imprisonment with difficulty in Hindi Moral Stories by कमल चोपड़ा books and stories PDF | कैद बा-मशक्कत

Featured Books
Categories
Share

कैद बा-मशक्कत

​कैद बा-मशक्कत
कमल चोपड़ा​

प्रहार से बचने के लिए पीछे हटी थी, मुक्का उसे न लगकर दीवार में जा लगा था। दर्द से बिलबिलाता और गुस्से में फनफनाता हुआ पति लगभग पागल-सा हो आया था। पत्नी का अपना बचाव करना भी गुनाह हो गया था।​अच्छी-भली जुबान थी उसके पास पर वह बोल नहीं सकती थी। सही सलामत हाथ-पाँव थे उसके पास पर वह चला नहीं सकती थी। आँखें थीं उसके पास पर वह सपने नहीं देख सकती थी। उसके पास भी एक दिल था पर वह कुछ चाह नहीं सकती थी। उसकी भी कुछ इच्छाएं थीं पर उन्हें उसे मारना होता क्योंकि वह एक पत्नी थी।​चप्पल उठाकर आपे से बाहर होकर गाली बकता हुआ वह उसे पीटने लगा था— "साली मादर.... हफ्ते में एक छुट्टी मिलती है, वह भी साली इस औरत की बेहूदगी की भेंट चढ़ जाती है। साली बहन की.... कहा था मैं उठूँ तो पराठे मकौड़े, हलवा और कॉफी तैयार मिलनी चाहिए पर ये साली बहन की.... अभी भी ये तैयारी ही कर रही है, अभी तो फर्शों की सफाई और बर्तनों की सफाई के लिए नौकरानी लगाकर दे रखी है.... हाय मेरा हाथ तुड़वा दिया। जान-बूझकर तू पीछे हटी ताकि मेरा हाथ टूट जाए। साली तेरी तो मैं माँ की.... अब बच, कहाँ तक बचेगी?"​अपनी सफाई में वह कहना चाहती थी कि आज छुट्टी का दिन है। उठने में उसे थोड़ा देर हो गई है। आपकी तो हफ्ते में एक छुट्टी है पर मेरी....? छुट्टीवाले दिन मेरा काम उल्टा बढ़ जाता है। आपकी फरमाइशें और बच्चों की ज़िदें और माँगें और नौकरानी चार दिन में छुट्टी पर है। मशीनी रोबोट भी थक जाते होंगे? फिर मैं तो....? पर वह चुप थी।​मार के दर्द को भूलकर वह काम में जुट गई थी। वह जल्दी-जल्दी हाथ चला रही थी। बच्चे उठ गए तो फिर उनकी माँगें और फरमाइशें शुरू हो ​जाएगी। कितना काम बाकी है। अभी कपड़े धोने हैं, जूते पालिश करने हैं, डस्टिंग करनी है। अलमारी साफ करनी है। कपड़े तो शाम को ही प्रेस हो जाएगी।​कुछ देर टी.वी. देखने और भरपेट नाश्ता करने के बाद पति फिर से लेटता हुआ बोला— “मैं सो रहा हूँ। छुट्टी का दिन है— देखना मुझे कोई डिस्टर्ब न करे और हाँ, आज लंच में चिकन बना लेना, बंटी उठे तो बाज़ार भेजकर उससे चिकन मंगवा लेना.... बच्चों को संभालना, मुझे कोई डिस्टर्ब न करे, सुन लिया न?”​फोन के बजते ही उसने लपककर रिसीवर उठाया। फोन उसके मायके से था। उसकी छोटी बहन का रिश्ता पक्का होने वाला था। वे उसे बुला रहे थे। पति ने लपककर रिसीवर उसके हाथ से झटक लिया— “हाँ जी नमस्कार जी, सब ठीक ठाक है। नहीं जी, हम लोग नहीं आ पाएंगे.... नहीं नहीं ये अकेली भी नहीं आ पाएगी। दरअसल हो सकता है आज मेरा कोई दोस्त आए। वो भी ज़रूरी है पर.... नहीं नहीं जी.... हाँ ठीक है.... ठीक है.... अच्छा।”​“मायके नहीं जाने दे रहे तो आज अस्पताल चली जाऊँ? मामा जी का हालचाल पूछने?”​“कोई ज़रूरत नहीं है, अपना काम करो।”​“कल मेरा व्रत है, कल माथा टेकने मन्दिर तो मैं ज़रूर जाऊँगी....”​“कहा न, कहीं नहीं जाना। घर बैठो अपना काम देखो....”​कलपती और घुटती हुई चुपचाप काम में जुट गई थी वह— “कैदखाने से कहीं जा भी नहीं सकती। बस काम करते रहो, पता नहीं किस जुर्म की सज़ा है यह। कैद बा-मशक्कत। नौकरी से बदतर, कोई ज़रखरीद भी नहीं, बाकायदा दहेज का सामान और अच्छी खासी रकम के साथ आई है।”​उसकी नस-नस में दर्द हो रहा था। दुख दर्द और लाचारगी आँसू बनकर उसकी आँखों से बह निकले थे। नौकरानी को आया देखकर चौंक उठी थी वह— “लछमी तू? आज छुट्टी के दिन? चार दिन नहीं आई क्या हुआ?”​“कोई गुज़र गया था। रिश्ते में था तो दूर का पर जाना पड़ा।”​“बाथरूम जाने के लिए उठे थे पति महोदय, लछमी की बात कानों में पड़ी तो भड़क उठे— सब बहानेबाज़ी है इन लोगों की। मादर.... इन्हें तो बस ​पैसा देते रहो। हराम का होता है साला पैसा। ये रोज़-रोज़ की ड्रामेबाज़ी नहीं चलेगी मादर.... काम करना है तो सीधी तरह करो वरना....”​“जी मालिक ये चिकचिक मुझे भी पसंद नहीं। मैं तेरी बीवी नहीं हूँ जो इस तरह गाली-गलौज से बात करेगा? मुफ्त में नहीं देते हो पैसा। घर की बहू नहीं, जो थप्पड़ लात खा के भी पड़ी रहूँगी, वह भी दो रोटी के लिए। मुझे नहीं करना काम, ये पड़ी तेरी नौकरी।”