”
सीढ़ियों में फैला अंधेरा अब और भारी लगने लगा था।
ऊपर टूटी खिड़की से आती हल्की पीली रोशनी दोनों के चेहरों पर पड़ रही थी।
एक तरफ अर्नब।
दूसरी तरफ शाहिद “काला” अंसारी।
दोनों एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे इंसान नहीं… शिकारी हों।
नीचे खड़े काला के आदमी ऊपर आने की हिम्मत नहीं कर रहे थे।
क्योंकि सीढ़ियों में जो खामोशी थी…
वो गोलियों से ज्यादा डरावनी थी।
काला ने अपनी गर्दन घुमाई।
चक्…
हड्डियों की आवाज गूँजी।
उसने होंठों पर लगा खून अंगूठे से साफ किया।
“इतने दिनों बाद…”
वो मुस्कुराया।
“…कोई मिला है जो भाग नहीं रहा।”
अर्नब की साँसें बिल्कुल सामान्य थीं।
जैसे अभी लड़ाई शुरू ही न हुई हो।
उसने धीरे से पूछा—
“सुल्तान ने भेजा?”
“हूँ।”
काला एक कदम आगे बढ़ा।
“लेकिन मैं काम करने नहीं आया।”
“तो?”
“देखने आया हूँ…”
उसकी आँखों में पागलपन चमका।
“…तू सच में कितना खतरनाक है।”
अगले ही पल—
अर्नब झपटा।
इतनी तेजी से कि नीचे खड़े आदमी सिर्फ हलचल देख पाए।
चक्!
चाकू फिर काला के गले की तरफ गया।
लेकिन इस बार—
काला पीछे नहीं हटा।
उसने सीधा अर्नब के हाथ पर मुक्का मारा।
ठाक!!
चाकू सीढ़ियों में दूर जा गिरा।
उसी पल काला ने अर्नब का कॉलर पकड़कर उसे रेलिंग से दे मारा।
धड़ाम!!
लोहे की रेलिंग टेढ़ी हो गई।
नीचे खड़े आदमी घबरा गए।
“भाई—”
“कोई ऊपर नहीं आएगा!”
काला गरजा।
उसकी आँखों में अजीब चमक थी।
जैसे वो इस लड़ाई का मजा ले रहा हो।
अर्नब ने बिना वक्त गंवाए काला के जबड़े पर मुक्का मारा।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
लेकिन काला पीछे हटने के बजाय हँस पड़ा।
“बस इतना?”
उसने अर्नब का हाथ पकड़ा।
और पूरी ताकत से उसे दीवार में दे मारा।
धम्म!!
इस बार दीवार में दरार पड़ गई।
ऊपर कमरे में बैठी बूढ़ी औरत डर से काँप उठी।
नीचे सड़क पर खड़े लोग भी आवाजें सुनकर रुकने लगे थे।
पूरी बिल्डिंग जैसे काँप रही थी।
अर्नब के होंठ से हल्का खून निकला।
काला मुस्कुराया।
“अब इंसान लग रहा है।”
अर्नब ने खून हाथ से साफ किया।
और पहली बार…
हल्का सा मुस्कुराया।
वो मुस्कान देखकर काला कुछ सेकंड चुप हो गया।
क्योंकि उस मुस्कान में डर नहीं था।
मजा था।
अचानक अर्नब आगे बढ़ा।
इस बार उसने सीधे काला के घुटने पर किक मारी।
ठाक!!
काला हल्का सा झुका।
उसी पल—
अर्नब ने उसकी गर्दन पकड़कर उसे रेलिंग पर दे मारा।
लोहे की छड़ टूट गई।
लेकिन अगले ही सेकंड—
काला ने अर्नब की पसलियों में कोहनी मारी।
चर्र…
अर्नब की साँस एक पल को अटक गई।
काला ने मौका देखकर उसका गला पकड़ लिया।
और उसे सीढ़ियों से नीचे धकेल दिया।
धड़ाम!!
अर्नब नीचे जाकर दीवार से टकराया।
उसके गिरते ही नीचे खड़े आदमी तुरंत बंदूकें निकालकर उसकी तरफ बढ़े।
लेकिन—
“पीछे हटो।”
काला धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रहा था।
उसके चेहरे पर अब मुस्कान नहीं थी।
सिर्फ उत्साह।
“ये मेरा है।”
अर्नब धीरे-धीरे उठ खड़ा हुआ।
उसकी साँस अब थोड़ी भारी थी।
पसलियों में दर्द साफ महसूस हो रहा था।
काला नीचे आकर उसके सामने रुका।
“अब समझ आया?”
वो धीरे से बोला।
“शिवपुर में सिर्फ तू ही जानवर नहीं है।”
कुछ सेकंड दोनों चुप रहे।
फिर अर्नब ने पूछा—
“तुझे दर्द नहीं होता?”
काला हँसा।
“बहुत होता है।”
वो और करीब आया।
“लेकिन अच्छा लगता है।”
नीचे खड़े आदमी बेचैन हो रहे थे।
उनके लिए ये लड़ाई अजीब थी।
क्योंकि पहली बार उन्होंने काला को किसी के साथ खेलते देखा था।
वरना वो लड़ाई खत्म करता था…
खींचता नहीं।
तभी बाहर पुलिस सायरन की आवाज गूँजी।
वूंऊऊऊऊ…
सबका ध्यान बाहर गया।
एक आदमी भागता हुआ अंदर आया।
“भाई! पुलिस!”
काला ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।
“चिल्ला क्यों रहा है?”
“ACP कबीर आ गया!”
ये नाम सुनते ही माहौल बदल गया।
काला की मुस्कान हल्की गायब हुई।
क्योंकि शिवपुर में कुछ लोग ऐसे थे जिनसे अपराधी भी बचते थे।
और उनमें से एक था—
ACP कबीर राठौड़।
बाहर सड़क पर पुलिस की गाड़ियाँ रुक चुकी थीं।
लाल-नीली लाइट्स पूरी बिल्डिंग पर चमक रही थीं।
लाउडस्पीकर पर आवाज गूँजी—
“बिल्डिंग को चारों तरफ से घेर लिया गया है!”
“हथियार नीचे डालो!”
नीचे खड़े आदमी घबरा गए।
लेकिन काला शांत रहा।
उसने अर्नब की तरफ देखा।
“लगता है आज नहीं।”
अर्नब चुप रहा।
काला मुस्कुराया।
“लेकिन अगली बार…”
उसने अपनी उंगली अर्नब की टूटी पसलियों पर दबाई।
अर्नब दर्द से हल्का पीछे हटा।
“…मैं तुझे धीरे मारूँगा।”
अचानक बाहर से गोली चली।
धाँय!!
खिड़की का शीशा टूट गया।
“भाई निकलना होगा!”
काला के आदमी चिल्लाए।
काला पीछे हटने लगा।
लेकिन जाते-जाते वो रुका।
उसने पहली बार अर्नब को ध्यान से देखा।
“तू जानता है मुझे सबसे ज्यादा क्या पसंद आया?”
अर्नब चुप।
“तेरी आँखें।”
उसकी मुस्कान वापस आ गई।
“उनमें डर नहीं है…”
उसने धीरे से कहा।
“…सिर्फ नफरत है।”
फिर वो अपने आदमियों के साथ पीछे के रास्ते से निकल गया।
कुछ सेकंड बाद।
बिल्डिंग के अंदर भारी कदमों की आवाज गूँजी।
पुलिस अंदर घुस चुकी थी।
“क्लियर!”
“ऊपर देखो!”
ACP कबीर धीरे-धीरे अंदर आया।
उसकी नजर टूटी दीवारों… मुड़ी रेलिंग… और खून के निशानों पर घूमी।
फिर उसकी आँखें जाकर रुकीं—
अर्नब पर।
दोनों पहली बार आमने-सामने थे।
कमरे में अचानक अजीब सन्नाटा फैल गया।
एक तरफ कानून।
दूसरी तरफ वो आदमी…
जो धीरे-धीरे पूरे शिवपुर का डर बनता जा रहा था।
कबीर ने पिस्टल उठाई।
“खत्म हो गया खेल।”
अर्नब हल्का सा मुस्कुराया।
“अभी शुरू हुआ है।”
दोनों की आँखें एक-दूसरे पर जमी थीं।
और पहली बार—
ऐसा लगा जैसे शिवपुर में अब सिर्फ गैंगवार नहीं…
तीन खतरनाक दिमागों का युद्ध शुरू होने वाला है।