Trikon - 20 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 20 — ज़ेरोइन

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Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 20 — ज़ेरोइन

छेदीपुरा गाँव।

पुरानी सराय का पिछला हिस्सा।

एक कम रोशनी वाले कमरे में सभी लड़कियाँ फर्श पर बैठी थीं।

सामने एल्यूमिनियम की थालियाँ।

दाल-चावल खा रही थीं।

कोई बात नहीं कर रहा था।

बस चम्मचों की हल्की आवाज़।

और बीच-बीच में दबे हुए सिसकियों की आहट।

सराय के भीतर एक दूसरा कमरा।

उसे जल्दी-जल्दी कॉन्फ्रेंस रूम जैसा बना दिया गया था।

टेबल।

कुर्सियाँ।

एक स्पीकर फोन।

टेबल के उस पार बैठा था प्रभु।

पास में एक लेडी डॉक्टर।

दो नर्सें।

स्पीकर फोन से आवाज़ आई।

नवीना जांगिड़।

“सभी लड़कियाँ medically fit चाहिए।

कोई चोट, घाव, बीमारी नहीं।

सभी को vaccine लगी होनी चाहिए।”

एक पल की खामोशी।

फिर उसकी आवाज़ और ठंडी हो गई।

“इनमें से बीस सबसे स्वस्थ लड़कियाँ तैयार करो।

चार दिन बाद shipping होगी।”

प्रभु ने हल्का सिर झुकाया।

“बीस तो ठीक है…

बाकी पाँच?”

उधर कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।

फिर नवीना की धीमी, ठंडी आवाज़ आई—

“पता तो है क्या करना है।

पूछते क्यों हो?”

कॉल कट।

कमरे में कुछ पल सन्नाटा रहा।

प्रभु ने डॉक्टर की ओर देखा।

“चलिए… काम पर लगिए।”

डॉक्टर थोड़ा घबराई।

धीमे स्वर में बोली—

“ज़्यादा लड़कियाँ हैं… कुछ हो गया तो?”

प्रभु हल्का हँसा।

“अरे कुछ नहीं होगा, दीदी।

पहली बार कर रही हैं क्या?”

उसने कुर्सी से उठते हुए कहा—

“जाइए।”

डॉक्टर और नर्सें चुपचाप बाहर चली गईं।

प्रभु खिड़की के पास आकर खड़ा हो गया।

बाहर अँधेरा था।

उसने एक लंबी साँस ली।

कुछ देर बाद लड़कियाँ कतार में खड़ी थीं।

कमरे में हल्की पीली रोशनी थी।

दोनों नर्सें एक मेज़ पर शीशियाँ और सिरिंजें सजाकर इंजेक्शन तैयार कर रही थीं।

लेडी डॉक्टर एक-एक लड़की के पास जा रही थी।

बाँह पकड़ती।

नस ढूँढती।

और चुपचाप इंजेक्शन लगा देती।

एक लड़की घबराकर बोली—

“ये किस चीज़ का इंजेक्शन है, आंटी?”

डॉक्टर ने दाँत भींचे।

धीरे से बुदबुदाई—

“इन्हें बड़ी पंचायत है…”

फिर अचानक मुस्कुरा दी।

“ताक़त के इंजेक्शन हैं, पगली।

तुम सब बहुत कमज़ोर हो गई हो ना।”

वही लड़की फिर बोली—

“डॉक्टर आंटी हमें नहीं लगवाना इंजेक्शन… हमें यहाँ से निकाल लीजिए।

प्लीज़…”

इतना सुनते ही कई लड़कियाँ रोने लगीं।

“आंटी… हमें घर जाना है…”

कमरा सिसकियों से भर गया।

तभी— दरवाज़े पर खड़ा प्रभु गरजा।

“चुप!”

उसके पीछे दो बंदूकधारी खड़े थे।

कमरे में तुरंत सन्नाटा छा गया।

लड़कियाँ फिर चुपचाप लाइन में खड़ी हो गईं।

डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

और अगली लड़की की बाँह में इंजेक्शन उतार दिया।

गोदाम के बीचों-बीच एक पंचिंग बैग लटका था।

जोगी उस पर टूट पड़ा था।

तड़-तड़-तड़।

घूँसे लगातार बरस रहे थे।

शर्ट पसीने से भीग चुकी थी।

भारी साँसें।

नथुने फूले हुए।

बैग हर वार पर झूल रहा था।

तभी पीछे से अनीश आया।

कुछ सेकंड चुपचाप देखता रहा।

जोगी ने एक नज़र उसकी तरफ डाली।

फिर और ज़ोर से पंचिंग बैग पर टूट पड़ा।

तड़।

तड़।

तड़।

अनीश पास रखी कुर्सी पर बैठ गया।

एक कागज़ के पैकेट से समोसा निकाला।

काट लिया।

“गुस्सा आना लाज़िमी है।”

जोगी रुक गया।

तौलिये से चेहरा पोंछते हुए पास आकर खड़ा हो गया।

अनीश ने मुँह पोंछा।

“लेकिन उस गुस्से को सही जगह लगाना भी ज़रूरी है।”

जोगी बोला—

“हमने अपराजिता देवी… इंस्पेक्टर संभावित… और वर्षा तीनों को उड़ा दिया।

तो अब नवीना को क्यों नहीं?”

अनीश उठा।

पास रखी बड़ी केतली से चाय डाली।

एक चुस्की ली।

“तुझे क्या लगता है… उन्हें गुस्से में आकर ठोका था?”

एक और चुस्की।

“अपराजिता और संभावित हमारी जान के पीछे पड़े थे।

उनका ऊपर का टिकट काटना ज़रूरी था।”

रुककर जोगी की तरफ देखा।

“और वर्षा…”

हल्की मुस्कान।

“वो तेरी वजह से टपकी।”

जोगी चुपचाप बैठ गया।

शायद अनीश ठीक कह रहा था।

तभी—

दरवाज़े पर हल्की आहट हुई।

अनीश की प्रतिक्रिया बिजली जैसी थी।

कमर से पिस्तौल निकाली।

सीधे दरवाज़े पर तान दी।

दरवाज़ा खुला।

अंदर आई—

ज़ेरोइन।

खुले बाल।

नाक और मुँह पर काला नकाब।

लेदर जैकेट।

काली पैंट।

अनीश ने पिस्तौल नीचे की।

“अरे ज़ेरोइन… अलार्म भी नहीं बजा।”

वह उसे गले लगाने बढ़ा।

लेकिन ज़ेरोइन उसे पार करते हुए सीधे अंदर चली गई।

हल्की तीखी आवाज़—

“तुम्हारे अलार्म मुझे डिटेक्ट करेंगे?”

अनीश खिसियाकर हँसा।

“जोगी को तो पहचान लिया होगा?”

ज़ेरोइन ने जवाब नहीं दिया।

जेब से एक छोटी पेन ड्राइव निकाली।

पास पड़े लैपटॉप में लगा दी।

स्क्रीन पर तुरंत कई खिड़कियाँ खुलने-बंद होने लगीं।

कोड।

मैप।

डेटा।

वह बुदबुदाई—

“ये लैपटॉप अब मेरा हुआ।”

जोगी चुपचाप उसे देख रहा था।

उसका चेहरा देखने की इच्छा हुई।

पर वह चुप रहा।

तभी—

गोदाम की बड़ी स्क्रीन पर एक तस्वीर उभरी।

धुँधली सीसीटीवी फुटेज।

एक ट्रक।

कुछ दूरी पीछे—

एक काली SUV.

अनीश और जोगी स्क्रीन के पास आ गए।

ज़ेरोइन बोली—

“बस का GPS बंद होने से पहले मैंने आसपास के फोन और GPS टेलीमेट्री चेक की।

उनमें से एक पेसमेकर एक खाली गाँव में पिंग हुआ।

छेदीपुरा।”

कीबोर्ड पर कुछ टाइप किया।

नई तस्वीरें उभरीं।

“जाँच करने पर पता चला…”

“बीच रास्ते कहीं लड़कियों को बस से ट्रक में ट्रांसफर किया गया।”

अनीश धीरे से बोला—

“तो… लड़कियाँ छेदीपुरा में हैं?”

ज़ेरोइन ने एक आखिरी की-स्ट्रोक मारी।

पेन ड्राइव निकाल ली।

लैपटॉप की स्क्रीन झपकी।

फिर बंद।

हल्का धुआँ उठा।

मदरबोर्ड जल चुका था।

“डिटेल तुम्हारे ईमेल पर भेज दी हैं।”

वह मुड़ी।

तेज़ी से दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगी।

अनीश पीछे से बोला—

“अरे… रात तक तो रुक जाओ।”

ज़ेरोइन दरवाज़े तक पहुँचकर रुकी।

पर पीछे मुड़ी नहीं।

धीमे स्वर में बोली—

“जिन लोगों से तुमने पंगा लिया है न…”

एक पल रुकी।

“…तुम्हारे ज़िंदा रहने के चांस एक परसेंट से भी कम हैं।”

हल्की साँस ली।

“शायद आधा।”

अनीश मुस्कुराया।

“फिर तो हमारी डेट पेंडिंग रहेगी।”

ज़ेरोइन की आवाज़ में हल्की हँसी थी—

“पहले इस केस से निकलो…”

“फिर देखेंगे।”

वह तेज़ी से बाहर चली गई।

दरवाज़ा बंद।

कुछ सेकंड सन्नाटा।

अनीश ने हाथ छाती पर रखा।

नाटकीय अंदाज़ में बोला—

“हाय… मेरी जान।”

फिर तुरंत चेहरा सख्त हो गया।

सीरियस मोड।

गोदाम में फिर वही ठंडी खामोशी।

जोगी स्क्रीन की तरफ देख रहा था।

धीरे से बोला—

“छेदीपुरा… कब निकलना है?”

अनीश ने बिना देर किए जवाब दिया—

“अभी के अभी।”

दोनों ने आख़िरी बार अपनी बंदूकें चेक कीं।

राइफ़ल और पिस्तौल कॉक की।

मैगज़ीन निकाली।

फिर वापस फिट की।

एक-एक हथियार हाथ में तौलकर देखा।

जोगी ने अपने जूतों के अंदर पतले चाकू खोंस लिए।

पीठ के पीछे एक तमंचा।

कंधे पर राइफ़ल का स्ट्रैप कस लिया।

गाड़ी की डिक्की खुली।

अंदर कई एक्स्ट्रा बंदूकें।

गोली के डिब्बे।

दो हैंड ग्रेनेड।

और एक कोने में सावधानी से रखी हुई—

दो लैंडमाइन्स।

डिक्की बंद।

आधे घंटे बाद उनकी गाड़ी गोदाम से बाहर निकली।

पीछे ऑटोमैटिक शटर गिर गया।

लोहे की भारी आवाज़।

उनकी गाड़ी सड़क पर मुड़ी।

धीरे-धीरे अंधेरे में गुम हो गई।

गोदाम के पीछे फिर सन्नाटा लौट आया।

कुछ पल।

फिर— काफी दूर झाड़ियों के भीतर कहीं

एक दूसरी कार का इंजन धीरे से स्टार्ट हुआ।

हेडलाइट नहीं जली।

बस इंजन की हल्की घरघराहट।

कार धीरे-धीरे सड़क की तरफ सरकी।

और कुछ दूरी बनाए रखते हुए

अनीश और जोगी की गाड़ी के पीछे हो ली।

अनीश तेज़ी से गाड़ी भगा रहा था।

सड़कें धीरे-धीरे पीछे छूटने लगीं।

कुछ देर बाद—

जोगी ने फोन देखा।

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

अनीश ने साइड से देखा।

“क्या हुआ?”

जोगी बोला—

“मेरा एक पुराना आर्मी का दोस्त है।

एक बार उसकी जान बचाई थी मैंने।”

फोन स्क्रीन अनीश की तरफ घुमाई।

“उसने एक तोहफ़ा भेजा है।

कुछ जंग के खिलौने।

काम आएँगे।”

अनीश ने एक पल सोचा।

“तेरे भरोसे का है?”

जोगी ने बिना झिझक कहा—

“जान के बदले जान देने को तैयार था।

दगा नहीं देगा।”

अनीश ने स्टीयरिंग मोड़ा।

गाड़ी नई दिशा में मुड़ गई।

“कहाँ?”

जोगी ने फोन पर एड्रेस दिखाया।

अनीश ने सिर हिलाया।

“छेदीपुरा के रास्ते में ही है।”

गाड़ी हाईवे पर और तेज़ हो गई।

कुछ देर बाद वे शहर के बाहर बने एक बड़े स्टोरेज सेंटर पर पहुँचे।

चारों तरफ ऊँची जालीदार बाड़।

लोहे का बड़ा गेट।

गेट पर एक सिक्योरिटी गार्ड।

जोगी ने फोन पर एक कोड दिखाया।

गार्ड ने हैंड-स्कैनर से उसे स्कैन किया।

एक बीप हुई।

फाटक धीरे-धीरे खुल गया।

कोई सवाल नहीं।

कोई बातचीत नहीं।

गार्ड ने बस हाथ से अंदर की तरफ इशारा कर दिया।

अंदर एक विशाल गोदामनुमा परिसर था।

दोनों तरफ कतार में लगी शटर वाली स्टोरेज यूनिट्स।

नंबर लिखे हुए।

जोगी ने फोन पर मैसेज देखा।

नंबर मिलाया।

सामने वाली यूनिट के पास जाकर कोड डाला।

लॉक खुला।

उसने शटर दोनों हाथों से पकड़कर ज़ोर से ऊपर खींच दिया।

शटर चर्रर्र की आवाज़ के साथ ऊपर गया।

अंदर की लाइट अपने-आप जल उठी।

और जो अंदर था—

उसे देखकर

दोनों की आँखें फटी रह गईं।


— जारी —