Khouff - 1 in Hindi Horror Stories by Raj Bhande books and stories PDF | खौफ - 1

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खौफ - 1

नांदेड़ के धनेगाव में राज रहता था। राज एक पार्ट टाइम राइटर था। पहले वो अपने साथ होने वाली घटनाएं लिखा करता था, लेकिन पिछले 5 सालों से उसने लिखना बंद कर दिया था। राज का एक 8 साल का बेटा था — अभय। अभय की मां अब इस दुनिया में नहीं थी। कुछ साल पहले उसकी मौत हो गई थी। अब वो दोनों अकेले ही घर में रहते थे।

दिवाली आने वाली थी, इसलिए राज और उसका बेटा घर की सफाई कर रहे थे। राज अपने बेटे के साथ स्टोर रूम में एक पुरानी आलमारी साफ करने गया। कुछ देर सफाई करने के बाद अभय को एक धूल से भरी लाल रंग की मोटी किताब मिली, जिस पर सिर्फ “2016” लिखा था। वो किताब खुद राज ने लिखी थी।

अभय किताब उठाकर राज के पास आया और बोला —
“पापा, मुझे एक किताब मिली है और इस पर सिर्फ 2016 लिखा हुआ है।”

ये देखते ही राज घबरा गया। उसने तुरंत किताब अभय के हाथ से छीन ली और गुस्से में बोला —
“किससे पूछकर तूने इसे हाथ लगाया?”

राज अंदर से डर गया था, लेकिन उसने अपने चेहरे पर कुछ नहीं दिखाया। वो बिल्कुल नॉर्मल बनने की कोशिश कर रहा था। उसने अभय को डांटकर स्टोर रूम से बाहर भेज दिया और खुद किताब लेकर अपने कमरे में चला गया।

कुछ देर बाद अभय कमरे में आया और धीरे से बोला —
“पापा… क्या ये मम्मी के बारे में है… जो मुझे छोड़कर भगवान के पास चली गई?”

राज की आंखों में आंसू आ गए। उसने मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया और बोला —
“जाओ… बाहर जाकर दोस्तों के साथ खेलो।”

अभय वहां से चला गया।
राज अकेला बैठा सोचने लगा —
“उस दिन मैं क्यों गया था…”

कुछ देर बाद राज अपने पड़ोसी और दोस्त अजय के घर गया। बाहर खड़े होकर आवाज लगाई —
“अजय! ओ अजय! बाहर आ।”

अजय बाहर आया और बोला —
“क्या हुआ राज? कोई प्रॉब्लेम है क्या?”

राज सिर्फ इतना बोला —
“चल।”

अजय बिना कुछ पूछे उसके साथ चल पड़ा। दोनों एक सुनसान जगह पर जाकर रुक गए। तभी अचानक राज जोर-जोर से रोने लगा।

अजय घबरा गया —
“क्या हुआ भाई?”

राज कांपती आवाज में बोला —
“भाई… आज मुझे मेरी लिखी हुई एक किताब मिली…”

अजय ने पूछा —
“कौन सी किताब?”

राज बोला —
“नहीं… तुझे अभी तक वो बात पता नहीं। मेरा एक बहुत काला और डरावना सच है… जिसने मेरी पूरी जिंदगी बदल दी। ये बात सिर्फ तीन लोगों को पता है — मुझे और मेरे मां-बाप को।”

अजय हैरानी से बोला —
“कौन सी बात? और तेरी मां तो गांव में रहती है ना?”

राज ने गहरी सांस ली और बोला —
“भाई… तू मेरा दोस्त सिर्फ छह साल पहले बना है। ये बात 2016 की है। मैं तुझे ये सब सिर्फ दोस्त समझकर बता रहा हूं। लेकिन तू ये बात किसी को मत बताना… खासकर अभय को नहीं।”

अजय बोला —
“ठीक है भाई। मैं किसी को नहीं बताऊंगा।”

राज ने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया —

“उस समय मेरी शादी नहीं हुई थी। मैं अपने मां-बाप के साथ रहता था। 2015 से मैं उनसे जिद कर रहा था कि मुझे एक साल अकेले घूमना है… अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीनी है। बहुत मनाने के बाद आखिर 2016 में उन्होंने मुझे इजाजत दे दी…
काश वो मुझे जाने ही ना देते…”

“मैंने कुछ कपड़े बैग में रखे और अपनी बाइक लेकर निकल पड़ा। रात होने लगी थी। सड़क सुनसान थी और मुझे खुद नहीं पता था कि मैं कहां जा रहा हूं। तभी मुझे सड़क किनारे एक लड़की खड़ी दिखाई दी।”

“वो अकेली थी… और मुझसे लिफ्ट मांग रही थी।”

मैं उसके पास गया और पूछा —
“कहां जाना है मैडम?”

वो बोली —
“मुझे सुंदरबन जाना है। क्या तुम मुझे वहां छोड़ सकते हो?”

मैंने हैरानी से कहा —
“मैडम, यहां से सुंदरबन 1700–1800 किलोमीटर दूर है।”

वो बोली —
“क्या तुम वहां जा रहे हो?”

मैंने कहा —
“सच कहूं तो मुझे खुद नहीं पता मैं कहां जा रहा हूं। मैं बस कुछ महीनों के लिए अकेला घूमने निकला हूं।”

वो मुस्कुराई और बोली —
“मैं भी घूमने निकली हूं। मेरी दोस्त को परमिशन नहीं मिली, इसलिए मुझे अकेले आना पड़ा। मुझे बस इतना पता है कि मुझे कहां जाना है… लेकिन कैसे जाना है, ये नहीं पता। क्या तुम मेरे साथ चलोगे?”

मैंने कहा —
“मैं तुम्हें जानता भी नहीं हूं।”

वो बोली —
“मेरा नाम अश्विनी है। मैं नांदेड़ के चेतन नगर में रहती हूं।”

मैं चौंक गया और बोला —
“मैं भी नांदेड़ में ही रहता हूं… धनेगाव में। मतलब हम दोनों एक ही शहर के हैं।”

अश्विनी हल्का सा मुस्कुराई —
“तो… क्या मैं तुम्हारे साथ चल सकती हूं?”

मेरा मन मान नहीं रहा था, लेकिन रात में एक लड़की को अकेला छोड़ना भी ठीक नहीं लगा। इसलिए मैंने उसे अपने साथ बैठा लिया।

कुछ देर बाद मैंने कहा —
“मुझे भूख लगी है। यहां से 4 किलोमीटर दूर एक ढाबा है। वहां खाना खाते हैं।”

वो बोली —
“तुम खा लो… मुझे अभी भूख नहीं है।”

कुछ देर बाद हम ढाबे पर पहुंचे। मैं खाना खाने बैठ गया। तभी अचानक अश्विनी कहीं गायब हो गई। मुझे लगा शायद वॉशरूम गई होगी। मैं खाना खाता रहा।

करीब 10 मिनट बाद वो वापस आई। उसके मुंह पर कुछ लाल लगा हुआ था, जिसे वो जल्दी-जल्दी साफ कर रही थी।

मैंने पूछा —
“ये क्या लगा है तुम्हारे मुंह पर?”

वो तुरंत बोली —
“कुछ नहीं… जाने दो।”

मैंने पूछा —
“तुमने खाना खा लिया?”

वो बोली —
“हां… चलो अब यहां से।”

हम फिर बाइक पर निकल पड़े। रात और ठंडी होती जा रही थी। मैंने उससे कहा —
“अश्विनी, तुम स्वेटर पहन लो। ठंड बढ़ रही है।”

वो बोली —
“मैं स्वेटर नहीं लाई… तुम पहन लो।”

मैंने अपना स्वेटर खुद पहन लिया। सच कहूं तो उस वक्त मुझे उस पर दया नहीं आ रही थी।
वो बस मुझे अजीब नजरों से देख रही थी… जैसे सोच रही हो —
“कैसा लड़का है… एक लड़की को स्वेटर देने की बजाय खुद पहन लिया…”

कुछ देर बाद मैंने उससे पूछा —
“क्या तुम बता सकती हो कि तुम इतनी अजीब क्यों हो?”

वो गुस्से में मेरी तरफ देखने लगी।
अचानक वो जोर से डरावनी आवाज में चिल्लाई —
“आआआआह्ह्ह!”

मैं डर गया। बाइक का बैलेंस बिगड़ गया और हम दोनों सड़क पर गिर पड़े।

वो जमीन पर बैठकर जोर-जोर से हंसने लगी। उसकी हंसी बहुत अजीब और डरावनी थी।

वो हंसते हुए बोली —
“कैसा लगा मजाक?”

मैं गुस्से में बोला —
“ऐसा मजाक कौन करता है? मैं तुम्हें समझ नहीं पा रहा हूं… तुम आखिर हो क्या?”

वो कुछ बोलने लगी… लेकिन अचानक रुक गई। फिर हल्का सा मुस्कुराकर बोली —
“अरे… तुमने ही तो कहा था कि मैं पकाऊ हूं। इसलिए…”

मैंने गहरी सांस ली और कहा —
“चलो अब निकलते हैं। अभी नागपुर भी नहीं आया। यहां से नागपुर भी करीब 200–250 किलोमीटर दूर है। हमें सुंदरबन पहुंचने में 5–6 दिन लग सकते हैं… क्या तुम इतने दिन मेरे साथ रह पाओगी?”

वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई।
फिर धीमी आवाज में बोली —
“क्यों नहीं… और सुंदरबन पहुंचते ही मैं तुम्हें एक बहुत बड़ा सरप्राइज दूंगी…”