Aise Budhe Bail ko kun bandh bhus det in Hindi Short Stories by Devendra Kumar books and stories PDF | ऐसे बूढ़े बैल को कौन बांध भुस देत

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ऐसे बूढ़े बैल को कौन बांध भुस देत

ऐसे बूढ़े बैल को कौन बांध भुस दे

उपरोक्त देशी कहावत मैंने दो अवसरों पर सुनी थी, दोनों अलग सन्दर्भ थे अलग अलग तरह लोगों के मुंह से इसे सुना था. पहली बार तो कहावत बूढ़े गौ पुत्र वृषभ के लिये ही बचपन में सुनी थी, जिसे दया का बिजार कहते थे. दूसरी बार बड़ा होने पर अपने सबसे चहेते कन्हैया चाचा के बारे में जो बचपन से ही मेरे हीरो रहे थे. पहली बार कुछ कहावत सामान्य लगी थी पर दूसरी बार सुन कर बहुत क्षोभ हुआ था. जब भी कहीं भी इस कहावत को देर सबेर सुनता हूँ. दोनों किस्से बरबस याद आते चले जाते हैं. यह बात अलग है कि यह मुहावरा कम ही प्रचलित होगा, गाँव देहात में हमारे मेरठ मुज़फ्फरनगर क्षेत्र के कस्बों व गांवों में कभी कभाक सुनने को मिल जाता है.

 पश्चिमी उत्तरप्रदेश के उपजाऊ कृषि क्षेत्र में अब बैलों की खेती बची ही कहाँ है? बेचारे बूढ़े बैल क्या जवान बछड़े भी सडक पर धूल खाते वाहियात घूमते फिरते हैं, गाय की केवल बछिया ही आजकल काम की हैं. सो अब तो न बूढ़े ना जवान बैल कोई उन्हें अब बाँध कर भूसा नहीं खिलाता. ये वैसे ही इधर उधर आवारा घूमते फिरते धक्के खा रहे हैं, सो अब बैलों की बिरादरी की बेहद बेकदरी हो चुकी है. हाँ यह कहावत मेरी याद में पक्की चिपकी हुई है. उन से जुडी दोनों सत्य घटनाएं मैं भूल ही नहीं पाया हूँ.

पहली घटना मेरे बचपन की है जब हमारे पडौस में सडक के दूसरी पार एक पुराना पीला एक मंजिला मकान था उसमें एक अकेली बुज़ुर्ग महिला रहती थी, उसे सभी मुहल्लेवाले ‘जानसठ वाली’ के नाम से पुकारते थे. वह कभी कुछ दिन रहती, कभी काफी दिनों के लिये मकान बंद रहता था. मकान में दो तरफ सडक तथा पीछे पतली गली थी. जानसठ वाली बहुत साफ़ सुथरी क्या अपनी उम्र के हिसाब से खूब सज धज कर रहती थी, अक्सर उजली सफ़ेद या क्रीम कलर की गोटा लगी साडी पहनती थी, आँखों में सुनहरी पतले रिम का चश्मा, मुंह में सुगन्धित पान की गिलोरी रहती हाथ में एक पानदान रखती और विशिष्ट दिखाई देती थी. जब तक घर में रहती उसके पास एक महिला नौकरानी उसकी देखरेख के लिये साथ रहती थी साथ चलती थी. मुहल्ले पडौस में शादी विवाह, सगाई या कोई भी कथा आयोजन हो उसमें न केवल शामिल होती बल्कि उसके लिये लोगबाग उसकी सलाह से आयोजित करते क्योंकि वह दिमाग से तेज और प्रैक्टिकल थी. उसके बारे में बताया गया था कि उसके फौजी पति की दूसरे विश्वयुद्ध में फ्रांस में मौत हो गयी थी. उनके घर के दरवाजे हमेशा बंद रहते थे. फिर एक दिन नौकरानी को लेकर रिक्शा में बैठ कहीं चली जाती थी. ऐसे समय वह मुझे उड़न खटोले वाली बुढिया लगती जो ‘चल में चरखे चक्कर चूं, कौन साली बुढिया कौन साला तू’ कह कर उड़न खटोले में छू मंतर  हो जाती थी. फिर एक दो महीने बाद फिर अचानक प्रगट हो जाती थी. घर में ऐसे रहने लगती कभी गयी ही ना हो.

हां, जानसठ वाली बुढिया के बराबर की पतली सडक पर एक परिवार था जो बिलकुल अलग तरह का नमूना था. परिवार था मंडी के बदनाम सट्टेबाज़ महबूब सिंह का, जो लगभग 45-50 उम्र का था, काला भुसंड, बहुत हल्ला गुल्ला मचाने वाला, जिसकी एक दुकान बाज़ार में थी जिसमें  रस्से-रस्सी, बान, खाट, खटोले, टोकरा, टोकरी, गाय आदि पशुओं के खली बिनौले मिलते थे, पर वह तो फ्रंट या कवर जॉब था, असली धंधा तो सट्टे का था, सब यही कहते थे कि महबूब सट्टा खिलाता है पर कैसे खिलाता है? मुझे कभी समझ में नहीं आया, उसके पास दो कर्मचारी भी थे वे भी उसी की तरह हट्टे खट्टे थे अतः उसकी दादा गिरी बाज़ार में भी रहती थी. उसकी पत्नी का नाम था दया,  दोनों की उम्र में काफी अंतर था या लगता था और एक थी 10- 11 साल की बेटी भी जो जन्म से काफी मंद-बुद्धी बालक थी, ठीक से बोल भी नहीं पाती थी. वे हमेशा गाय रखते थे कभी दो कभी एक. इन सब के अलावा उनके यहाँ एक बूढा वृषभ था जो कभी बहुत पहले उनकी किसी गाय का बछड़ा था पर महबूब की पत्नी दया, ने अपने पास रख छोड़ा था वह इधर उधर घूमता रहता पर खाने पानी के लिये वह उनके घर पर आ जाता. उसे सब ‘दया का बिजार’ कहते थे, दया को उससे प्यार भी था. उसके बचपन से ही दया उसको अपने घर का सदस्य मानती थी. नाम के अनुसार उसमें दया थी, कुत्ते बिल्ली भी उसने पाल रखे थे.        

 कुछ लोगों का कहना था कि दया के बिजार की माँ दया के मैके से आई थी, इसीलिये दया उस पर ज्यादा मेहरबान थी, वर्ना कभी कोई घूमता पशु उनके पशु की खोर(नादं) में मुंह मारने लगता तो महबूब लाठी से पीटतेपीटते  दूर खदेड़ कर आता था.

महबूब और दया की जोड़ी बड़ी ही अजीब थी. दया में नाम के अनुसार दया भाव था और महबूब बेहद खराब स्वभाव का था बात बात में माँ बहिन की गाली बकता, और उसकी बदमाशी और सट्टेबाजी के लिये गुण भी हो क्योंकि दबदबे के कारण वह गैर कानूनी सट्टेबाजी का धंधा करता था. उसके पास दो लठैत टाइप के कर्मचारी थे जो उसके धंधे में मदद भी करते थे तथा उधार आदि में उगाही में भी. कई बार पुलिस उसे मार पीट आदि की शिकायत में पकड़ कर भी ले जाती थी पर एक दो दिन बाद छुट कर आ जाता था, क्योंकि उसके विरुद्ध कोई गवाही देने के लिये तैयार ही नहीं होता था.

सिर्फ महबूब ही नहीं दया के बिजार से भी आस पास के लोग तंग थे, सडक पर गुंडे की तरह मदमस्त घूमता और कोई उसके पास से मजाल गुजरने की जुर्रत तो कर के देखे टक्कर मार गिरा देता था, कई लोगों को आहत कर चुका था, कई रिक्शाओ को उलट चुका था. जानसठ वाली को न महबूब- दया का परिवार और नहीं उनका बिजार बर्दाश्त था, एक बार बिजार ने टक्कर मार कर उसे भी गिरा दिया था, उसने बिना महबूब से उलझे एसडीएम के पास वाहियात जानवर के लिये शिकायत दर्ज करा दी. असल में जानसठ वाली अपने आप को महत्वपूर्ण मानती थी, क्योंकि वह एक ऊँचे तगमा पाने वाले शहीद फौजी जेसीओ के पत्नी थी जिसे फौज से उसे पेंशन मिलती थी तथा सरकार ने ज़मीन भी दी थी. उसके पति को दूसरे महायुद्ध में फ्रांस के मोर्चे पर वीरता के लिये मरणोपरांत ‘जॉर्ज क्रॉस’ मिला हुआ था जो बड़े सम्मान की बात थी, इस बात को बताने में वह कभी चूकती नहीं थी और इसका असर भी पड़ता था.  शिकायत का प्रभाव हुआ कि अगले दिन ही कुछ लोग कांजी हाउस से आये और दया के बिजार को घेर घार पकड़ कर कांजी हाउस में बंद कर दिया, और बूढ़े बैल का बैठा कर भुसा बंद हो गया था. सुना है कि दया का बिजार वहां ज्यादा दिन नहीं जी पाया था.

 इस घटना से जानसठ वाली मुहल्ले की प्रिय और महबूब और परिवार की दुश्मन बन गयी. महबूब ने मुहल्ले को सर पर उठा लिया था, खूब गाली गलोच किया, अब दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने में लग गए थे, उसी वाक-युद्ध में यह अनमोल बोल जानसठ वाली से पूरे मुहल्ले ने कई बार सुना था, ‘ऐसे बूढ़े बैल को कौन बाँध भुस दे’, महबूब को यह हार बर्दाश्त नहीं हो रही थी उसने अपने लठैत का डर पड़ोसन को दिखाया, दो दिन तक जानसठ वाली के दरवाजे बंद रहे, वह अन्दर से सुनती रहा और देखती रही और दो दिन बाद जानसठ वाली के दो जवान बेटे भी आ गये, इस बार उसने कोतवाली जाकर महबूब और उसके लठैत चमचों के खिलाफ ऍफ़आईआर दर्ज करा दी कि उनसे जान का खतरा है, अगले दिन पूछताछ के लिये दोनों जानसठ वाली और महबूब को  थाने बुलाया गया, जानसठ वाली के बेटे भी साथ थे, वे अपने साथ मुहल्ले से दो अन्य लोगों को भी ले गए थे जो पक्ष में गवाही दे सकें, पूरी बात सुन कर रोबदार थानेदार ने महबूब को सख्त शब्दों में ताकीद कर दिया कि लिखित माफ़ी मांगे ‘ और एक ‘मुचलके पर हस्ताक्षर करे’ यह सब होने पर जान तो छुटी पर थानेदार ने कहा, इस बार छोड़ दिया अगले बार ज़रा भी गलती की तो सारी उम्र जेल में चक्की भूल जाओगे’.

उस दिन ऊँट पहाड़ के नीचे आया था, और महबूब  ने पुलिस के थानेदार के सामने सिर झुका कर गलती मान ली थी. वह मुहल्ले बाज़ार में पंगा ले लेता था पर पुलिस से कैसे लेता. वह कई दिन मुंह छिपा कर रहा. इससे उसके अहम् को काफी चोट लगी. दया को उसके बिजार के पकडे जाने पर बेहद अफ़सोस हुआ.

जानसठ वाली की धाक सभी मुहल्ले वाले मान गए थे. वह अपनी तीन पुत्रों और तीन बहूँओं पर भी पूरा रोब ग़ालिब रखती थी, उन के पास चली जाती पर किसी के ऊपर निर्भर नहीं होना नहीं चाहती थी, साफ़ कहती थी कि उसकी बहूएँ उसको इसलिये अपने पास रखना चाहती हैं ताकि उसकी पेंशन उनके घर में काम आये, और उसे यह मंज़ूर नहीं था वह किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहती थी सो वह उनके पास घूम आती थी. पर अपना खूंटा अपने पीले मकान पर गाड़ कर रखती थी. बेटे बहूओं को मालूम था कि सब अधिकार उसने अपने पास रखे हुए थे. जानसठ वाली उन्हें साफ़ कर चुकी थी कि वह मोहताज़ नहीं है जिस के माथे वह अपनी पेंशन मारेगी वही उसकी सेवा करेगा.

एक दिन औरतों की मंडली में उन्हें समझा रही थी कि समय से पहले अपने पत्ते नहीं खोलने चाहिए, उसने अपने जानसठ के अनुभव ने यह दिखाया था कि कई बार बहकावे में आकर किसी ने सब कुछ सोंप दिया जिसके बाद बहू ने बेटे को झूटे सच्चे बरगलाया और बुज़ुर्ग माँ पर जब ताने नहीं सुने गए वह वृन्दावन चली गयी जहाँ उनकी तरह की बहुत सी सताई हुई, घर से निकाली विधवा माताएं अपना अंतिम समय गुजारती हैं. ज्यादातर महिलाओं ने उसकी बात के पक्ष में हामी में सिर हिलाया. जानसठ वाली उनकी नेता बन गयी थी. उसी मंडली में सास बहू की आपस की कलह और लडाई की भी चर्चा आई जिनकी लड़ाई में बेटा पीसा जाता   है.सडक के पार एक कमरे में पूरे परिवार के साथ रहने वाली लम्बी पंजाबन ने भी पक्ष रखा कि केवल बहू को दोष नहीं देना चाहिए पुत्तर भी ज़िम्मेदार होते हैं, और उसने पंजाबी की कहावत सुनाई,

“ तवा होवे भारी ते रोटी सड़े क्यूं, पुत्तर होवे चंगा तो सास नूह लडे क्यूं .

घुडसवार होवे तगड़ा ते घोडा अड़े क्यूं, नीयत होवे साफ़ ते बंदा भुक्खा मरे क्यूं.   

उसकी बात सुन कर सब महिलायें खूब हंसी, और जानसठ वाली ने उसके इस पंजाबी कथन को खूब सराहा.  कहा कि ‘ऐसी पुरानी बातें बहुत काम की होती हैं’.

शायद सास बहू के बीच के महाभारत शाश्वत है केवल समय के अनुसार उनके रूप बदलते जा रहे हैं, आज कल की सास तो यह कहती सुनी गयी है कि जब वे बहू थी सास की सेवा करनी पड़ती थी और अब सास बनने पर उनको अपनी बहू की सेवा करनी पड़ती है, जैसे ही बहू ऑफिस से लौट कर आती है चाय बना कर तैयार रखनी पड़ती हैं. पहले सास बिना बात बहू के नुक्स, निकालती थी कि आटा गुन्द्ती हिलती क्यूं हैं, भला बिना हिले कैसे यह सम्भव था.आज कल सास की कमियां मॉडर्न कमाऊँ बहूएं गिनाती थकती नहीं हैं.

दया के बिजार का ईलाज तो जानसठ वाली ने कर दिया, जिस से  बहुत लोगों  को राहत मिली थी और जानसठ वाली को मुहल्ले की महिला वर्ग का सम्मान और प्रतिष्ठा. अब लोगों को समझ में आ रहा था कि बूढ़े होने पर बुजुगों को अपने बच्चों झुकने की आवश्यकता नहीं है अगर उनके पास जो कुछ है उसे संभाल कर रखे और बच्चों पर पूरी तरह से आश्रित ना हों. यह थी दया के बूढ़े बैल की और उस को भुस डालने की, अब शुरू करते है दूसरा किस्सा.

मेरे बचपन की सबसे ख़ास शख्सियत, अविस्मर्णीय इंसान मेरे कन्हैया चाचा थे जिसके गाँव से आने का मुझे बड़ा इंतज़ार रहता था, लगभग छ फिट के बलिष्ट गबरू जवान जिनकी उम्र लगभग 26-27 की होगी बस कम पढ़े लिखे थे, उस समय के हिसाब से गाँव में और शहर में जैसी भी जगह हो उस में एडजस्ट हो जाते थे, मुश्किल से सिफारिश करके मेरे पिताजी ने उनकी नौकरी मार्केटिंग इंस्पेक्टर के ऑफिस में कामदार के पद पर लगवा दी थी, उसी ऑफिस में एक कमरे में रहते थे जो मंडी के हमारे मकान से ज्यादा दूर नहीं था. उन्हें कुश्ती का शौंक ही नहीं उससे भी ज्यादा कहना चाहिए जुनून था. उन्हें हमेशा पता रहता था कि कब और कहाँ दंगल होने वाला है और जाकर उनमें भाग लेते और ज्यादातर जीत कर आते थे वहां इनाम में जो राशि मिल पाती उसे उड़ाने के लिये ज्यादातर वे खाने पीने, विशेष रूप से शाम को हलवाई की दूकान का लम्बे गिलास वाला दूध जिसमें मोटी मलाई की परत और गरम ज़लेबी, पर खर्च करते. हमारे घर में गाय थी दूध की कमी नहीं थी पर चाचा के साथ जाकर हलवाई की दुकान का दूध ज्यादा स्वादिष्ट लगता था. चाचा के मोटे मुगदर मुझ से हिलते भी नहीं थे, वह सुबह दिन निकलने से पहले दौड़ लगा कर दंड बैठक लगाता, मालिश करता. उस के मसल्स देखते ही बनते थे.

 असल में छोटेपन से ही उसे कुश्ती का चस्का लग गया था,थोडा बड़ा होने पर गाँव के बड़े बूढों ने उसे बहुत प्रोत्साहन दिया, उसकी खुराक का इंतजाम किया जिसमें घी दूध व बादाम की भरपूर मात्रा होती, पंद्रह सोलह वर्ष का होते होते वह गाँव का सबसे कुशल पहलवान बन चुका था. उसे भी कुश्ती का चस्का कुछ ज्यादा लग गया था. कहता है कि कुश्ती जीतने पर जो तालियाँ और शोर होता है उसका नशा ही कुछ और होता है. खेत की ज़मीन कम थी, कई भाई थे अतः घर वालों के लिये कोई एतराज नहीं था के वह खेती करे या ना करे. शादी का समय आने पर भी कुश्तियों के चक्कर में उसने शादी नहीं की, उसके छोटे भाईयों की भी हो गयी धीरे धीरे वह उम्र में बड़ा हो गया था तथा उसकी शादी नहीं हो पाई थी.

 इस तरह वह मुज़फ्फरनगर आ गए और छोटी नौकरी करने लगे थे, चाचा शरीर के मज़बूत थे खाने पीने और मेले, सिनेमा, सर्कस के शौक़ीन परन्तु कोई काम न होने के कारण परेशान थे, उम्र बढ़ने पर कुश्ती में नए जवान पहलवान कई बार उन पर भारी पड़ने लगे तो उन्हे अंदाजा होने लगा था कि कुश्ती से अब इनामी रकम ज्यादा मिलने वाली नहीं है सो कोई नौकरी कर लेनी चाहिए. मेरे पिताजी उन से उम्र में काफी बड़े थे और उनके शौक को वे वाहियात फ़िज़ूल खर्च मानते थे. कन्हैया चाचा मुझे अपने साथ ले जाने से वे नाराज़ होते कि खुद तो बिगड़ गया है इस लड़के भी बिगाड़ रहा है. पता नहीं मेरे पिताजी से क्यों इतना डरते और घबराते कि जहाँ तक हो सके सामने नहीं पड़ते थे. उन के खाने का कोई ठिकाना नहीं था, कभी मंडी के ढाबे में काटे कभी घर कभी अपने किसी पहलवान दोस्त के गाँव में जाकर. मेरी अम्मा परेशान होती क्योंकि अगर खा कर नहीं आया तो फिर दोबारा चूल्हा चौका शुरू करना पड़ता, खुराक भी इतनी थी कि बची थोडी दाल सब्जी से तो काम नहीं चलता था रोटी भी दस बारह से कम नहीं. पांच सात दिन रह कर वो अचानक गायब हो जाते थे यही कई वर्ष चला होगा.

यहाँ पर एक दो घटना का उल्लेख करना अच्छा रहेगा, मुज़फ्फरनगर उन दिनों शांत और साफ़ सुथरा शहर था, नई मंडी का एरिया सजो नया बसा था ज्यादा ही पॉश था, सेठ, व्यापारी डॉक्टर वकील और दुकानदार लोग ही बहुसंख्य थे. चौडी गली मुख्य बाज़ार था, जहाँ सब सामान की दुकाने थी. साथ की वकील रोड पर वकीलों के  अलावा गुड खंडसारी, अनाज के बड़े व्यापारी, शुगर एजेंट आदि भी थे, तौ उनसे पैसा ऐंठने वाले एक दो गुंडे थे, वे दादागिरी करते, छुरेबाजी भी करते उनमें सबसे बड़ा मंडी का गुण्डा प्रेम नाम का था, जिस भी दुकान से   उसे कुछ चाहिए ले लेता, पैसे देना उसके लिये बड़ी हिमाकत की बात थी, हम सुनते थे कि दुकानदार आदि उसे हफ्ता देते हैं. जब वह अकेला या एक दो अपने गुर्गों के साथ सडक खाली हो जाती थी, लोग फुसफुसाते                ‘प्रेम आ रहा है’ और सब साइड हो जाते. सुना था सबसे हफ्ता लेता था.

एक दिन जब मैं सातवीं में पढता था, हम दोनों चचा भतीजा  खाना खाने के बाद दूध ज़लेबी के लिए हलवाई की दूकान की और जा रहे थे, वहां मंडी की चौड़ी गली पर में सामने से प्रेम गुण्डा मदमस्त चाल से आ रहा था उसे आता देख कर मैं तो एक तरफ हट गया पर चाचा सामान्य रूप से चलता रहा जिससे प्रेम का कन्धा चाचा के कंधे से टकरा गया, प्रेम अकड कर गुर्राया, “अबे साले अँधा है, हमें टक्कर मारी”

चाचा न कहा, “भई, तुम तो आँख वाले हो तुम बच जाते, मैंने कोई टक्कर नहीं मारी बस लग गयी”.

 मंडी के दादा प्रेम को अपने साम्राज्य में उल्टा ज़बाब कहाँ मंज़ूर था कि उसके इलाके में कोई उसे ऐसा उत्तर देने की जुर्रत करे, वह बिगड़ कर गुर्राया, “ स्साले, मुझे जानता नहीं कौन है? बारह इंची से तेरी आंते बाहर निकाल दूंगा उल्ले के पट्ठे.”

इससे पहले कि प्रेम अपना चाकू निकालता चाचा का असली अढाई किलो का झापड़ प्रेम गाल पर पड़ा और प्रेम  गिरते गिरते बचा. प्रेम ने तैश अपना रामपुरी चाकू निकाल कर बटन दबा कर खट से चाक़ू खोला, चाचा ने अपने पैर की ग्यारह इंची गाँव में बना जूता निकाला और लगातार उसके मुंह और सर पर मारे और प्रेम के  हाथ से उसका चाकू छीन कर दूर फेंक दिया, प्रेम नीचे गिरा और उठ कर जान बचा कर भाग रहा था और चाचा अपना जूता लिये उसे मारता कुछ दूर तक गया. फिर रूक गया बाज़ार वालों ने ऐसा दृश्य नहीं देखा था, कईयों के मुंह खुले रह गए थे, चाचा हीरो बन गया था, मैं खुश था, देख कर मज़ा भी आया पर मुझे एक भय भी  सता रहा था कि कहीं प्रेम ने मुझे चाचा के साथ देखा तो नहीं, कभी वह मुझ से बदला न ले. खैर दूध और ज़लेबी खा कर घर जाकर चुपचाप सो रहा, पिताजी को अगर पता लगता कि चाचा ने बाज़ार में मारपीट की है तो वे बहुत गुस्सा होते. मेरे कई साथी बड़े खुश हुए थे यह जान कर कि प्रेम जैसे गुंडे की सरे बाज़ार पिटाई करने वाला मेरा चाचा था. मुझ से यह भी कहते थे कि मैं अपने चाचा से दूसरे गुंडे हकीम जी के बेटे हरि जिसे सब ‘हकीम की बोतल’ कहते थे की भी पिटाई करवा कर उसके हेकड़ी बंद करवा दूं.

चाचा ने एक दिन शाम को घर आकर हमें बताया कि वह उस दिन हलवाई की दुकान पर एक पहलवान दोस्त से  एक साथ 40 रसगुल्ले खाने की शर्त जीत कर आ रहां है, दूसरे कमरे में पिताजी ने यह सुन लिया था, उन्हें यह कहाँ पसंद आता, उन्होंने चाचा को हुक्म दिया

“कन्हैया अपनी खाट घर के बाहर निकाल, उलटे सीधे काम करता है अब रात भर हगता फिरेगा.”

 और यही हुआ था उस रात, 40 रसगुल्लों ने उसकी हालत खराब कर दी थी वह रात भर पाखाने में आता जाता रहा था और सुबह पिताजी के उठने से पहले वह कहीं चला गया था कि डांट की डबल डोज पड़ने वाली थी. ऐसी रंगीन तबियत और शौंक वाला था चाचा था, अपने सब भाईयों से अलग. और मैं उस का ज़बरदस्त फैन था.

हाँ, चाचा मुझे महीने में चुपचाप पिताजी से छिपा कर एक दो सिनेमा दिखा ही देते थे, नुमायश, मेले, सर्कस में ले जाते ही रहते थे. पिताजी को शिकायत रहती थी कि ‘कन्हैया खुद बिगड़ा हुआ है और मुझे भी बिगाड़ता जा रहा है’.

 एक बार जब वह भोपा नामक कस्बे में दूसरी नौकरी में सहकारिता विभाग में एक छोटे पद पर नौकरी करने लगा था, मैं उससे वहीँ मिलने साइकिल पर ही वहां गया था. जब मैं उसके कमरे में पहुंचा दरवाजा अन्दर से बंद था, तथा “हूँ हूँ” की आवाज़ आ रही थी वहां जाकर देखा वह दंड पेल रहा था, जब उसके 1000 दंड पूरे हुए तब उठा. सर्दी के मौसम में वह पसीने से लथपथ भीगा  हुआ था, मैंने कहा “ चाचा इतने दंड लगाने से शरीर को नुक्सान हो सकता है.” सुनकर बस मुस्कुरा दिया था. उसके घर में अच्छे खाने का कुछ इंतजाम नहीं था. ब  एक मिटटी के तेल का स्टोव था घर में आटा दाल चावल था. सो मुझे अच्छा खाना खिलाने भी ढाबे पर ले गया था.

खाना खाते समय मैंने पूछा था,“पिछले ऑफिस में क्या हुआ था? क्यों छोड़ कर आये.” सुन कर चुप हो गया, उसने बताया “नया मार्केटिंग इंस्पेक्टर बेईमान और घमंडी है खाता भी था और गुर्राता भी था, गुस्से में उसने माँ की गाली दी और मैंने उसे कुर्सी से उठा कर बाहर फेंका दो झापड़ लगाये नीचे पड़ा हाथ जोड़ने लगा था, चपरासी ने आकर हमारा बीच बचाव करा. इसके बाद नौकरी कैसे करता, उसने मुझे बर्खास्त करना ही था सो अपने आप ही नौकरी पर लात मार कर आ गया हूँ.”

पिताजी कन्हैया से बहुत नाराज़ हुए कि ‘मुश्किल से सिफारिश करके इसकी नौकरी लग पाई थी, उसे भी लड़ लड़ा कर छोड़ कर भाग गया है, अब भूखा मरेगा’. असली में पिटने के बाद मार्केटिंग इंस्पेक्टर ने शर्म के मारे में पिटने की बात किसी को भी नहीं बताई थी, अतः पिताजी को असली काण्ड और कारण मालूम नहीं हुआ  था वरना उस पर और भी अधिक गुस्सा होते. मैंने भी चाचा से वायदा किया था कि नहीं बताऊँगा. मेरे हिसाब से तो उसने बहादुरी का ही काम किया था.

यहाँ उसकी नौकरी उसके  किसी मित्र ने लगवा दी थी, जिसमें वेतन कम और खाली समय ज्यादा था, उसने अपना फंडा सुनाया था कि पेट तो सभी का भर जाता है, वह मानता है, ‘अगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम’

 मैंने कसरत करते हुए तो चाचा को खूब करते देखा हुआ था पर बाद में उम्र के कारण, ज़रूरत से ज्यादा कसरत करने से और ज्यादा खुराक खाने से वज़न बढ़ गया था शरीर, ढीला पड़ने लगा था, पेट भी थोडा निकल आया था.एक बार ज़ब मिलने गया था, उसने मुझे बताया कि ‘शुक्रताल में गंगा स्नान का मेला लगा है वहां घूम आते हैं, शुक्रताल भोपे से आधा घंटे के रास्ते पर था. बस से 20 – 22 मिनट में पहुँच गए. मेले में ज्यादा भीड़ नहीं थी, हमने गंगा स्नान करा. वहां कई ज़गह साधु दो तीन एक साथ बैठ कर गांजा और सुल्फा पी रहे थे, मुझे पीछा खड़ा कर वह दो तीन इस तरह की मंडली में जा जा कर दम लगा कर आता था, मेरे पूछने पर कहता कि बस हुक्का के तम्बाकू जैसा ही है, पर मैं देख रहा था कि उसकी आँखे चढ़ रही थी नशे के कारण. मैं शाम को वापिस अपने घर लौट आया था.

कुछ वर्षों बाद उसका आना धीरे धीरे कम होता गया,  दूसरों से ही सुना था कि चाचा भोपे को भी छोड़ कर  शामली चला गया था जहाँ से हमारा गाँव समीप ही था. बड़ी कक्षाओं में आने पर मैं भी पढाई के दबाव में आ गया था और धीरे धीरे मेरी पढाई भी पूरी हो गयी और मैं दिल्ली सर्विस करने चला गया था. चाचा से दोएक वर्ष मुलाकात भी नहीं हुई और उसके बारे में पता भी लगा.

जब कुछ समय बाद में सीआरपी मैं सेलेक्ट हो गया और गृह मंत्रालय से मुझे जो अपॉइंटमेंट और जोइनिंग निर्देश प्राप्त हुए थे उसमें अन्य निर्देशों व सूचनाओं में यह भी लिखा था कि “आप एक अर्दली रखने के लिये पात्र है.”  मुझे पता नहीं था कि अर्दली किस चिड़िया का नाम है. न ही इस तरफ मैंने धयान दिया था. इस तरह की पात्रता अभी भी है पर अब यह सब कुछ लिख कर नहीं आता और इस पद को अब ‘सिक्यूरिटी एड’  सुरक्षा सहायक कहा जाने लगा है.

मेरे ट्रेनिंग की बात सुन कर कई साल बाद मेरे प्रिय चाचा मेरे से मिलने के लिये हमारे घर आये, वे कई साल के बाद आये थे, अब उनकी सेहत अच्छी नहीं थी असमय बुढ़ापा आ गया था बैठक ज्यादा लगाने के कारण घुटने खराब हो गए थे, चलने में दिक्कत हुई. पर मेरी नई नौकरी के लिये वे बेहद खुश थे. उसने भी गृह मंत्रालय को नियुक्ति पत्र पढ़ा, और अचानक बड़ी आजिजी से कहा, “मुझे अपना अर्दली बना देना मैं गाँव में नहीं रह पा रहा हूँ.” सुन कर बहुत दुःख हुआ मैंने कहा, “चाचा, ऐसा न कहो ट्रेनिंग के बाद ज़हां भी मुझे पोस्टिंग मिलेगी मेरे साथ ही रहना.” मैने पूरे मन और गंभीरता से यह बात कहीं थी. सुन कर वह द्रवित हो गया, और उसकी आँखों में पानी आ गया था.

“ठीक है जहाँ भी होंगें मैं चलूँगा.” जब उसने कहा, उस के मुंह से शराब की थोडी बू आई थी, वैसे उसे छिपाने के लिये एक पान भी मुंह में था. शायद अपने दुख दर्द को भुलाने के लिये वह अब शराब भी पीने लगा हो, वह पिताजी के स्कूल से आने के पहले चल दिया क्योंकि दूसरे भाईयों ने उसकी शिकायतें की हुई थी तथा वह शराब के नशे में उनके सामने बिलकुल नहीं पड़ना चाहता था. वही मेरी आखिरी  मुलाक़ात सिद्ध हुई. मेरी पहले पोस्टिंग सुदूर त्रिपुरा में हुई जहाँ उसके जाने का प्रश्न हे नहीं था. मेरे छोटे भाई ने बाद में मुझे बताया कि उसकी गाँव में रहने वाले, खेती में लगे भाईयों और विशेष रूप से उनकी पत्नियों से बिलकुल ही नहीं बनी थी, वह अपने हिस्से की ज़मीन बेचना चाहता था उसका घोर विरोध हुआ, घर में लड़ाई झगड़ा टंटा हुआ फिर भी उसे उस का हिस्सा नहीं मिला. यहाँ तक कि  उसके भोजन और खाने कके लिये कोई तैयार नहीं था. सब पूरी तरह से निराश और हताश हो कर वह कहीं गुम हो गया, कोई कहता साधू बन गया, कोई कहता नशेडी, भंगेड़ी, नकली फकीरों के साथ कहीं जा कर गुम हो गया था. पर असली बात यह रही कि किसी ने उसे ढूँढने की ज़रूरत ही नहीं समझी. उसके परिवार वाले  ही कहने लगे थे थे कि जैसी उसकी हालत थी अब तक मर मुर गया होगा, बुढ़ापे में बिलकुल ढसर गया था. सब उसकी

उसकी और मेरी हसरत साथ साथ रहने की यूं ही रह गयी, मैंने एक बार गाँव में जाकर कन्हैया चाचा जाकर के बारे में पूछा सब उसके विरुद्ध अलग अलग ढ़ंग से बुराई ही बुराई करते रहे, उसके लिये कहते रहे कब तक

 “ऐसे बूढ़े बैल को कौन बाँध भुस देता.”

 इस तरह से कभी मेरे बचपन का प्रिय चाचा विदा हो गया. मेरे अलावा शायद कोई और उसके जाने से दुखित या अफ़सोस नहीं कर रहा था. मुझे अफ़सोस था कि मैं उसे अपने साथ नहीं ले जा सका, मेरी बटालियन सुदूर त्रिपुरा मे थी जो फॅमिली स्टेशन नहीं था, वहां उन दिनों भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध के बादल छाये हुए थे और लड़ाई हुई भी बांग्लादेश बना भी, पर जब तक शांति हुई चाचा कहाँ गए पता नहीं लगा. सब भले ही कन्हैया चाचा को भूल गए हूँ पर मैं कभी कहाँ भूल पाऊंगा.