Double Game - 37 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 37

Featured Books
Categories
Share

डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 37

मनोरमा देवी के कानों तक यह खबर पहुँच चुकी थी कि उनके राजा बेटे की नौकरी जा चुकी है। यह खबर उनके लिए किसी वज्रपात से कम नहीं थी, लेकिन असली कहर तो अभी टूटना बाकी था। अब तक जो काया एक मासूम, सेवाभावी नौकरानी का मुखौटा ओढ़े हुए थी, वह अब अपने असली और भयानक रंग में आ चुकी थी। उसे पता चल गया था कि तिजोरी अब खाली होने वाली है, इसलिए उसने घर की सत्ता अपने हाथ में लेने की कवायद शुरू कर दी।

मनोरमा, जो पिछले कई दिनों से अपमान के डर से अपने कमरे में दुबकी रहती थीं, अब काया के सीधे निशाने पर थीं। काया ने धीरे-धीरे मनोरमा को आदेश देना और उनसे घर के काम करवाना शुरू कर दिया था।

एक सुबह जब मनोरमा ने घुटनों के दर्द का बहाना बनाकर रसोई में जाने से मना किया, तो काया ने अपनी कमर पर हाथ रखकर ऐसे ज़हरीले शब्द उगले कि मनोरमा सन्न रह गईं।

"सुनो बुढ़िया, ये नखरे वंशिका के सामने चलते होंगे, मेरे सामने नहीं। उसने तुम्हें लाड़-प्यार में बिगाड़ दिया था, तभी तो आज तुम्हारी ये हालत है।" काया की आवाज़ में वह कड़वाहट थी जो मनोरमा ने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं सुनी थी। वंशिका ने कितनी भी बहस की हो, लेकिन उसने कभी अपनी मर्यादा नहीं लाँघी थी। वह मनोरमा को माँ जी कहना कभी नहीं भूली थी।

मनोरमा काम करने की कोशिश तो करती थीं, लेकिन शरीर साथ नहीं देता था। पहले बेटी शिखा सारा काम कर लेती थी, फिर वंशिका ने घर की बागडोर ऐसे संभाली कि मनोरमा को कभी चूल्हा फूँकने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। शिखा की शादी के बाद कामवाली बाई थी, जिस पर मनोरमा अपनी सासू माँ वाली धौंस जमाकर छाती पर चढ़कर काम करवाती थीं।

आज मनोरमा को अपनी हार का अहसास हो रहा था। उन्होंने मन ही मन सोचा, "वंशिका ने बस यही गलती की। उसने मुझसे ज़ुबान लड़ाना तो सीख लिया, लेकिन किसी को अपने जूते की नोक पर कैसे रखते हैं, यह वह कभी नहीं सीख पाई।"

काया जब भी देखती कि भूपेंद्र घर पर नहीं है या वह दूसरे कमरे में है, तो वह अपना असली रौद्र रूप दिखाती। उसका स्पष्ट उद्देश्य था—मनोरमा और वंशिका की यादों को इस घर से जड़ से मिटा देना। वह चाहती थी कि बुढ़िया तंग आकर खुद घर छोड़कर चली जाए ताकि वह अकेले इस साम्राज्य की महारानी बनकर राज कर सके।

एक दोपहर, जब मनोरमा हॉल में बैठी हाँफ रही थीं, काया उनके पास आई और बड़ी बदतमीज़ी से बोली, "मेरे आदमी की मुफ्त की रोटियाँ तोड़नी हैं, तो घर का काम करना पड़ेगा। ये कोई राजमहल या पाँच सितारा होटल नहीं है। अगर इस घर में दाना-पानी चाहिए, तो घिसना पड़ेगा।"

मनोरमा ने जब विरोध करने की कोशिश की और कहा कि "ये मेरा घर है," तो काया जोर से हँस पड़ी।

"तुम्हारा घर? वह तो तब तक था जब तक वंशिका यहाँ थी। अब मैं हूँ यहाँ। मैं वह कमज़ोर औरत नहीं हूँ जिसे तुम अपने इशारों पर नचा सको।" यह कहते हुए काया ने अपनी देह पर लपेटी हुई साड़ी का पल्लू झटके से उतारा और मनोरमा के चेहरे पर फेंक दिया।
"लो, इसे धो डालो! पसीने की बदबू आ रही है इसमें से। और ध्यान रहे, ज़रा भी दाग रहा तो शाम को खाना नहीं मिलेगा।"

मनोरमा अपने इस सरेआम अपमान पर तिलमिला गईं। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि जिस काया को वे वंशिका को नीचा दिखाने के लिए मोहरा बना रही थीं, वही आज उनका गला घोंटने पर उतारू हो जाएगी। काया चाहती ही यही थी कि वह जितना बुरा बर्ताव करेगी, बुढ़िया उतनी ही जल्दी बोरिया-बिस्तर समेटकर भागेगी। मगर मनोरमा भी ज़िद पर अड़ी थीं। वे जानती थीं कि अगर वे आज इस घर से निकलीं, तो उनके पास वापस आने के लिए कोई ठिकाना नहीं है। इकलौते बेटे को वो किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी। अपमान का घूँट पीकर भी वे वहीं जमी रहीं, जिससे काया का गुस्सा और भी बढ़ गया। रसोई की दीवारों ने आज फिर एक नया मंज़र देखा—जहाँ पहले प्यार और अधिकार की बातें होती थीं, आज वहाँ नफरत और बदतमीज़ी का तांडव हो रहा था।

भूपेंद्र जब शाम को घर लौटा, तो उसके चेहरे पर हताशा की गहरी लकीरें थीं। दिन भर शहर की धूल फाँकने और कई दफ्तरों से रिजेक्शन झेलने के बाद उसकी कमर टूट चुकी थी। जैसे ही उसने घर में कदम रखा, मनोरमा देवी रोती हुई उसके पास आईं। उनके हाथ में अब भी काया की वह साड़ी थी जिसे धोने का हुक्म काया ने दिया था।

"बेटा! देख इस लड़की की बदतमीज़ी... इसने आज मेरी मर्यादा की धज्जियाँ उड़ा दीं। मुझसे नौकरों की तरह काम करवाती है और अपनी गंदी साड़ियाँ मेरे मुँह पर फेंकती है। भूपेंद्र, इसे समझा, नहीं तो मैं कहीं की नहीं रहूँगी!" मनोरमा सुबकते हुए अपनी व्यथा सुनाने लगीं।

भूपेंद्र, जो पहले से ही बेरोज़गारी और खाली जेब के तनाव में जल रहा था, उसने अपनी माँ को सांत्वना देने के बजाय उन पर ही चिल्ला दिया। "माँ! बस कीजिये। दिन भर घर में रहती हैं, अगर थोड़ा हाथ बंटा दिया तो क्या पहाड़ टूट गया? काया अकेली कितना काम करेगी? वैसे भी, आप ही तो चाहती थीं कि वह घर की बागडोर संभाले, अब जब वह संभाल रही है तो आपको तकलीफ क्यों हो रही है?"

भूपेंद्र का काया का पक्ष लेना मनोरमा के कलेजे में खंजर की तरह लगा। काया, जो दरवाज़े के पीछे खड़ी यह सब सुन रही थी, अचानक बाहर आई। उसका चेहरा गुस्से से लाल था। "साहब, देखिये अपनी माँ को! अभी से मेरे खिलाफ कान भर रही हैं," काया ने ज़हरीले स्वर में कहा। 

भूपेंद्र के जाते ही वो फिर वह मनोरमा की ओर मुड़ी और गंदे-गंदे शब्दों में ताने देने लगी। "अरे बुढ़िया, तुझे तो उस वंशिका की गुलामी करने की आदत थी न? वह मॉडर्न मेमसाहब तो तुझे अपने पैरों की जूती समझती थी, फिर भी तू उसके तलवे चाटती थी। आज मैं घर संभाल रही हूँ तो तुझे मिर्ची लग रही है? वंशिका के साथ तो तू शेरनी बनती थी, अब मेरे सामने भीगी बिल्ली क्यों बन रही है? जा, उसी के पास चली जा, शायद वह तुझे अपने जिम में झाड़ू लगाने का काम दे दे!"

काया ने वंशिका का नाम लेकर मनोरमा को इतना अपमानित किया कि उनकी रूह काँप गई। वह वंशिका, जिसे मनोरमा ने कभी चैन से नहीं रहने दिया था, आज काया की ज़ुबान पर एक हथियार बनकर मनोरमा को ही काट रही थी।

उसी रात, मनोरमा ने छिपकर अपनी बेटी शिखा को फोन किया और रो-रोकर घर के हालात बताए। शिखा, जो अपनी गृहस्थी में सुखी थी, उसने स्पष्ट शब्दों में कहा, "मम्मी, मैं पहले ही कहती थी कि काया पर इतना भरोसा मत करो। अब जब आग लग गई है, तो बेहतर है कि आप वहाँ से निकल आओ। मेरे ससुराल आ जाओ... या फिर आप कहीं और चले जाओ, पर उस घर में अब आपकी कोई इज़्ज़त नहीं बची है।"

मनोरमा ने भर्राई आवाज़ में मना कर दिया। "नहीं शिखा! 
अगर मैं यहाँ से गई, तो अपने इकलौते बेटे को हमेशा के लिए खो दूँगी। यह चुड़ैल उसे ज़िंदा खा जाएगी। उसने भूपेंद्र पर काला जादू कर दिया है। मैं इस घर को और अपने बेटे को इस औरत के भरोसे छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी। चाहे मुझे यहाँ ज़हर ही क्यों न पीना पड़े।"

मनोरमा की यह ज़िद दरअसल उनकी असुरक्षा और बेटे के प्रति वह अंधा मोह था, जिसने उन्हें इस नर्क में रहने पर मजबूर कर दिया था।


भूपेंद्र की हालत अब एक फटे हुए ढोल जैसी थी। वह अंदर से खोखला हो चुका था। नौकरी न मिलने की हताशा उसे चिड़चिड़ा बना रही थी, लेकिन जैसे ही वह काया के सामने आता, वह एक सफल और खुशहाल मर्द होने का ढोंग करने लगता।

वह जानता था कि जिस दिन काया को पता चला कि वह अब साहब नहीं बल्कि एक बेकार और बेरोज़गार आदमी है, उस दिन काया का यह प्रेम और सम्मान नफरत में बदल जाएगा। सबसे बड़ा डर उसे वंशिका का था। अगर यह बात वंशिका तक पहुँची, तो वह जीत जाएगी। उसका अहंकार उसे यह स्वीकार करने की इजाज़त नहीं दे रहा था कि वह हार चुका है।

रात को जब वह काया के पास लेटता, तो काया उससे नई साड़ी या जेवर की फरमाइश करती। भूपेंद्र हाँ में सिर तो हिला देता, लेकिन उसका दिमाग हिसाब लगा रहा होता कि अगले महीने का बिजली का बिल और राशन कहाँ से आएगा। वह काया को अपनी बाहों में तो भरता, लेकिन उसकी नज़रें अंधेरे में वंशिका के उन तलाक वाले कागज़ों को खोजतीं, जो उसकी बर्बादी का परवाना लेकर आए थे।
भूपेंद्र और काया का यह रिश्ता अब वासना से निकलकर एक भयावह समझौते में बदल रहा था, जहाँ एक तरफ झूठ की दीवार थी और दूसरी तरफ सत्ता की भूख।





क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

सर्वाधिकार सुरक्षित