एपिसोड 10: दौलत की बेबसी और लहू की तलाश
आईसीयू के बाहर का गलियारा किसी कंट्रोल रूम में तब्दील हो चुका था। मिस्टर खन्ना पागलों की तरह अपने फोन पर चिल्ला रहे थे। उनका चेहरा पसीने से तर-बतर था और हाथ कांप रहे थे।
"मुझे नहीं पता कैसे! शहर के हर ब्लड बैंक, हर छोटे-बड़े अस्पताल में फोन करो! अगर ज़रूरत पड़े तो चार्टर्ड प्लेन भेजो, पर मुझे 'ओ नेगेटिव' खून अगले बीस मिनट में चाहिए!" मिस्टर खन्ना ने अपने पीए की कॉलर पकड़कर चीखते हुए कहा।
पूरा अस्पताल प्रशासन हड़कंप में था। मिस्टर खन्ना के आदमी फोन पर पागलों की तरह लगे थे। कोई दिल्ली फोन कर रहा था, तो कोई मुंबई। लाखों-करोड़ों के इनाम की घोषणा कर दी गई थी कि जो भी ज़ोया के लिए खून देगा, उसे मालामाल कर दिया जाएगा।
ज़ारा एक तरफ खड़ी ठंडी नज़रों से यह तमाशा देख रही थी। उसने कड़वाहट से कहा, "अपनी दौलत के बिस्तर बिछा लीजिए मिस्टर खन्ना, पर याद रखिएगा कि खून नोटों से नहीं बनता। आप पूरी दुनिया खरीद सकते हैं, पर आज अपनी बेटी की ज़िंदगी की एक साँस भी नहीं खरीद पा रहे।"
मिस्टर खन्ना ने ज़ारा की तरफ देखा, उनकी आँखों में आंसू थे। "ज़ारा, मैं अपनी पूरी जायदाद नाम कर दूँगा उसके लिए... बस कोई एक बोतल खून दे दे।"
"यही तो आपकी समस्या है," ज़ारा ने नफरत से कहा। "आपको लगता है कि हर चीज़ की कीमत होती है। ज़ोया आज उस लड़के की वजह से इस हाल में नहीं है, बल्कि आपके इस घमंड की वजह से है जिसे आप 'साख' कहते हैं।"
तभी पीए दौड़ता हुआ आया, "सर! पूरे शहर में कहीं भी 'ओ नेगेटिव' नहीं मिल रहा है। डोनर्स की लिस्ट चेक की जा रही है, पर इस वक्त कोई भी पहुँचने की स्थिति में नहीं है। डॉक्टर कह रहे हैं कि हमारे पास सिर्फ पंद्रह मिनट बचे हैं।"
मिस्टर खन्ना अस्पताल की ठंडी ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गए। जिस इंसान ने कभी किसी के सामने सिर नहीं झुकाया था, वह आज एक-एक सेकंड की भीख माँग रहा था।
"कोई है... जो मेरी बेटी को बचा ले?" उन्होंने रुआँसे होकर गलियारे की ओर देखा।
मिस्टर खन्ना और ज़ारा दोनों की साँसें जैसे थम गईं।
आखिरी वसीयत और टूटती साँसें
अस्पताल के उस ठंडे कमरे में मशीनों की 'बीप-बीप' की आवाज़ मौत की आहट जैसी लग रही थी। ज़ारा अपनी बहन का हाथ थामे बैठी थी, उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। तभी ज़ोया की पलकें धीरे से हिलीं।
"ज़ोया! डॉक्टर, देखिए इसे होश आ रहा है!" ज़ारा ने चिल्लाकर सबको बुलाया।
मिस्टर खन्ना भी दौड़ते हुए अंदर आए, "बेटा... ज़ोया, देखो मैं यहीं हूँ। तुम्हें कुछ नहीं होगा।"
लेकिन ज़ोया ने अपने पिता की तरफ देखा तक नहीं। उसकी धुंधली पड़ चुकी आँखों ने सिर्फ अपनी बड़ी बहन ज़ारा को ढूँढा। उसने बहुत ही कमज़ोर हाथ उठाकर ज़ारा को अपने और करीब बुलाया।
"दी..." ज़ोया की आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ ज़ारा ही सुन सकती थी। उसकी साँसें बुरी तरह उखड़ रही थीं। "दी... मैं... मैं अब और नहीं लड़ पाऊंगी। मुझे लग रहा है कि अब मेरा वक्त आ गया है।"
"चुप रह पागल! तुझे कहीं नहीं जाना, मैं आ गई हूँ ना," ज़ारा ने उसे सीने से लगाते हुए कहा।
ज़ोया ने एक फीकी मुस्कान के साथ अपना सिर हिलाया। "नहीं दी... मुझे पता है। लेकिन जाने से पहले... मुझे आपसे एक वादा चाहिए। डैड तो मेरी बात कभी नहीं समझेंगे, पर आप... आप मेरा एक काम कर देना।"
उसने सिसकियाँ लेते हुए ज़ारा का हाथ कसकर पकड़ा, "अज़ीम... उसने मेरी वजह से बहुत कुछ सहा है दी। उसकी दुनिया उजड़ गई, उसकी दुकान टूट गई... सिर्फ मुझसे दोस्ती करने की वजह से। मैं नहीं चाहती कि मेरे जाने के बाद वह दर-दर की ठोकरें खाए। आप... आप उसे कुछ ऐसा बना देना, उसकी ज़िंदगी इतनी अच्छी कर देना कि उसे कभी किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। उसे संभाल लेना दी... मैं नहीं चाहती कि मेरे मरने के बाद वह एक पल के लिए भी रोए।"
मिस्टर खन्ना यह सब सुन रहे थे। उनके पैर सुन्न पड़ गए थे। जिस लड़के को उन्होंने खत्म करना चाहा, उनकी बेटी मरते वक्त भी उसी की फिक्र कर रही थी।
ज़ोया की आवाज़ और भी डूबने लगी, "उसे... उसे खुश रखना दी। बस यही मेरी आखिरी ख्वाहिश है।"
इतना कहते ही ज़ोया की आँखों से एक आखिरी आँसू निकला और उसकी पकड़ ढीली पड़ गई। मशीनों की लंबी 'टी....' की आवाज़ ने पूरे कमरे में सन्नाटा फैला दिया।
ज़ारा की चीख पूरे अस्पताल में गूँज उठी, "ज़ोयाआआ!"