prince in Hindi Moral Stories by Ritik Sandilya books and stories PDF | प्रिंस

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प्रिंस

कहानी की शुरुआत कहीं से भी हो, किरदार यदि दिलचस्प होता है तो कहानी स्वतः ही खूबसूरत लगने लगती है। मैं ऐसे ही एक व्यक्ति को जानता हूँ; उनकी आयु वर्तमान में 65 वर्ष के आसपास होगी। उनके चार बच्चे हैं—सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य, उनके चार बेटे ही हैं। माता-पिता जब अपने बच्चों को जन्म देते हैं, उस वक्त उनके प्रति अकल्पनीय प्रेम रहता है, पर वक्त के साथ न जाने क्यों वह भाव बदल जाता है। एक माँ के लिए उसके बेटे किसी राजकुमार से कम थोड़े ही होते हैं!
उन चार राजकुमारों में से मैं एक व्यक्ति के काफी करीब हूँ। न चाहकर भी मैं उनसे वह सारी बातें कर पाता हूँ, जो संभवतः दो सगे भाइयों के बीच होनी चाहिए। जब ऐसा होता है, तब मैं महसूस कर पाता हूँ कि जरूरी नहीं कि एक ही गर्भ से जन्म लेने वाली दो संतानें ही सगे भाई-बहन हो सकते हैं। मैं कभी-कभी उनकी पीड़ाओं को समझने की कोशिश करता हूँ, तो यह सोचकर सहम जाता हूँ कि माता-पिता अपनी ही सगी संतान के साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं?
अक्सर ऐसा देखा जाता है कि बुढ़ापे में बच्चे माँ-बाप का साथ छोड़ देते हैं, पर यहाँ स्थिति बिल्कुल विपरीत है—एक पिता ने अपने ही बच्चे का साथ छोड़ दिया है। मैं कल्पना नहीं कर पा रहा हूँ कि एक संतान के मोह में किसी दूसरी संतान को लावारिस छोड़ देना किस बात का न्याय है? परिवार में हर इंसान का एक किरदार होता है; जब कोई उसे घर की खुशियों में सम्मिलित होने से वंचित कर दे, तो वह कितना पीड़ादायक होता होगा, मैं बस इसकी कल्पना ही कर सकता हूँ।
मैं अक्सर उनकी बातों में वह दर्द महसूस कर पाता हूँ। जब वह किसी बात से परेशान होकर मुझे फोन करते हैं, तो उनकी बातें सुनकर मैं उन्हें बस सांत्वना देने की कोशिश करता हूँ। क्या करूँ, उनका दुख मेरी क्षमताओं से परे है; शायद मैं वह सहन नहीं कर पाता। एक वक्त उनके जीवन में काफी समस्याएँ थीं, खास तौर पर आर्थिक। तब वह अपने पिता से मदद माँगने गए थे, लेकिन उनके पिता ने उनके मुँह पर मना कर दिया; और ऐसा पहली बार नहीं था।
आज उनके बड़े भाई की बेटी की शादी है। इस शुभ अवसर पर उन्हें निमंत्रण तक नहीं दिया गया है। इस बात से वह इतने परेशान दिखे कि मैं शब्दों में उस व्यथा को बयान नहीं कर पाऊँगा। इंसान को दो-चार दिन तक खाना नहीं मिलेगा, तो शायद वह जीवित रह जाएगा; पर यदि किसी को अपने ही परिवार से 'बहिष्कार' का सामना करना पड़े, तो मुझे लगता है कि वह जीते-जी मर जाएगा।
मैं उनकी सहिष्णुता की भी प्रशंसा करता हूं। अनंत बहिष्कार के पश्चात भी वो इंसान परिवार के सम्मान में अपना व्यक्तिगत सम्मान को नजर अंदाज करते हुए वो सारी गतिविधियां कर रहा है जो एक बेटे को करना चाहिए। मै कभी कभी उसकी समस्याओं के बारे में सोचता हूं तो मुझे लगता है जब किसी परिवार में एक बेटा का जन्म होता होगा तो परिवार के लोग कितनी खुशियां मनाते होंगे। ऐसी किस तरह की परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है जो एक बेटे को उसकी मां से दूर कर दे। या ये कहना गलत नहीं होगा कि उसके अपने परिवार से वो संबंध खत्म कर दे उसका वो हकदार है। मुझे ऐसा लगता है कि ऐसा भी क्या जीवन जिसमें अपने ही परिवार वो संबंध ना रहे जो बचपन में घर के हर उस सदस्य से रहा होगा। मुझे लगता है कि जीवन बस जीने का नाम नहीं है जीवन हर उस बंधन को उस प्यार के धागे से बांध कर रखने का है जिस बंधन को हम उम्र में बड़े होकर भूल जाते है। 
भाव से पड़े , अम्बर से बड़ा और धरती से अधिक भारी दुख है मेरा। 
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युद्ध का आगाज अपने सफलता से लिखने आया हूं।।