Double Game - 31 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 31

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 31

बिस्तर पर अब सिर्फ वासना का खेल चरम पर था। भूपेंद्र ने काया के दोनों हाथों को अपने एक हाथ से पकड़कर उसके सिर के ऊपर ले जाकर लॉक कर दिया। काया का बदन बेबस था, पर उसकी मुस्कान विजयी थी। भूपेंद्र का दूसरा हाथ काया के शरीर पर बड़ी निर्लज्जता से रेंग रहा था, उसकी उंगलियाँ काया के मांस को अपनी मुट्ठी में भर रही थीं।

काया की साड़ी एक तरफ बेतरतीब ढंग से आधी उतरी हुई थी, उसका मखमली बदन पसीने की बूंदों से चमक रहा था। भूपेंद्र पागलों की तरह उसके होंठों को कुचल रहा था, जैसे वह उसके भीतर के हर शब्द को अपने भीतर सोख लेना चाहता हो। काया के कपड़े घुटनों से काफी ऊपर चढ़ चुके थे, और भूपेंद्र अपने पैरों से उसके पैरों को सहलाते हुए उस रेशमी स्पर्श का आनंद ले रहा था।

"साहब... अब तो आप मेरे ही रहेंगे न?" काया ने अपनी सिसकियों के बीच कामुक स्वर में पूछा।

"हमेशा के लिए..." भूपेंद्र ने उसकी गर्दन पर अपने होंठ जमाते हुए जवाब दिया। "आज के बाद तुम्हारे और मेरे बीच कोई नहीं आएगा। न वंशिका, न समाज।"

काया अब पूरी तरह संतुष्ट थी। उसने भूपेंद्र की जकड़ का जवाब अपनी बाहों को उसके गले में डाल कर दिया। उसने उसे अपने सीने से लगा लिया, और भूपेंद्र एक छोटे बच्चे की तरह उसकी गोद में अपना आपा खो बैठा। बिस्तर की हर सिलवट उनके विश्वासघात की गवाही दे रही थी। जिस कमरे में कभी बच्चों की किलकारियाँ गूँजती थीं, आज वहाँ सिर्फ एक अनैतिक रिश्ते की भारी सांसें सुनाई दे रही थीं। भूपेंद्र काया के ऊपर लेटा हुआ था, दोनों के बदन एक-दूसरे में गुंथे हुए थे। वह बार-बार उसके पेट को सहला रहा था, जैसे वह यह सुनिश्चित कर रहा हो कि अब यह शिकार कहीं भाग न जाए।

उसी वक्त बाहर मुख्य दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। वंशिका घर लौट आई थी। लेकिन बेडरूम के भीतर मौजूद इन दोनों को अब न पकड़े जाने का डर था और न ही शर्मिंदगी का अहसास। भूपेंद्र को तो बस अब उस नई पत्नी का इंतज़ार था जिसे वह वंशिका की राख पर बसाने वाला था।
वंशिका जैसे ही सीढ़ियाँ चढ़कर अपने बेडरूम के दरवाज़े पर पहुँची, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जो दृश्य उसकी आँखों के सामने था, उसने उसके अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया। भूपेंद्र और काया जिस आपत्तिजनक स्थिति में थे, वह किसी भी पत्नी के लिए मौत से बदतर था। वंशिका का चेहरा अपमान और क्रोध से तमतमा उठा, उसकी आँखों में खून उतर आया। वह कुछ कहना चाहती थी, चीखना चाहती थी, लेकिन शब्द उसके गले में ही फंस गए।

भूपेंद्र, जिसमें अब शर्म का नामो-निशान बाकी नहीं था, बिस्तर से उठा। उसने एक पल के लिए भी वंशिका की आँखों में छिपे दर्द को नहीं देखा। उसने निर्लज्जता की सारी हदें पार करते हुए वंशिका के मुँह पर ही धड़ाम से दरवाज़ा बंद कर दिया।
वंशिका स्तब्ध रह गई। वह एक पत्थर की मूर्ति की तरह वहीं खड़ी रही। एडवोकेट महिमा ने उससे कहा था कि सबूत जुटाना, वीडियो बनाना, पर उस पल वंशिका का दिमाग सुन्न हो गया था। एक हारे हुए योद्धा की तरह वह लड़खड़ाते कदमों से नीचे आई और अपना सिर पकड़कर सोफे पर बैठ गई। ऊपर से अब भी काया की 
खिलखिलाहट और भूपेंद्र की मदहोश आवाज़ें आ रही थीं, जो वंशिका के कानों में खौलते तेल की तरह गिर रही थीं। उसका दिमाग फटा जा रहा था। उसे यहाँ एक पल रुकना भी भारी लग रहा था, लेकिन महिमा की बात याद आते ही वह फिर से सतर्क हुई। उसने कांपते हाथों से महिमा को दोबारा फोन लगाया। "मैम, मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकती। मुझे आज और अभी इस रिश्ते से छुटकारा चाहिए," वंशिका सिसकते हुए बोली।

महिमा ने उसे शांत कराया, "वंशिका, जज़्बात से नहीं, दिमाग से काम लो। अगर तुम बिना सबूत के बाहर निकलीं, तो वह तुम्हें सड़क पर ला खड़ा करेगा। किसी भी तरह उनका वीडियो बना लो, बस एक ठोस सबूत और खेल खत्म।"

वंशिका ने भारी मन से हामी तो भर दी, लेकिन उसका अंतर्मन जानता था कि वह इतनी गिर नहीं सकती कि अपने ही पति की ऐसी घिनौनी स्थिति को रिकॉर्ड करे। फिर भी, उसने खुद को पत्थर बनाया। अगले कुछ दिनों तक वह मोबाइल हाथ में लेकर घर में साये की तरह घूमने लगी। वह मौकों की तलाश में रहती, कभी दरवाज़े की झिरी से तो कभी खिड़की के पीछे से झाँकती।

काया जितनी ऊपर से भोली दिखती थी, भीतर से उतनी ही शातिर थी। उसने गौर किया कि वंशिका अब पहले की तरह रोती-बिलखती नहीं है, बल्कि उसके हाथ में हर वक्त मोबाइल रहता है और उसकी नज़रें उन दोनों का पीछा करती हैं।

एक रात, जब भूपेंद्र मदहोशी में काया के करीब आने लगा, तो काया ने उसे रोक दिया। "साहब, थोड़ा संभल जाइये। आपने गौर किया? वह मेमसाहब अब चुपचाप हमारे पीछे घूमती रहती हैं, हाथ में मोबाइल लिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह हमारा कोई वीडियो बनाने की फिराक में हों?"

भूपेंद्र के माथे पर बल पड़ गए। "वीडियो? उसकी इतनी हिम्मत?"

"हिम्मत की बात नहीं है साहब, अगर उसे सबूत मिल गया तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। कोर्ट-कचहरी में आपकी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी," काया ने डर का बीज बोते हुए कहा।

भूपेंद्र चिंता में डूब गया। उसे समझ आ गया कि अगर वंशिका के पास कोई डिजिटल सबूत पहुँच गया, तो उसे लेने के देने पड़ जाएंगे। काया को लगा कि लोहा गरम है, हथौड़ा मार देना चाहिए। काया ने तुरंत अपना पासा पलटा। वह बिस्तर से उठी और खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई, जैसे बहुत दुखी हो।

"क्या हुआ काया?" भूपेंद्र ने बेचैनी से पूछा।

"अब मुझे डर लगने लगा है साहब," काया ने बनावटी आँसू बहाते हुए कहा। "मैं इस लुका-छिपी के खेल से थक गई हूँ। आप मुझे पत्नी का दर्जा नहीं देंगे और वह मुझे बदनाम कर देगी। इससे बेहतर है कि मैं चली जाऊँ।"

"पागल मत बनो काया! तुम जानती हो मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता," भूपेंद्र ने उसे पीछे से पकड़ने की कोशिश की।

लेकिन काया ने उसे झटक दिया। "नहीं साहब! अगर आप सच में डरते नहीं हैं, तो मुझसे वादा कीजिये कि कल ही हम वकील के पास चलेंगे और शादी के कागज़ात तैयार करेंगे। जब तक मैं आपकी कानूनी पत्नी नहीं बन जाती, मैं आपको खुद को छूने नहीं दूँगी।"

भूपेंद्र तड़प उठा। काया की देह का नशा उसके सर चढ़कर बोल रहा था। उसने देखा कि काया उससे दूर जा रही है, और वह यह बर्दाश्त नहीं कर सकता था। काया ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और खिसकाया और अपनी भीगी आँखों से उसे उकसाने लगी। उसका यह नाराज़ होना भी एक कला थी जो भूपेंद्र के होश उड़ा रही थी।
"ठीक है! मैं वादा करता हूँ," भूपेंद्र ने घुटनों के बल बैठकर कहा। "कल ही मैं तलाक के कागज़ तैयार करवाऊंगा। बस तुम मुझसे मुँह मत मोड़ो।"

काया की आँखों में जीत की चमक आई। उसने एक मोहक मुस्कान दी और खुद आगे बढ़कर भूपेंद्र को अपनी बाहों में भर लिया। उसने फिर से अपने जिस्म का जाल बिछाया, और भूपेंद्र, जो अभी डरा हुआ था, अपनी सारी चिंताएं भूलकर फिर से उसकी आगोश में खो गया।

उस रात बेडरूम में जो खिचड़ी पक रही थी, वह वंशिका के लिए काल बनने वाली थी। काया ने भूपेंद्र को पूरी तरह अपने वश में कर लिया था, और अब वह केवल नौकरानी नहीं, बल्कि इस घर की होने वाली मालकिन के रूप में खुद को देख रही थी।





क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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