काया एक शातिर दिमाग औरत थी। वह भूपेंद्र के चेहरे पर छाई हवाइयों और उसकी उखड़ी सांसों को देखकर समझ गई थी कि मामला कुछ गड़बड़ है। उसे शक होने लगा था कि कहीं अंतिम क्षणों में आकर भूपेंद्र डर न जाए या अपने कदम पीछे न खींच ले। काया ने ठान लिया था कि वह आज ही इस अनिश्चितता का अंत कर देगी। उसे अब कानून का कोई खौफ नहीं था। उसने अपने आस-पड़ोस में ऐसे कई मामले देखे थे जहाँ पति दो-दो पत्नियों को लेकर घूम रहे थे। उसे पता था कि एक बार शादी हो गई, तो कोर्ट दूसरी पत्नी का हक पूरी तरह नहीं छीनता, बल्कि पति की कमाई और जायदाद को दो हिस्सों में बाँट देता है। काया के लिए यह हर हाल में जीतने वाली स्थिति थी। चाहे कुछ भी हो, उसे इस घर में पक्का ठिकाना चाहिए था।
उस दिन काया ने अपने नाटक का हर पैंतरा आज़माया। वह पहले फूट-फूटकर रोई, फिर बेबसी का स्वांग रचा, और अंत में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर भूपेंद्र पर दबाव बनाने लगी। "अगर आज आपने मुझे अपना नाम नहीं दिया, तो मैं अभी अपनी जान दे दूँगी! मैं यह बदनामी और अपमान लेकर अब एक पल नहीं जी सकती।"
भूपेंद्र, जो पहले से ही नौकरी जाने के सदमे और वंशिका के खौफ में था, काया के इस उग्र रूप के आगे पूरी तरह टूट गया। उसे लगा कि काया ही अब उसका एकमात्र सहारा है। वह उसे खोना नहीं चाहता था। उसी दोपहर, भूपेंद्र और काया चुपचाप घर से निकले और पास के एक आर्य समाज मंदिर पहुँचे। मंत्रों के बीच, बिना किसी गवाह और बिना किसी ढोल-नगाड़े के, भूपेंद्र ने काया की माँग में सिंदूर भर दिया और उसके गले में मंगलसूत्र पहना दिया। काया के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी; उसने वह किला फतह कर लिया था जिसे वह बरसों से ललचाई नज़रों से देख रही थी। उसे पता था कि अब वह दूसरी औरत नहीं, बल्कि दूसरी पत्नी है।
शाम के वक्त जब भूपेंद्र और काया नई नवेली जोड़ी बनकर घर लौटे, तो वंशिका अभी-अभी जिम से लौटकर हॉल में बैठी थी। जैसे ही उसकी नज़र दरवाज़े पर पड़ी, उसे लगा जैसे किसी ने उसके कलेजे में जलता हुआ खंजर उतार दिया हो। काया के माथे पर चमकता सुर्ख सिंदूर और गले में झूलता वह मंगलसूत्र चिल्ला-चिल्लाकर वंशिका की हार की घोषणा कर रहे थे। वंशिका के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह पत्थर की मूरत बन गई।
भूपेंद्र ने बिना किसी भूमिका के अपने बैग से तलाक के कागज़ात निकाले और उन्हें मेज पर वंशिका के सामने पटक दिया। उसकी आवाज़ में एक क्रूरता थी जो वंशिका ने पहले कभी नहीं सुनी थी। "ये लो! इन पर साइन करो और दफा हो जाओ मेरे घर से और मेरी ज़िंदगी से। अब इस घर की मालकिन काया है।"
वंशिका की नज़रें कभी उन कागज़ात पर जातीं, तो कभी सामने खड़े उस शख्स पर जिसे उसने अपना सर्वस्व माना था। उसके चेहरे पर एक बहुत ही मद्धम और दर्दनाक मुस्कान उभरी। वह मुस्कान हार की थी, अपनी उजड़ती गृहस्थी को देखने की विवशता की थी।
वंशिका की उस खामोश चीख को देखकर पहली बार भूपेंद्र के पत्थर दिल में थोड़ी सी दया जागी। उसका लहजा अचानक थोड़ा सामान्य हुआ, वह बोला, "देखो वंशिका, जो हुआ उसमें तुम्हारी ही गलती है। यह तुम्हारी करनी की ही सज़ा है। मैं तो हमेशा तुम्हारा ही था, लेकिन तुमने मुझे कभी अपना बनाकर नहीं रखा। तुमने अपनी आज़ादी और अपने काम को मुझसे ऊपर रखा।"
भूपेंद्र के ये शब्द वंशिका के कानों में गरम सीसे की तरह चुभे। उसकी आँखों में आँसू भर आए। उसने धुंधली नज़रों से भूपेंद्र को देखा और मन ही मन सोचने लगी—'मैंने तुम्हें अपना बनाकर नहीं रखा? कहाँ कमी छोड़ी थी मैंने?' उसे याद आया कि शादी के पहले दिन से लेकर आज तक, उसने कभी भूपेंद्र को अपने करीब आने से नहीं रोका। कई बार वह अपनी हवस में दरिंदा बन जाता था, उसकी रूह काँप जाती थी, लेकिन उसने हर दर्द खामोशी से बर्दाश्त किया क्योंकि वह उसे अपना पति मानती थी। उसने दिन-भर घर के सारे काम किए, बिना किसी गलती के उसकी और उसकी माँ की डाँट खाई, शिखा के ताने सहे, अपमानित हुई, अपनी कमाई घर के खर्चों में झोंक दी... और अंत में? अंत में सारी गलती सिर्फ उसी की थी?
समाज का वही पुराना दस्तूर—अगर मर्द भटक जाए, तो दोष औरत का कि उसने उसे संभालकर नहीं रखा।
वंशिका की हिम्मत जवाब दे गई। उसने एक शब्द भी नहीं कहा। न उसने कोई दलील दी, न कोई सफाई। वह अपनी आँखों के सैलाब को रोक नहीं पाई और बिना पीछे मुड़े पागलों की तरह घर से बाहर भाग गई। पीछे घर में काया की जीत का अट्टहास गूँज रहा था और मनोरमा देवी का मौन समर्थन। वंशिका उस घर से नहीं, अपनी ज़िंदगी के सबसे बड़े विश्वास के मलबे से बाहर निकली थी।
वंशिका उस घर से किसी लाश की तरह बाहर निकली थी। दिमाग सुन्न था और पैरों के नीचे की ज़मीन जैसे खत्म हो चुकी थी। वह ठिठुरती शाम में सड़क पर बदहवास भाग रही थी, उसकी आँखों से गिरते आंसू धुंधले होकर सड़क की लाइटों में मिल रहे थे। उसे नहीं पता था कि वह कहाँ जा रही है, बस इतना पता था कि उस छत के नीचे अब उसकी सांसें घुट रही थीं।
तभी एक गाड़ी उसके पास आकर रुकी। वह शबनम और एडवोकेट महिमा थे, जो शायद कहीं जा रहे थे लेकिन वंशिका की हालत भांपकर उसके पीछे ही चली आई थी। शबनम ने दौड़कर उसे गले लगा लिया। वंशिका उसके कंधे पर सिर रखकर बिलख-बिलख कर रो पड़ी।
"शांत हो जा बहन, शांत हो जा। जो हुआ उसे बदला नहीं जा सकता, लेकिन अब जो होगा उसे हम तय करेंगे," शबनम ने उसे ढांढस बंधाया।
महिमा के ऑफिस पहुँचकर वंशिका ने कांपते हाथों से अपना फोन निकाला और वह वीडियो दिखाया जो उसने छिपकर रिकॉर्ड किया था। साथ ही उसने वह मंदिर वाली फोटो भी दिखाई जो उसे काया और भूपेंद्र की शादी के तुरंत बाद मिली थी।
महिमा ने भूपेंद्र की फोटो देखते ही अपनी नाक सिकोड़ी। उसने बड़ी हिकारत से वह फोन शबनम की ओर बढ़ा दिया। शबनम ने जैसे ही भूपेंद्र का चेहरा देखा, उसने अपना माथा पीट लिया।
"खुदा का खौफ कर बहन! तू इसके लिए रो रही है?" शबनम चिल्लाकर बोली। "मेरा मियां सोहेल तो बहुत हैंडसम था, मैं अगर उसके लिए रोती तो फिर भी समझ आता। लेकिन तेरे इस पति में ऐसा क्या है? देख तो इसे... न सिर पर बाल बचे हैं, आधा टकला हो चुका है। पेट ऐसा निकल रहा है जैसे नौ महीने की उम्मीद से हो। रंग एकदम पक्का (काला) है और कपड़े पहनने का सलीका तक नहीं है। जब ये हँसता है तो ऐसा लगता है जैसे कोई कुत्ता राल टपका रहा हो। वंशिका, तू इस नमूने के लिए अपनी जान सुखा रही है? सच कहूँ तो काया ने तुझ पर एहसान किया है जो इस बला को अपने गले बांध लिया!"
शबनम की इस बेबाक और कड़वी बातों को सुनकर एडवोकेट महिमा के चेहरे पर भी एक हल्की सी हंसी आ गई। स्थिति गंभीर थी, पर शबनम ने भूपेंद्र का जो शब्द-चित्र खींचा था, उसने वंशिका के भीतर के दुख को एक पल के लिए कम कर दिया। वंशिका ने अपनी आँखें पोंछीं और महिमा की ओर देखा।
"मैम, मज़ाक अपनी जगह है, पर मैं उस काया को अपने घर में नहीं देख सकती। क्या कानून उसे अभी के अभी बाहर नहीं फेंक सकता? उसने मेरा घर उजाड़ा है," वंशिका ने दृढ़ता से पूछा।
महिमा ने गौर से वंशिका को देखा । फिर गहरी सांस लेकर बोली....
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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