर रखकर कहा—
“और मैं भी अब आपकी ढाल बनूँगी।”
वह हल्का-सा हँसा।
“मेरी बहादुर पत्नी…”
दिल में अजीब-सी खुशी थी।
लेकिन उसी वक्त नीचे गार्ड की आवाज़ आई—
“सर! कोई आपसे मिलने आया है।”
अर्जुन ने भौंहें सिकोड़ीं।
“इस वक्त?”
मैंने उसका हाथ पकड़ा।
“मत जाइए…”
वह मेरी तरफ झुका।
“अब मैं कहीं नहीं जाऊँगा बिना तुम्हें बताए।”
उसने मेरे माथे को चूमा और बाहर चला गया।
मैं बालकनी से नीचे झांककर देखने लगी।
एक काली गाड़ी खड़ी थी।
उसमें से एक महिला उतरी।
उसकी चाल में आत्मविश्वास था…
और आँखों में कुछ खतरनाक।
अर्जुन उसे देखकर ठहर गया।
मेरे दिल में हल्की-सी बेचैनी हुई।
वह महिला कौन थी?
और क्यों अर्जुन के चेहरे पर अचानक तनाव लौट आया?
क्या हमारी मोहब्बत को फिर कोई तूफान आने वाला है?
(जारी रहेगा…)