Dark Night - Part 3 in Hindi Thriller by Reena books and stories PDF | अंधेर रात - भाग 3

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अंधेर रात - भाग 3


Part 3 — पीछे कौन था

छप… छप… छप…

कमरे के अंदर गीले पैरों की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। आयुष का शरीर जैसे पत्थर बन गया। वह मुड़ना चाहता था, लेकिन डर ने उसकी गर्दन जकड़ ली थी। साँस गले में अटक रही थी। कमरे की हवा अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई।
फोन फर्श पर पड़ा था, उसकी स्क्रीन अब भी जल रही थी। वीडियो चल रहा था… और उसमें कॉरिडोर की लड़की गायब हो चुकी थी। कैमरा अब खाली गलियारा दिखा रहा था।
लेकिन असली डर कमरे के अंदर था।
आयुष ने हिम्मत करके धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।
पीछे कोई नहीं था।
कमरा खाली था।
टेबल उलटी पड़ी थी, कुर्सी गिर चुकी थी, पर्दे हवा से हिल रहे थे… मगर कोई इंसान नहीं।
उसने राहत की साँस ली ही थी कि अचानक बाथरूम का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
आयुष उछल पड़ा।
बाथरूम की लाइट खुद-ब-खुद जलने लगी… बंद… फिर जलने लगी… फिर बंद।
दरवाज़े के नीचे से पानी बहकर बाहर आने लगा।
आयुष धीरे-धीरे पीछे हटता गया।
फोन फिर वाइब्रेट हुआ।
@AndherRaat:
“वो अंदर है।”
आयुष ने काँपते हुए लिखा—
“कौन?”
Seen.
“सच।”
इतना पढ़ते ही बाथरूम के अंदर से किसी लड़की के रोने की आवाज़ आने लगी। धीमी… टूटी हुई… जैसे कोई बहुत देर से बंद हो।
आयुष के दिमाग में यादों का दरवाज़ा खुल गया।
छह महीने पहले नंदिनी इसी फ्लैट में आई थी। उसने रोते हुए कहा था—
“तुम मुझे इस्तेमाल कर रहे हो, आयुष।”
आयुष ने गुस्से में उसे धक्का दिया था। नंदिनी बाथरूम के पास गिर गई थी। सिर दीवार से टकराया। खून निकला।
वह बेहोश पड़ी थी।
आयुष डर गया था। उसने सोचा था वह मर गई।
उस रात उसने क्या किया था… यही याद आते ही उसके हाथ काँपने लगे।
उसने खुद को समझाया था कि वह बस भाग गई होगी। पुलिस को झूठ बोला। दोस्तों से झूठ बोला। खुद से भी झूठ बोला।
पर सच कभी गया ही नहीं।
बाथरूम के अंदर से आवाज़ आई—
“आयुष…”
वह वही आवाज़ थी। नंदिनी की।
आयुष रो पड़ा। “नहीं… नहीं…”
उसने भागने के लिए मुख्य दरवाज़े की तरफ दौड़ लगाई। हैंडल पकड़ा। लॉक घुमाया। दरवाज़ा नहीं खुला।
फिर कोशिश की। नहीं खुला।
फोन फिर चमका—
“भागने की आदत पुरानी है।”
उसने गुस्से में फोन दीवार पर दे मारा। स्क्रीन टूट गई… मगर फोन बंद नहीं हुआ।
अब स्क्रीन पर कैमरा अपने आप ऑन था।
उसमें आयुष खुद दिख रहा था… दरवाज़े के पास खड़ा।
लेकिन उसके पीछे… बाथरूम का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल रहा था।
वास्तविक कमरे में भी वही आवाज़ आई—
क्रीईईक…
आयुष मुड़ा।
बाथरूम के अंदर अंधेरा था।
फिर उस अंधेरे से दो भीगी आँखें चमकीं।
नंदिनी धीरे-धीरे बाहर आई। बाल चेहरे पर चिपके थे, माथे पर खून की सूखी लकीर थी, कपड़े भीगे हुए थे। उसकी गर्दन टेढ़ी थी, जैसे गिरने के बाद कभी ठीक न हुई हो।
वह चलते हुए नहीं, घिसटते हुए आगे बढ़ रही थी।
आयुष चीखा— “मैंने जानबूझकर नहीं किया!”
नंदिनी रुक गई।
उसने पहली बार साफ आवाज़ में कहा—
“तुमने मुझे नहीं मारा…”
आयुष हक्का-बक्का रह गया।
नंदिनी ने उंगली दरवाज़े की तरफ उठाई।
“जिसे तुमने अंदर आने दिया था… उसने मारा।”
आयुष ने धीरे-धीरे दरवाज़े की तरफ देखा।
मुख्य दरवाज़ा खुला खड़ा था।
और बाहर कॉरिडोर में… उसका खुद का दूसरा रूप मुस्कुरा रहा था।

To be continued…
(दरवाज़े पर खड़ा था… खुद आयुष। अब कौन असली है? Part 4 जल्द आएगा।)
Reena @loht