Ghost hunters - 10 in Hindi Horror Stories by Rishav raj books and stories PDF | Ghost hunters - 10

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Ghost hunters - 10



गाँव में सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा था सुबह खेतों में लोग काम पर निकल जाते, दोपहर में गलियाँ खाली हो जातीं और शाम होते-होते चाय की दुकानों पर भीड़ लगने लगती। रोहित का परिवार भी अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में व्यस्त था।

उस दिन रोहित की ड्यूटी थोड़ी लंबी चली थी रेलवे स्टेशन पर inspection आने वाला था इसलिए पूरे स्टाफ पर दबाव था। शाम तक लगातार काम करते-करते उसका सिर भारी हो चुका था।

स्टेशन के बाहर निकलते समय उसका एक साथी उसके पास आया।

सुरेश- रोहित भाई, आज फिर उसी रास्ते से जाओगे क्या?

रोहित- और कौन सा रास्ता है?

सुरेश थोड़ा हिचकिचाया।

सुरेश- नहीं... बस ऐसे ही। रात में उस पुराने पेड़ के पास कम ही लोग जाते हैं।

रोहित ने उसकी तरफ देखा।

रोहित- तुम भी गाँव वालों जैसी बातें करने लगे?

सुरेश हल्का हँस दिया।

सुरेश- मैं नहीं मानता इन सबको... लेकिन बचकर रहने में क्या जाता है।

रोहित ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपना बैग उठाया और बाहर निकल गया।

रास्ते में अंधेरा धीरे-धीरे बढ़ रहा था। दूर खेतों के बीच वही पुराना पेड़ खड़ा था। हवा बिल्कुल धीमी थी लेकिन उसकी सूखी शाखाएँ अपने-आप हिल रही थीं।

रोहित कुछ सेकंड के लिए रुका। फिर सिर झटककर आगे बढ़ गया।

घर पहुँचते-पहुँचते रात हो चुकी थी।

आँगन में आर्यन मोबाइल पर game खेल रहा था जबकि निशा बरामदे में बैठकर पढ़ रही थी। रितिका रसोई में थी।

रितिका- आज फिर देर हो गई।

रोहित- काम ज्यादा था।

वह हाथ-मुँह धोकर खाने के लिए बैठ गया। बाकी सब सामान्य था लेकिन आज वह कुछ ज्यादा चुप लग रहा था।

निशा ने ध्यान से उसकी तरफ देखा।

निशा- पापा, तबीयत ठीक है?

रोहित- बस थकान है।

खाना खत्म होने के बाद सब अपने-अपने काम में लग गए। रात लगभग साढ़े दस बजे बिजली चली गई।

गाँव में यह आम बात थी।

आर्यन तुरंत चिढ़ गया ( battery low) 

आर्यन- यार, सबसे important match के टाइम पर ही light जाती है।

रितिका- थोड़ी देर बिना मोबाइल के भी रह लिया करो।

निशा मोमबत्ती लेने अंदर चली गई। उसी समय रोहित आँगन में खड़ा था गर्मी की वजह से वह बाहर हवा खा रहा था।

पूरा घर अंधेरे में डूबा हुआ था। सिर्फ दूर-दूर कुछ घरों से लालटेन की हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

तभी...

उसे लगा जैसे कोई सड़क के उस पार खड़ा है एक आदमी
अंधेरे में बिल्कुल स्थिर रोहित की नजर उस पर टिक गई
कुछ सेकंड बीत गए फिर अचानक बिजली वापस आ गई

पूरा आँगन रोशनी से भर गया।

लेकिन सड़क के उस पार... कोई नहीं था।

रोहित कुछ पल वहीं खड़ा रहा। फिर धीरे से अंदर चला गया।

उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

उस रात जब सब सो चुके थे, रोहित की आँख अचानक खुली।

कमरे में बिल्कुल सन्नाटा था।

उसने करवट बदली तभी उसे लगा जैसे बाहर आँगन में कोई चल रहा है।

धीरे... नंगे पैरों से।

ठक...

ठक...

ठक...

रोहित उठकर बैठ गया।

उसने ध्यान से सुना।

आवाज फिर आई।

इस बार थोड़ी और पास।

ठक...

ठक...

ठक...

रितिका की नींद अब भी नहीं खुली थी।

रोहित धीरे से बिस्तर से उतरा और दरवाजे की तरफ बढ़ा।

उसने कुंडी पकड़ी।

एक सेकंड के लिए उसका हाथ रुक गया।

फिर उसने दरवाजा खोल दिया।

बाहर...

कोई नहीं था।

सिर्फ खाली आँगन और ठंडी हवा लेकिन जमीन पर गीली मिट्टी से बने पैरों के निशान थे जो आँगन के बीच से शुरू होकर सीधे उसके कमरे के दरवाजे तक आए थे।



सुबह जब रोहित की आँख खुली तो सूरज काफी ऊपर आ चुका था रात की बात उसके दिमाग में अब भी घूम रही थी कुछ देर तक वह चुपचाप बिस्तर पर बैठा रहा फिर धीरे से बाहर निकल आया।

आँगन पूरी तरह साफ था ना कोई मिट्टी ना पैरों के निशान
जैसे रात में कुछ हुआ ही न हो रितिका रसोई में थी निशा पौधों में पानी डाल रही थी और आर्यन अब भी सो रहा था।

सब कुछ सामान्य था रोहित कुछ देर तक आँगन को देखता रहा रितिका ने उसकी तरफ देखा

रितिका- क्या हुआ?

रोहित- कुछ नहीं

वह बात वहीं खत्म करना चाहता था खुद उसे भी लग रहा था कि शायद उसने आधी नींद में कुछ गलत देख लिया होगा लेकिन पूरे दिन उसका ध्यान बार-बार उसी बात पर जा रहा था।

रेलवे स्टेशन पर भी वह पहले जैसा focused नहीं था दो बार उससे छोटी-छोटी गलती हो गई जो आमतौर पर कभी नहीं होती थी।

सुरेश ने notice कर लिया।

सुरेश- सब ठीक है?

रोहित- हाँ।

सुरेश- चेहरा कुछ और बोल रहा है।

रोहित ने जवाब नहीं दिया उसने फाइल बंद की और बाहर प्लेटफॉर्म की तरफ देखने लगा दूर पटरी के उस पार उसे कुछ सेकंड के लिए फिर वही एहसास हुआ।

जैसे कोई उसे देख रहा हो लेकिन इस बार जब उसने ध्यान से देखा वहाँ सिर्फ लोग थे, जैसे तैसे दिन बीता शाम को वह घर जल्दी लौट आया।

घर का माहौल हमेशा की तरह शांत था रितिका रसोई में खाना बना रही थी टीवी पर कोई पुराना serial चल रहा था। आर्यन homework करने का नाटक कर रहा था और निशा किताब लेकर बैठी थी।

तभी अचानक रितिका की आवाज आई।

रितिका- निशा, तुमने आटा बाहर रखा था क्या?

निशा- नहीं।

रितिका बाहर आई उसके हाथ में आटे का डिब्बा था पूरा डिब्बा खुला हुआ था और आटा फर्श पर बिखरा पड़ा था।

आर्यन- बिल्ली होगी

रितिका- बिल्ली ढक्कन खोलकर वापस side में नहीं रखती

कुछ सेकंड के लिए सब चुप रहे फिर रोहित ने खुद जाकर देखा ढक्कन सच में बड़े आराम से side में रखा हुआ था जैसे किसी ने जानबूझकर खोला हो रोहित ने बिना कुछ बोले सब साफ करना शुरू कर दिया।

रात में खाने के समय भी वह चुप था निशा बार-बार उसकी तरफ देख रही थी

निशा- पापा... कुछ हुआ है क्या?

रोहित- नहीं

निशा- आप कल रात भी ठीक से नहीं सोए थे 

रोहित कुछ बोलने ही वाला था लेकिन फिर रुक गया

रितिका- अगर कोई परेशानी है तो बताइए

रोहित ने धीरे से पानी पिया

रोहित- बस काम का तनाव है

उसने बात वहीं खत्म कर दी रात लगभग ग्यारह बजे सब सो गए इस बार बारिश शुरू हो चुकी थी बाहर हवा तेज चल रही थी खिड़कियाँ हल्की-हल्की हिल रही थीं।

करीब आधी रात को निशा की नींद खुली उसे लगा जैसे बाहर बरामदे में कोई खड़ा है पहले उसने ध्यान नहीं दिया लेकिन फिर उसे साफ सुनाई दिया कोई बहुत धीरे-धीरे साँस ले रहा था।

निशा बिस्तर पर उठकर बैठ गई कमरे के बाहर अंधेरा था
कुछ सेकंड बाद उसे लगा जैसे कोई दरवाजे के ठीक दूसरी तरफ खड़ा है बिल्कुल स्थिर


उसकी साँसें तेज हो गईं वह  धीरे से बिस्तर से उतरी और दरवाजे के पास गई।

फिर अचानक दरवाजे पर तीन बार हल्की दस्तक हुई।

ठक...

ठक...

ठक...

निशा जम गई कुछ सेकंड बाद बाहर से आवाज आई

रोहित- निशा... दरवाजा खोलो।

वह थोड़ा शांत हुई।

आवाज उसके पिता की ही थी।

निशा ने दरवाजा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया... लेकिन तभी उसकी नजर दरवाजे के नीचे गई।

बाहर खड़े आदमी के पैर दिखाई दे रहे थे गीली मिट्टी से सने हुए

और उनकी दिशा उल्टी थी😈....