any crime in Hindi Moral Stories by कमल चोपड़ा books and stories PDF | कैसा भी जुर्म

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कैसा भी जुर्म

​कैसा भी जुर्म
 कमल चोपड़ा

​आवारा घूम रहे आदमियों, लड़कों, बच्चों, सुअरों, कुत्तों और मुर्गों में से सबसे पहले कुत्तों ने ही उनका विरोध किया था। भौंकते हुए कुत्ते को पत्थर मार-मार कर खदेड़ने के बाद वे अंजलि की झुग्गी के बाहर जुटे थे। उन्हें इत्मीनान था कि उनके नाम की यहाँ काफी दहशत है। शाबू और उसके साथी से पंगा लेने की यहाँ किसी में हिम्मत नहीं है। झुग्गियों के टूटे-फूटे दरवाजों और टूटी फट्टियों से बने छेदों और फटी तिरपालों से बने झरोखों की आड़ में झाँकती घूरती हुई आँखें हैरत और दहशत से फटी जा रही थीं। गुण्डागर्दी की हद है। इतना खराब हो चुका है वक्त? इसकी इतनी जुर्रत कि अपने दो साथी गुण्डों के साथ अन्धे वहशी की तरह आया था शाबू। दिनदहाड़े बेखौफ।

​जबरदस्ती अंजलि की झुग्गियों में घुसने की गुण्डे कोशिश करने लगे। डर खौफ के मारे अंजलि चीखने लगी। उसकी करुण चीख-पुकार ने आसपास के लोगों जिन्हें कि शायद कोई साँप सूँघ गया था, को झकझोरा। एक बुढ़िया बाहर आकर उन्हें गालियाँ बकने लगी। उसकी जुबान बन्द करने के लिए गुण्डे आगे बढ़े। आसपास के लोग जैसे जागे। उनके रहते उनकी आँखों के सामने एक लड़की के साथ जबरदस्ती और एक बुढ़िया को पीटा जा रहा है। उन्हें अपनी बेटी और माँ का ख्याल आया। बीच-बचाव करने के ख्याल से डरते-डरते बाहर निकले। उन्हें आता देख गुण्डे डर गये। पहले दबे-पाँव फिर बन्दूक से छूटी गोली की तरह भाग खड़े हुए। उन्हें भागता देख आसपास के लोगों की मर्दानगी जागी। डण्डे-सरिये लेकर वे शाबू को ललकारने लगे। साथियों के भाग जाने से शाबू अकेला पड़ गया था। सामने खड़ी बिल्लियों की भीड़ को देखकर चूहे की तरह थर-थर काँपने लगा था। जेब से चाकू निकालने की भी हिम्मत नहीं हुई। भाग निकलने की कोशिश की उसने, लेकिन लोगों ने उसे धर दबोचा। जूते-लात जो बन पड़ा चलाने लगे। लात-जूतों के नीचे बिलबिलाता हुआ इतना बड़ा गुण्डा किसी पिल्ले की तरह किंकिया रहा था। हैरान थे वे ऐसा क्या था इस गुण्डे में, जिससे कि वे अपनी बहन-बेटी की रक्षा करने में भी डर रहे थे। शायद उसकी ताकत से उनका डर बढ़ा था।

​चेहरा पोंछा अंजलि ने अपनी चुन्नी से। डर पुँछ गया। अपनों के बीच सुरक्षित है वह। सुखवीर चाचा, कृष्णा मौसी, कांता मौसी, इसाक चाचा, फत्तू मामा, मदन भाई, मंजूर भाई, आलम भाई सभी तो अपने हैं। अकेली कहाँ है वह?

​बहुत हो गया। अब इसे जाने दो। कहीं मर-मरा न जाये। एक बुजुर्ग की इस राय को काटते हुए मंजूर ने कहा कि नहीं, पहले अंजलि बहन अपने हाथ से इसे इकत्तीस जूते मारे, तब उनका गुस्सा शांत होगा। इसे अक्ल आयेगी और आगे से ये ऐसी जुर्रत और हिमाकत नहीं कर पायेगा। उसकी बात को समर्थन मिला।

​अंजलि थरथराई। उसके बहुत मना करने और उनके बहुत मनाने के बाद वह हाथ में जूता लेकर आगे बढ़ी। ग्यारह जूते भी नहीं लगा पाई कि एकाएक अपनी झुग्गी की ओर वापिस दौड़ पड़ी वह। आसपास की औरतें आकर सहानुभूति जताने लगी थीं—कितना दम बढ़ गया है इन गुण्डे-बदमाशों का? दिन-दहाड़े?

​रुलाई फूट पड़ी थी अंजलि की। मन पसीज गया था वहाँ जमा औरतों का—देखो तो इस बेचारी बेकसूर को? माँ बचपन में ही मर गयी। दो साल पहले बाप भी, अचानक दिमागी बुखार हुआ और चल बसा। एक छोटा भाई है। वो अकेला बेचारा क्या करे? घर में बैठे इसकी रखवाली करे या काम पर जाये? हद ही हो गयी, कोई अपने घर में महफूज नहीं?

​सामने की झुग्गी में रहनेवाली कांता मौसी ने दुलार-पुचकारकर उसे चुप कराने की कोशिश की। अंजलि बिलख पड़ी, "एक साल से वो कंजर कमीना मेरे पीछे क्यों पड़ा है? मेरा तो कहीं आना-जाना भी बन्द हो गया है। एक साल से घर में रहती हूँ।"

​साल पहले खाये थप्पड़ का बदला लेने यहाँ तक आ पहुँचेगा, अंजलि ने सोचा भी नहीं था। बड़े बाजार में घूमते हुए एक दिन शाबू ने छेड़ दिया था अंजलि को। आव देखा न ताव, अंजलि ने उसे एक जोरदार तमाचा दे मारा। तिलमिलाकर रह गया वह। अचानक ऐसे जोरदार तमाचे की उसे उम्मीद नहीं थी, वह भी भरे बाजार में। आसपास के दुकानदार जो उसकी गुण्डागर्दी के बारे में जानते थे, तटस्थ बने रहे। जैसे कुछ हुआ ही न हो! कौन पंगा ले गुण्डों से। आते-जाते लोग जो उसके नामी गुण्डा होने के बारे में नहीं जानते थे, उन्होंने उसे पकड़ लिया और गालियाँ बकते हुए थप्पड़-जूते चलाने लगे—साले...लफंगे! भरे बाजार में लड़की छेड़ता है?

​मौके से जान-बचाकर भाग खड़े होने के सिवाय उसके पास कोई चारा नहीं था। लेकिन जाते-जाते भी वह धमकी दे गया था कि वह अंजलि से इस बेइज्जती का बदला लेगा। उसे छोड़ेगा नहीं।

​शाम को उसका भाई नन्दू जब काम से लौटेगा तो वह उसे इस घटना के बारे में नहीं बतायेगी, सोचा था उसने। आखिर भाई है, सुनकर खून तो खौलेगा ही। पिछली बार भी कितना आपे से बाहर हो गया था। गुण्डों से भिड़कर उन्हें जिन्दा न छोड़ने की बातें करने लगा था। कितना समझाया था उसने। कहाँ वो गुण्डे-मवाली और कहाँ वह चौदह-पन्द्रह साल का दुबला-पतला लड़का। गुण्डे-मवालियों की तो कोई इज्जत होती नहीं। लड़ाई-भिड़ाई से बात बढ़ी तो उन्हीं की बदनामी होगी। बहुत मुश्किल से शांत कर पाई थी वह अपने भाई को। उसने बहन के आगे शर्त रख दी थी कि आज के बाद वह काम पर नहीं जायेगी। घर पर ही रहेगी। वह अकेला ही कमाकर लाएगा।

​दो-एक बार वह घर से निकली भी लेकिन जाने कहाँ से कैसे शाबू को खबर मिली। उसने उसका रास्ता रोका और फब्ती-फिकरे कसे, लेकिन मौके पर मौजूद लोगों के एतराज के कारण शाबू को ही जलील और शर्मिंदा होना पड़ा था।

​शाबू की इतनी हिम्मत बढ़ गयी कि आज दिन-दहाड़े घर में घुसकर उसके साथ जोर-जबरदस्ती करने पर उतर आया? दुनिया-समाज-कायदा-कानून किसी की परवाह नहीं की उसने? हैरान परेशान थी वह।

​ऐसी बातें छुपती कहाँ हैं? घर में घुसने से पहले ही आसपासवालों से नन्दू को पूरी खबर मिल गयी थी। रात हो चुकी थी। एकदम बुझा-थका टूटा-सा वह घर में घुसा। रो-रोकर अंजलि की आँखें सूजी हुई थीं। भाई के सामने उसने अपने-आपको सामान्य बनाये रखने की कोशिश की। जैसे कुछ हुआ ही न हो! नन्दू के दिलो-दिमाग पर चिन्ता और डर के साँप फुफकार रहे थे। इतनी हिम्मत बढ़ गयी उसकी कि वह घर तक आ पहुँचा। कुछ तो करना ही पड़ेगा। लेकिन वह कमजोर उनका मुकाबला करे तो कैसे? ऊपर से बदनामी का डर? लेकिन ऐसे तो उनकी हिम्मत बढ़ती ही जायेगी।

​किसी बड़े बुजुर्ग की तरह बहुत संजीदा और भारी आवाज में उसने बहन से कहा, "तू चिन्ता मत कर...सब ठीक हो जायेगा।" रात काफी देर तक अंजलि के रोने-सुबकने की आवाजें आती रही थीं।

   डर, चिन्ता और गुस्से के मारे पहले ही से बेचैन था वह। बहन की रक्षा करे तो कैसे? उठकर बैठ गया वह। क्या करे वह। ठीक है दो-एक बार लोगों ने बचा लिया...? पुलिस के पास जाने का कोई फायदा ही नहीं। बहुत बड़ी पहुँच या पैसा हो तब तो वे कुछ करेंगे वर्ना पुलिस से उम्मीद करना बेवकूफी है। परेशानी बढ़ जायेगी।

​एकाएक उसे ख्याल आया। लोहा लोहे को काटता है। काँटे से ही काँटा निकलता है। गुण्डे को गुण्डे से ही भिड़ाना पड़ेगा। शाबू से भी बड़े गुण्डे 'बल्ली' को जानता है वह। शाबू उसके सामने क्या है? संयोगवश वह राजनगर के टैक्सी स्टैण्ड के पास बने जिस ढाबे पर नौकरी करता है, लगभग रोजाना शाम को बल्ली उस ढाबे पर पीने-खाने आता है। हुक्म चलाता है, 'नन्दू, ये लाओ वो लाओ।' जितनी देर वह ढाबे पर रहता है, वह उसकी सेवा में हाजिर रहता है। उसकी सेवा से खुश होकर दो-एक बार वह उससे कह चुका है, 'नन्दू यार! तू मेरे छोटे भाई जैसा है। कभी कोई तुझे तंग करे तो बिना झिझक मुझे बताइयो...।'

​मुँह-अँधेरे उठकर वह घर से निकल पड़ा था। आज काम पर नहीं जाना उसे। बल्ली से बात करनी है। अन्दर ही अन्दर डर रहा था वह। गुण्डों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए उसे। बात और की और ही न बन जाये। बात बढ़ भी सकती है। लेकिन कल कुछ ऊँच-नीच हो गयी तो? निपटाना तो पड़ेगा इस पचड़े को?

​राजनगर के साथ लगनेवाली डबलस्टोरी क्वार्टरों के पीछे की तरफ कहीं रहता है बल्ली। सुन रखा था उसने। पूछते-पूछते पहुँच ही जायेगा। दिन काफी निकल आया था, ढूँढ़ते-ढूँढ़ते पहुँच तो गया वह, पर क्वार्टर पर ताला लगा हुआ था। एकदम लाचार, निराश और मायूस हो आया वह। बाहर खुले में चारपाई पर एक बूढ़ा बैठा हुआ था। एक पुलिसवाला भी बल्ली को खोज रहा था। शायद उसे भी बल्ली से कोई जरूरी काम था। बूढ़े से कुछ पूछकर पुलिसवाला लौट गया। उसके काफी दूर निकल जाने के बाद नन्दू ने आगे बढ़कर बूढ़े से बल्ली के बारे में पूछा।

​बुरा-सा मुँह बनाते हुए बूढ़े ने बताया, आज सुबह-सुबह नेता श्रीनिवास पाण्डे का कोई आदमी आया और बल्ली को अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाकर ले गया है। बात कर रहे थे कि रात को बड़े बाजार के राम मन्दिर में किसी ने माँस के लोथड़े फेंककर उसे अपवित्र करने की हरकत की है। दो-चार लौण्डे और भी आये थे। सुबह जाते-जाते बल्ली उन्हें भी राम मन्दिर पहुँचने के लिए कहा था। म्लेच्छों की नापाक हरकत का जवाब देंगे। सबक सिखायेंगे उन्हें।

​घर लौट जाये या ढाबे पर चलकर अपना काम करे? कहाँ जाये वह। बड़ा बाजार तीन-चार मील दूर है यहाँ से। भीड़-भड़क्के में बल्ली से क्या बात हो पाएगी? क्या पता मौका मिल जाये और बात हो जाये।

​उसके कदम तेजी से बड़े बाजार की ओर बढ़ने लगे। रास्ते में सायरन बजाती पुलिस की कोई जीप उसके पास से गुजर जाती तो उसकी रूह काँपकर रह जाती। उसका दिल डर रहा था जाने कौन-सी उम्मीद उसे राम मन्दिर की ओर खींचे लिए जा रही थी। मन्दिर के पास खासी भीड़ जमा थी। रह-रहकर हवा में नारे गूँजने लगते। नारों का यह भयावह शोर उसके कानों के जरिए उसके दिलो-दिमाग में सैकड़ों साँपों की फुफकार की तरह उतरा था। भौंचक्क था वह। हो क्या रहा है? इक्का-दुक्का दुकानें तो छुट्टीवाले दिन भी खुली मिल जाती थीं पर आज? दंगा-फसाद, लूटमार, आगजनी और मारकाट होगी। म्लेच्छों को सबक सिखाया जायेगा। तमाशा देखने के लिए तैयार थी भीड़। बेचैन और बेसब्र मरने-मारने पर उतारू भीड़ का एक हिस्सा सैनिकों की तरह आगे बढ़ आया था।

​पहचान पाना मुश्किल था कि आमतौर पर साइकिल, रिक्शा, पैदल आदमी, औरतों, ग्राहकों, सेल्समैनों, माल ढोनेवालों, रेहड़ी-खोमचेवालों से ठसा-ठस रहनेवाला वही बड़ा बाजार आज एकदम खाली वीरान और सुनसान पड़ा है।

​डरा-सहमा सा नन्दू भीड़ में शामिल हो गया था। तमाशा देखने के लिए तैयार थी भीड़। बेचैन और बेसब्र। मरने-मारने पर उतारू भीड़ का एक हिस्सा सैनिकों की तरह आगे बढ़ आया था। बल्ली इस जत्थे में सबसे आगे था। उसके दोस्त रघु, शेरू और कल्लू उसके पीछे-पीछे थे। गुस्से और नफरत में अन्धी भीड़ पीछे-पीछे चली आ रही थी।

​अपनी पूरी ताकत वे ऊपरवाले के नाम का नारा लगाने में लगा रहे थे। डण्डे, लोहे के सरिये, पेट्रोल के डिब्बे, पत्थर, साइकिल की चेन, पुराने टायर जिसे जो मिला, लेकर चल दिया था। चीख-चीखकर नारे लगाने की वजह से उनके गले बैठ गये थे। फिर भी वे गला फाड़-फाड़कर नारे लगा रहे थे।

​शक्ति प्रदर्शन के लिए उन्होंने नुक्कड़ के एक बूढ़े चायवाले के बन्द पड़े खोखे को फूँक दिया था। संयोग से बूढ़ा नये बाजार चीनी और चायपत्ती लेने गया हुआ था, वर्ना आज उसे सजा-ए-मौत का दण्ड दे दिया जाता। हालाँकि उसने उनका क्या, कभी किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा था। उसका कसूर था तो सिर्फ यह कि जिन्दगीभर वह एक खास मजहब के नियमों को मानता रहा था। बाजार पर आज बल्ली और उसके दोस्तों का राज था, जिसे चाहे लूटें मारें या जलायें।

​मॉडर्न हेयर ड्रेसर और ओ.के. टेलर्स की दुकानें फूँकने के बाद दंगाइयों ने पंखों की मोटरें बनानेवाली फैक्टरी के मालिक आसिफ मियाँ को उसके घर से बाहर खींच निकाला। उसकी आँखें फटीं और चेहरा एकदम जर्द हो आया था। मैंने क्या किया है? मेरा कसूर? भीड़ अन्धी, वहशी और बहरी होकर चिल्ला रही थी। उसे बाजार के बीचों-बीच लाकर बल्ली ने अपने हाथ का लोहे का सरिया हवा में लहराया और उसके सिर पर दे मारा। 60-61 साल का वह आदमी वहीं ढेर हो गया। खून बहकर आसपास के छोटे-छोटे गड्ढों में भरने लगा।

​सरिये का कोई अदृश्य-सा वार भीड़ के साथ-साथ चलते नन्दू के दिमाग पर भी हुआ। ये मरियल बूढ़ा-सा आदमी हमारे धर्म के लिए क्या खतरा हो सकता था। धरम-धुरम नहीं दरिन्दगी है यह तो? ऐसे होता है युद्ध?

​वहशत और उन्माद में झूमता दंगाई जत्था आगे बढ़ चला था। निराश हो चला था नन्दू। बल्ली से बात करने के लिए उसे मौके की तलाश थी, जोकि नहीं मिल रहा था।

​भीड़ में से होता हुआ नन्दू बल्ली के लगभग पीछे चल रहा था। बल्ली के साथ-साथ चल रहे उसी के साथी शेरू ने पूछा, "उस्ताद! आसिफ मियाँ को क्यों लुढ़का दिया? वो बेचारा तो बड़ा नेक और शरीफ आदमी था। ठहाका मारकर हँसते हुए बल्ली ने कहा, "हमें क्या लेना-देना? अपने को तो नेता पांडेजी ने कहा था, लुढ़का दिया। असल में पांडेजी ने इससे पाँच लाख रुपये उधार ले रखे थे। अब ये वापिस माँगने लगा था। अब कौन माँगने आयेगा? इसका कोई वारिस आया भी तो पांडेजी कह देंगे, दे दिये थे। किस्सा खत्म।"

​हैरान था शेरू। पांडेजी की शैतानी खोपड़ी में क्या-क्या आइडिये आते हैं? हा-हा...।

​सामने टँगे हुए साइन बोर्डों पर बल्ली की नजर कुछ ढूँढ़ रही थी। जलूस बड़े बाजार के लगभग बीचों-बीच पहुँच चुका था। बल्ली थोड़ा खीझा हुआ था। साथ-साथ चल रहे कल्लू को भीड़ से थोड़ा परे ले जाकर उसने पूछा, "आलम इलेक्ट्रॉनिक्सवाले का शोरूम कहाँ है? पीछे तो नहीं छूट गया?" हैरानी से सिर झटकते हुए कल्लू चहका, "अरे वो सामने क्या है? हरे बोर्ड पे पीले अक्षर?"

​"अच्छा तो ये है!"

  इलेक्ट्रॉनिक्स के उस शोरूम के बड़े शटर को बल्ली ने सब्बल मार-मार ताला तोड़ा और अन्दर घुस गया—लूटो-लूटो...!

​एकाएक वे धर्म-योद्धा चोर-उच्चक्कों और उठाईगीरों में बदल गये। टी.वी., वी.सी.आर., म्यूजिक सिस्टम, कुर्सी, पंखा जिसके जो हाथ लगा उठा-उठाकर भागने लगा। छीना-झपटी मच गयी। जयकारे लगने बन्द हो गये। धर्म की लड़ाई चीजें हथिया लेने की लड़ाई में बदल गयी। आपस में ही उलझ गये थे वे। लूट-खसोट और छीना-झपटी करके जाने धर्म का कौन-सा काम कर रहे थे। पुण्य-लाभ का किसे पता? चीजों का लाभ हो रहा था उन्हें। चोटों और खरोंचों की किसे परवाह थी।

​उनतीस इंची टी.वी. को मिलकर उठाकर ले जा रहे थे दो योद्धा। नजर पड़ते ही बल्ली ने उन्हें रोका, "इसे तो मेरे घर पहुँचाकर आओ। जानते हो न मेरा नाम बल्ली है। पहुँचाकर जल्दी लौट आओ। आगे भी दो-एक दुकानें लूटनी हैं। तुम्हारा भी फायदा करवा दूँगा। वर्ना...।"

​कौन पंगा ले बल्ली से। बल्कि यही मौका है इससे घनिष्ठता बढ़ाने का। कह रहा है तो फायदा करवायेगा। खुशी-खुशी चल दिये थे, वे जैसे धर्म का बड़ा काम करने जा रहे हों!

​शोरूम की काम में आ सकनेवाली हर चीज, बल्ब, पायदान तक कुछ देर में पार कर दी गयी थी। जैसे चीजें उन्हीं के धर्म की थीं। शीशे और फिक्स चीजों को सब्बल मार-मारकर तोड़ दिया गया था जैसे वे दूसरे धर्म की थीं, जिनके नष्ट हो जाने से उनके धर्म पर मँडरा रहा खतरा टल जायेगा।

​बल्ली ने आगे बढ़कर फिर से धर्म का जयकारा बुलाया। जवाब में भीड़ ने भी जवाबी नारा लगाया। चोर-उच्चक्कों, उठाईगीरों का झुण्ड फिर से धर्म योद्धाओं की तरह आगे बढ़ चला।

​बल्ली के पास आकर रघु ने कहा, "अब हमें खिसक लेना चाहिए। पुलिस आती ही होगी।" बल्ली ने घड़ी पर निगाह डाली, "अभी थोड़ा टाइम है। जैसे ही दूर से सायरन की आवाज आती सुनाई देगी तो खिसक लेंगे। पांडेजी ने जो-जो काम बताये थे लगभग निबट ही गये हैं। बस वो सामने लाला लक्ष्मीचन्द की दुकानों को आग लगानी है। इसमें बहुत पुराने-पुराने किरायेदार फँसे हुए हैं। संयोग से वो मुसलमान हैं। लाला लक्ष्मीचन्द को खाली करा देने का वायदा किया हुआ है नेता श्रीनिवास पांडे ने। एकाध दुकानदार जल मरेगा। एकाध भाग जायेगा, कुछ नहीं तो बरबाद तो हो ही जायेगा।"

​बल्ली के पास टाइम ही नहीं आज तो। कत्ल, लूटमार, मारकाट जो मन चाहे अपराध कर सकता है। धर्म की आड़ में अपने मकसद हल कर रहा है साला। ऐसे में वह बल्ली से क्या बात करे? ऐसे में कब तक इनके पीछे-पीछे चलता रहेगा? आज तो कोई उम्मीद नहीं। उसे लौट जाना चाहिए।

​अपने-आप पर खीझ हो रही थी उसे। गुण्डों से मदद माँगने आया था वह? गुण्डों के पास क्या ज्यादा ताकत होती है। उसके भी हाथ-पाँव हैं। ज्यादा ही होगा तो काम छोड़ देगा; वह हर वक्त दीदी के साथ रहेगा। वह भी लाठी-चाकू रख सकता है। घर पर ही लिफाफे बनाने का काम कर लेंगे भाई-बहन। फिर अभी समाज है। कानून है। दो-तीन बार पहले भी मुँह की खा चुका है। हो सकता है शाबू अब हिम्मत ही न करे। लौटते हुए उसकी रूह काँप रही थी। वह रास्ते में है, मुस्लिम दंगाइयों के हत्थे चढ़ गया तो?

​बन्द दुकानें, सुनसान सड़कें और दूर से आती हुई, नारों के भयानक शोर के बीच इनसानों के करुण चीत्कार की आवाजें। थरथराहट के बावजूद उसके कदम बस्ती की ओर तेजी से बढ़ रहे थे।

​फैज बाजार ज्यों-ज्यों नजदीक आ रहा था। नारों की आवाज और चीख-पुकार की आवाजें तेज होती जा रही थीं। सामने से भागते आते एक आदमी ने भागते-भागते कहा, "उधर फैज बाजार में मुस्लिम दंगाइयों ने लूटपाट मारकाट मचा रखी है। अगर तुम हिन्दू हो तो उधर मत जाओ।"

​सैकड़ों साँप उसके कदमों से लिपट गये। पाँव एकाएक रुक गये। कैसा अन्धा-युद्ध है। हिन्दू-मुस्लिम कुछ नहीं। योद्धा नहीं गुण्डे ही हैं ये। जाने क्या गुजर गयी उस पर। एकाएक वह बड़े बाजार की ओर दौड़ पड़ा।

​लूटपाट, आगजनी और मारकाट मचाता हुआ दंगाई-जत्था काफी आगे बढ़ चुका था। बल्ली, शेरू, कल्लू दंगाइयों की अगुवाई कर रहे थे। नन्दू दौड़ता हुआ आकर उनके सामने खड़ा हो गया। हाँफता हुआ बोला, "निर्दोष, निहत्थों को मारने से क्या फायदा? उधर फैज बाजार में कुछ मुस्लिम गुण्डे चुन-चुनकर हिन्दुओं को मार रहे हैं। असली मुजरिम हैं वे गुण्डे। मारना है तो उन गुण्डों को मारो। लड़ना है तो उनसे लड़ो। युद्ध करना है तो उनसे करो। अपनी सेना लेकर फैज बाजार चलो और भिड़ो उन गुण्डों से।"

​बगले झाँकने लगे दंगाई। मिरगी के दौरे की तरह जबड़े भींचने लगे। गुस्से से फटा बल्ली, "आमने-सामने भिड़ेंगे तो हो गया युद्ध, न वे बचेंगे न हम। वे लोग सामने पड़ भी जायें तो हमें रास्ता बदल लेना है।"

​शक्लें देखता रह गया नन्दू। गुस्से के मारे उससे बोला भी नहीं जा रहा था—तो फिर ये कैसा युद्ध है?

   ठहठहाकर बल्ली बोला, "युद्ध-वुद्ध क्या? हमें तो मज़ा मारने और माल लूटने-हथियाने से मतलब है।"

​अनगिनत कुत्तों ने जैसे उस पर हमला बोल दिया! सिर्फ बोटियों से मतलब है इन्हें। मारकाट मचानेवाले अन्धे दरिन्दे हैं ये। कौन-सा खुदा या भगवान इस मारकाट से खुश होगा? कुत्ते भी बेवजह हिंसक नहीं होते।

​प्रलाप की-सी अवस्था में उसके मुँह से निकला, "फैज बाजार के गुण्डे और तुममें क्या अन्तर है?"

​पूँछ पर लात पड़ गयी दंगाइयों के—हमें गुण्डा कहता है?

मौत आयी है साले की? तभी तो इनसानियत का दौरा पड़ा हुआ है साले को।

​टूट पड़े वे उस पर। थप्पड़, घूँसे, तुड्डे और लात चलाने लगे। एक दंगाई ने लोहे का सरिया लहराया। बल्ली ने उसे रोका, "अरे! ये तो ढाबेवाला नन्दू है। अपने ही धर्म का... जाने दो...।"

​लात मारकर एक दंगाई ने उसे एक तरफ को गिरा दिया। भाग साले...! समझ नहीं आया उसे—सैनिक हैं तो जाकर मैदान में लड़ें, यह क्या? लड़ाई वहाँ हो रही है और ये यहाँ लड़ रहे हैं। लड़ाई नहीं ये, बर्बरता है।

​थोड़ी दूर पर जल रही दुकानों पर नज़र डालते हुए बल्ली ने कहा, "काम निबट गया है। अब हमें निकल लेना चाहिए।"

​साथियों की भी यही राय थी। पर कल्लू वहीं जमकर खड़ा हो गया। कनपटी खुजाते हुए बल्ली से बोला, "अगली गली में सज्जाद मियाँ का घर है। आपको तो पता है, उसकी बेटी शहनाज पर मेरा दिल है। उसके चक्कर में कई बार जूते खा चुका हूँ पर वो साली तो... दंगे में तो सबकुछ मुमकिन और माफ़ है..."

​क्रूर अट्टहास गूँजा और दंगाई अगली गली की ओर मुड़ गये।

​रूह काँप गयी नन्दू की। बुरी तरह थरथराने लगा वह, वहाँ झुग्गी में मेरी बहन भी अकेली होगी। गुण्डे तो गुण्डे ही होते हैं। गुण्डों का क्या धर्म? फिर शाबू है ही दूसरे धर्म का?

​बदहवास-सा भागा जा रहा था वह अपने घर की ओर। वह शास्त्री नगर की ओर मुड़ गया था ताकि रास्ते में फैज बाजार न पड़े। उसके माथे से पसीना चुहचुहा रहा था। अगर आज शाबू अपने साथियों के साथ आया और अपने मजहब के नारे लगाने लगा तो मामला मजहब का हो जायेगा। धर्म का नाम लेते ही कोई आगे नहीं आयेगा। अकेली पड़ जायेगी मेरी बहन। वो सुखवीर चाचा, आलम भाई, इसाक चाचा, फत्तू मामा, मदन भाई, मंजूर भाई, कान्ता मौसी सभी हिन्दू हो जायेंगे—मुस्लिम हो जायेंगे। अपना कोई नहीं होगा। अपनों के बीच अकेली होगी मेरी बहन।

​ज्यों-ज्यों झुग्गियाँ नजदीक आ रही थीं, उसका दिल धड़कने लगा था—जो जुर्म किसी तरह भी सम्भव न हो धर्म की आड़ में कितनी आसानी से सम्भव हो जाता है। वो चाचा, वो मामा, वो मौसी, वो ताया कैसे भूल जाते हैं अपना-अपना धर्म। डरकर अपने-अपने दड़बों में घुस जाते हैं। बाहर अन्धे-भूखे भेड़िये बने वो गुण्डे बतायेंगे उन्हें उनका धर्म? बड़े बाजार के गुण्डे हों या फैज बाजार के? पुलिस हो या नेता, किसी का कुछ लेना-देना नहीं धर्म से। फिर भी जारी है अंधी लड़ाई...!

​जलते हुए घर और दुकानों का धुआँ और दूर से आती हुई रोने-चीखने की आवाजें उसके अन्दर गोलियों की तरह उतर रही थीं। सब तरफ दरवाजे खिड़कियाँ बन्द थीं और गलियाँ सुनसान। बेकसूर भी नहीं, डरकर अन्दर छुपे लोग जो होने दे रहे हैं ये सब अपने सामने। होता रहेगा इन पर अन्धी भूख और लपलपाते लालच का हमला।