अध्याय 14: युद्ध की तैयारी और लौरा का संकल्प
जैसे ही कन्या गुरुकुल की संदेशवाहक वापस गई, पूरे विशाल गुरुकुल का शांत वातावरण जैसे किसी सक्रिय ज्वालामुखी की तरह धधकने लगा। जो छात्र अब तक केवल रुद्र और विक्रांत के मुकाबले की चर्चा कर रहे थे, अब उनकी आँखों में एक नया और अनजाना कौतूहल था। हर गलियारे में एक ही बात हो रही थी—'क्या कन्या गुरुकुल की छात्राएं सच में हमें चुनौती देंगी?'
लौरा का युद्धाभ्यास
उधर, दक्षिण परिसर (लड़कियों के गुरुकुल) में शांति के स्थान पर शस्त्रों की तीखी खनक गूँज रही थी। आचार्या वसुंधरा के कड़े निर्देशन में वहाँ अब तक का सबसे कठिन अभ्यास चल रहा था। लेकिन सबका ध्यान केवल एक ही योद्धा पर टिका था—लौरा।
मैदान के बीचों-बीच लकड़ी के पाँच भारी पुतले रखे गए थे, जिन्हें इस तरह बनाया गया था कि वे हर दिशा से आने वाले हमले को रोक सकें। लौरा ने अपनी विशेष नीली मूठ वाली तलवार निकाली और अपनी आँखों पर काली पट्टी बाँध ली। चारों ओर सन्नाटा छा गया। अगले ही पल, लौरा एक चक्रवात की तरह घूमी। उसकी तलवार की गति इतनी तीव्र थी कि वह केवल एक नीली लकीर की तरह दिख रही थी। हवा के कटने की 'सूं-सूं' आवाज़ के साथ उसने पुतलों पर प्रहार किए। मात्र कुछ ही क्षणों में पाँचों भारी पुतलों के सिर धड़ से अलग होकर ज़मीन पर धूल चाट रहे थे।
उसने पट्टी खोली। उसके गोरे माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक ठंडी और स्थिर आग थी। आचार्या वसुंधरा उसके पास आईं और धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, "लौरा, तुम्हारा कौशल अद्वितीय है, लेकिन याद रखना... रुद्र केवल ताकत से नहीं, बल्कि अपनी अचल एकाग्रता से लड़ता है। वह हारना नहीं जानता।"
लौरा ने अपनी तलवार को झटके से म्यान में डाला और गर्व से अपना सिर उठाकर कहा, "आचार्या, महागुरु का स्नेह उसकी एकाग्रता को कमजोर कर सकता है, लेकिन मेरा अपमान ही मेरा सबसे बड़ा क्रोध और ताकत बनेगा। मैं उन्हें दिखा दूँगी कि मर्यादा केवल ऊँची दीवारों से नहीं, बल्कि हाथ में थमे शस्त्र की श्रेष्ठता से बनती है।"
रुद्र का द्वंद्व
दूसरी ओर, उत्तर परिसर के शोर से दूर, रुद्र अकेला 'रक्त-शिला' के पास बैठा था। ढलते सूरज की रोशनी उस प्राचीन पत्थर पर पड़ रही थी, जिससे वह गहरा लाल दिख रहा था। रुद्र के मन में जीत की खुशी से ज़्यादा एक गहरी चिंता थी। उसे अहसास था कि महागुरु ने सबके सामने उसे जो 'विशेष स्थान' दिया है, वह उसके लिए केवल सम्मान नहीं, बल्कि एक ऐसी ज़िम्मेदारी है जो उसे अपनों से ही दूर कर सकती है।
उसे महसूस हो रहा था कि लौरा का आना केवल एक साधारण मुकाबला नहीं है। यह उसके धैर्य, उसकी साख और शायद उसके अतीत की सबसे बड़ी परीक्षा होने वाली थी। रात की ठंडी हवाओं के बीच वह अपनी तलवार की मूठ को कसकर पकड़े बैठा रहा, यह जानते हुए कि आने वाला कल विशाल गुरुकुल का इतिहास हमेशा के लिए बदल देगा।
लौरा के अभ्यास की वह गूँज केवल मैदान तक सीमित नहीं थी। आचार्या वसुंधरा ने गौर किया कि लौरा के प्रहारों में इस बार एक अजीब सी बेचैनी थी। वे जानती थीं कि लौरा केवल एक मुकाबला जीतने के लिए नहीं लड़ रही, बल्कि वह अपनी उस पहचान को साबित करने की कोशिश कर रही है जिसे समाज अक्सर गौण मान लेता है।
तभी अभ्यास क्षेत्र के बाहर एक हलचल हुई। कन्या गुरुकुल की अन्य छात्राएं, जो अब तक केवल दर्शक थीं, लौरा के जुनून को देखकर खुद भी जोश से भर गईं। उन्होंने अपनी-अपनी तलवारें म्यान से बाहर निकाल लीं। पूरे दक्षिण परिसर का वातावरण अब किसी छावनी जैसा लग रहा था। दूसरी ओर, रुद्र जब 'रक्त-शिला' के पास बैठा था, तो उसे महसूस हुआ कि शिला की सतह सामान्य से कुछ अधिक गर्म है। उसने अपना हाथ उस पर रखा और उसे एक हल्की सी धड़कन महसूस हुई। क्या यह केवल उसका भ्रम था या पहाड़ियों के भीतर कोई प्राचीन शक्ति अंगड़ाई ले रही थी? रुद्र ने आकाश की ओर देखा, जहाँ पक्षी अपने घोंसलों की ओर नहीं, बल्कि जंगल की दूसरी दिशा में भाग रहे थे। यह एक अनिष्ट का संकेत था जिसे केवल रुद्र ही पढ़ पा रहा था।