अगली सुबह…
सुबह की हल्की धूप खिड़की से होकर कमरे में उतर रही थी।
मयूर सर देर तक जागते रहे थे रात भर… आँखें बंद होतीं तो एक ही चेहरा सामने आ जाता—रुशाली का।
उसकी मुस्कान… उसकी आँखों की वो गहराई… और कल की मुलाक़ात…
सब कुछ जैसे दिल में फिर-फिर कर चल रहा था।
उन्होंने धीरे से आँखें खोलीं और मन ही मन कहा—
"अब और देर नहीं… अब बात करनी ही होगी…"
थोड़ी देर बाद वे बैठक में पहुँचे।
माँ चाय बना रही थीं… पिताजी अख़बार पढ़ रहे थे।
“पिताजी… मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी है,” मयूर सर ने शांत लेकिन गंभीर आवाज़ में कहा।
पिताजी ने अख़बार नीचे रख दिया।
“हाँ बेटा, बोलो।”
मयूर सर कुछ पल चुप रहे।
जैसे शब्द चुन रहे हों… क्योंकि कुछ बातें सिर्फ कही नहीं जातीं… महसूस भी करानी पड़ती हैं।
फिर उन्होंने धीरे से कहा—
“मैं… शादी करना चाहता हूँ।”
माँ के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
“यह तो बहुत अच्छी बात है… कौन है लड़की?”
मयूर सर की आँखों में एक नरम-सी चमक आई।
“उसका नाम… रुशाली है।”
पिताजी ने पूछा—
“क्या करती है वह?”
मयूर सर ने धीमे लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा—
“वह… एक डीएम है।"
दोनों एक पल के लिए चुप रह गए।
माँ ने आश्चर्य से कहा—
“इतने बड़े पद पर है?”
मयूर सर ने सिर हिलाया—
“जी।”
पिताजी कुछ देर सोचते रहे… फिर बोले—
“बेटा… ऐसी नौकरी में तो कभी भी दूसरे शहर जाना पड़ सकता है… परिवार से दूर रहना पड़ता है… हमने तो हमेशा सोचा था कि तुम्हारे लिए कोई डॉक्टर लड़की हो… जिससे तुम्हारी ज़िंदगी भी मिलती-जुलती रहे…”
मयूर सर ने बहुत सम्मान से उनकी ओर देखा।
“पिताजी… क्या मैं कुछ कह सकता हूँ?”
“हाँ।”
मयूर सर की आवाज़ अब और गहरी हो गई—
“सालों पहले… आपने मेरी शादी एक डॉक्टर लड़की से तय की थी…”
माँ-पिताजी दोनों ध्यान से सुनने लगे।
“आपकी खुशी के लिए… मैं उस समय मान भी गया था… लेकिन…”
उन्होंने एक गहरी साँस ली।
“लेकिन सच यह है… कि उस समय भी… मेरे दिल में सिर्फ एक ही नाम था—रुशाली।”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया।
पिताजी ने धीरे से पूछा—
“तो फिर… तुमने उस शादी से इनकार क्यों किया?”
मयूर सर की आँखों में पुरानी यादों की नमी उतर आई।
“क्योंकि… मैं किसी और का हाथ पकड़कर… उस इंसान के साथ अन्याय नहीं कर सकता था… जिसे मैं दिल से चाहता ही नहीं था।”
उनकी आवाज़ धीमी थी… लेकिन हर शब्द दिल से निकला हुआ था।
“और मैं… अपने दिल से भी झूठ नहीं बोल सकता था।”
माँ चुपचाप सुन रही थीं… उनकी आँखों में अब नर्मी आ चुकी थी।
पिताजी ने फिर पूछा—
“तो तब तुमने हमें रुशाली के बारे में बताया क्यों नहीं?”
मयूर सर हल्का-सा मुस्कराए… लेकिन वह मुस्कान भीगी हुई थी।
“क्योंकि उस समय… वह अपनी डीएम की ट्रेनिंग के लिए जा रही थी।”
उन्होंने धीरे-धीरे कहा—
“उसकी आँखों में एक सपना था… और मैं… उसके सपनों के रास्ते में नहीं आना चाहता था।”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर मयूर सर बोले—
“पिताजी… सच्चा प्यार किसी को रोकता नहीं…
सच्चा प्यार… किसी को उड़ते हुए देखने की ताक़त देता है।”
उनकी आवाज़ भर्रा गई—
“मैं चाहता था कि वह अपने सपनों को पूरा करे… अपने पैरों पर खड़ी हो… और शायद… कहीं न कहीं मुझे यकीन था कि अगर हमारी चाहत सच्ची हुई… तो हम फिर मिलेंगे…”
उन्होंने धीरे से कहा—
“और… किस्मत ने हमें फिर मिला दिया।”
कमरे की हवा जैसे बदल गई थी।
अब वहाँ सिर्फ बात नहीं हो रही थी… भावनाएँ भी सुनाई दे रही थीं।
माँ ने धीरे से पूछा—
“वह कैसी है… स्वभाव से?”
मयूर सर की आँखों में एक अलग-सी चमक उतर आई।
“बहुत सुलझी हुई है माँ… समझदार… और सबसे बड़ी बात… बहुत सम्मान देने वाली।”
उन्होंने हल्का-सा मुस्कुराते हुए आगे कहा—
“वो डीएम है… इतने बड़े पद पर है… लेकिन ज़रा-सा भी घमंड नहीं।
बड़ों से बहुत आदर से बात करती है… हर रिश्ते को दिल से निभाती है।”
फिर उनकी आवाज़ थोड़ी नरम हो गई—
“माँ… मुझे उसकी बाहरी खूबसूरती से ज्यादा… उसके दिल की खूबसूरती पसंद है।
वो दिल से बहुत साफ है…”
एक पल रुककर वो हल्के से मुस्कुराए—
“वैसे तो बहुत mature है… हर बात समझदारी से करती है…
लेकिन… सिर्फ मेरे सामने… बिल्कुल बच्चों जैसी हो जाती है।”
उनकी आँखों में शरारत-सी चमक आई।
“और माँ… मुझे वही रुशाली सबसे ज्यादा पसंद है…”
माँ चुपचाप बेटे को देखती रहीं…
क्योंकि उसके हर शब्द में सच्चा प्यार झलक रहा था।
माँ की आँखें भर आईं।
कुछ देर तक पिताजी चुप बैठे रहे… जैसे हर बात को भीतर उतार रहे.
फिर उन्होंने लंबी साँस ली और बोले—
“अगर वह लड़की सच में तुम्हें समझती है… तुम्हें खुश रख सकती है… तो हमें क्या आपत्ति हो सकती है…”
माँ ने भी धीरे से कहा—
“हमें उससे मिलना होगा… एक बार।”
मयूर की आँखों में जैसे रोशनी भर गई।
इतने सालों का इंतज़ार… जैसे एक ही पल में हल्का हो गया।
उस समय उनके दिल में बस एक ही एहसास था—
"कभी-कभी देर से मिलने वाली खुशियाँ… सबसे गहरी होती हैं…
क्योंकि उन्हें पाने से पहले… दिल बहुत कुछ सह चुका होता है…"
उधर… उसी सुबह…
रुशाली भी खिड़की के पास खड़ी थी।
सुबह की हवा उसके बालों को हल्का-सा छू रही थी…
लेकिन उसके चेहरे पर एक अलग-सी शांति थी।
कल की बातों ने उसके दिल का बोझ हल्का कर दिया था।
उसने धीरे से आसमान की ओर देखा… और मन ही मन कहा—
"शायद… कुछ रिश्ते कभी टूटते नहीं…
बस समय की धूल उन पर जम जाती है…
और एक दिन… हवा चलती है…
और सब फिर से साफ़ दिखाई देने लगता है…"
और उसी पल…
दो अलग-अलग जगहों पर खड़े दो लोग…
एक ही बात सोच रहे थे—
"अब कहानी अधूरी नहीं रहेगी…"
कभी-कभी ज़िंदगी…
सालों तक चुप रहती है…
और फिर अचानक…
दिल की सारी इच्छाएँ एक-एक कर पूरी होने लगती हैं।
लेकिन…
हर खुशी के दरवाज़े पर
एक नया मोड़ भी इंतज़ार करता है…
क्योंकि अगला कदम होगा—
दो परिवारों का मिलना…
और दो दिलों का
सबके सामने एक हो जाना…
और यह मुलाक़ात…
सिर्फ एक रस्म नहीं होगी…
एक कहानी का वह पल होगी…
जिसे दोनों ने पाँच साल तक
अपने दिल में संभाल कर रखा था…
आगे क्या होगा…?
यह जानने के लिए… पढ़िए अगला भाग…