कमरे में फैली बारूद की गंध अब भी हवा में तैर रही थी।
टूटी हुई रेलिंग से नीचे सड़क की लाल-नीली पुलिस लाइट्स दिखाई दे रही थीं।
दीवारों पर ताजा खून था।
और उन सबके बीच—
ACP कबीर राठौड़ अपनी पिस्टल ताने खड़ा था।
सीधे अर्नब की तरफ।
पीछे खड़े पुलिसवाले घबराए हुए थे।
क्योंकि कमरे का हाल देखकर साफ था—
यहाँ कुछ मिनट पहले इंसानों की नहीं… जानवरों की लड़ाई हुई थी।
कबीर की आँखें अर्नब पर जमी थीं।
उसने धीरे से कहा—
“हथियार नीचे।”
अर्नब दीवार से टिककर खड़ा था।
उसकी साँस थोड़ी भारी थी।
काला की कोहनी अभी भी पसलियों में दर्द दे रही थी।
लेकिन उसके चेहरे पर दर्द नहीं दिख रहा था।
बस वही शांत मुस्कान।
“अगर नहीं रखा तो?”
पीछे एक कॉन्स्टेबल गरजा—
“गोली मार देंगे!”
अर्नब ने उसकी तरफ देखा।
बस एक नजर।
और कॉन्स्टेबल चुप हो गया।
क्योंकि उस नजर में कुछ ऐसा था…
जो सामान्य नहीं था।
कबीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
“तुझे पता है तेरी सबसे बड़ी समस्या क्या है?”
अर्नब चुप।
“तू खुद को सबसे होशियार समझता है।”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर अर्नब हल्का सा हँसा।
“और तेरी?”
कबीर रुक गया।
“तू अब भी सोचता है ये शहर बच सकता है।”
दोनों की आँखें टकराईं।
कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे कमरे में बाकी सब गायब हो गया हो।
सिर्फ दो लोग बचे हों।
दोनों अलग रास्तों पर…
लेकिन दोनों शिवपुर को बदलना चाहते थे।
बस तरीका अलग था।
नीचे सड़क पर भीड़ जमा होने लगी थी।
लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बना रहे थे।
“कौन है ऊपर?”
“वही अर्नब है क्या?”
“पुलिस ने पकड़ लिया क्या?”
शिवपुर में डर हमेशा खबर से तेज फैलता था।
और आज रात शहर साँस रोककर इंतजार कर रहा था।
ऊपर कमरे में।
कबीर ने फिर कहा—
“खेल खत्म।”
अर्नब ने धीरे से सिर टेढ़ा किया।
“तुझे सच में लगता है तू मुझे रोक सकता है?”
“हाँ।”
“कैसे?”
कबीर की आवाज ठंडी हो गई।
“क्योंकि तू गलती करेगा।”
अर्नब मुस्कुराया।
“सब यही बोलते हैं।”
तभी नीचे से एक पुलिस वाला भागता हुआ आया।
“सर!”
कबीर ने नजर नहीं हटाई।
“क्या है?”
“पीछे वाली गली में firing हुई है!”
कमरे में मौजूद पुलिसवाले चौंक गए।
कबीर की आँखें सिकुड़ीं।
“कौन?”
“शायद… सुल्तान के लोग!”
बस एक सेकंड।
सिर्फ एक सेकंड के लिए कबीर का ध्यान दरवाजे की तरफ गया।
और उतना काफी था।
अर्नब बिजली की तरह आगे बढ़ा।
उसने सामने खड़े कॉन्स्टेबल का हाथ मोड़ा—
ठाक!!
पिस्टल नीचे गिरी।
उसी पल अर्नब ने उसे पकड़ लिया।
धाँय!!
ऊपर लगी ट्यूब लाइट टूट गई।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
“सर!”
“लाइट!”
अंधेरे में अफरा-तफरी मच गई।
धाँय! धाँय!
पुलिसवालों ने गोलियाँ चलाईं।
लेकिन अर्नब अब वहाँ नहीं था।
कबीर तुरंत साइड में हुआ।
उसकी instincts चीख रही थीं—
“ये आदमी सीधा हमला नहीं करेगा।”
अचानक पीछे से आवाज आई।
धड़ाम!!
एक पुलिसवाला सीढ़ियों से नीचे गिरा।
“पीछे!!”
कबीर मुड़ा।
लेकिन तब तक अर्नब खिड़की तक पहुँच चुका था।
तीसरी मंजिल।
नीचे सड़क।
पीछे पुलिस।
सामने अंधेरा।
किसी सामान्य आदमी के लिए ये भागना नहीं… आत्महत्या थी।
लेकिन अर्नब ने एक पल भी नहीं सोचा।
वो कूद गया।
धड़ाम!!
नीचे खड़ी सब्जियों की रेहड़ी टूट गई।
भीड़ चीख उठी।
“भागो!”
अर्नब जमीन पर गिरते ही उठा।
और दौड़ पड़ा।
“रोक उसे!!”
पुलिस पीछे भागी।
लेकिन सड़क पर भगदड़ मच चुकी थी।
लोग इधर-उधर भाग रहे थे।
चीखें।
सायरन।
गोलियों की आवाज।
पूरा इलाका chaos में बदल चुका था।
कबीर नीचे पहुँचा।
उसने दूर भागते अर्नब को देखा।
फिर उसकी नजर सड़क किनारे खड़ी काली बाइक पर गई।
“वो बाइक तक जाएगा…”
कबीर दौड़ा।
अर्नब बाइक तक पहुँचा ही था कि—
धाँय!!
गोली उसके हेलमेट के पास से निकली।
अर्नब तुरंत झुका।
उसने पलटकर देखा।
करीब चालीस मीटर दूर—
ACP कबीर।
पिस्टल ताने।
दोनों की नजरें मिलीं।
बारिश फिर शुरू हो चुकी थी।
बूंदें सड़क पर गिर रही थीं।
कबीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
“भागता क्यों है?”
अर्नब ने बाइक स्टार्ट की।
“क्योंकि अभी मरने का मन नहीं।”
कबीर ने फिर गोली चलाई।
धाँय!!
इस बार गोली बाइक के शीशे में लगी।
लेकिन अगले ही पल—
बाइक चीखती हुई सड़क पर दौड़ गई।
कबीर वहीं खड़ा उसे जाता देखता रहा।
एक कॉन्स्टेबल उसके पास आया।
“सर पीछा करें?”
कबीर की आँखें दूर अंधेरे में थीं।
“नहीं।”
“सर?”
कबीर ने धीरे से कहा—
“आज वो भागा नहीं…”
उसकी आवाज गहरी हो गई।
“…उसने मुझे देखा।”
कॉन्स्टेबल समझ नहीं पाया।
लेकिन कबीर समझ गया था।
आज पहली बार—
अर्नब ने पुलिस को खतरा नहीं समझा।
उसने कबीर को बराबरी का खिलाड़ी माना था।
और यही चीज खतरनाक थी।
उसी रात।
शहर के दूसरे कोने में।
सुल्तान मिर्ज़ा हवेली की बालकनी में खड़ा बारिश देख रहा था।
पीछे काला बैठा शराब पी रहा था।
उसके होंठ पर अब भी चोट थी।
सुल्तान ने पूछा—
“कैसा है लड़का?”
काला हँसा।
“जिंदा।”
“खतरनाक?”
“बहुत।”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर काला की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हुई।
“लेकिन…”
सुल्तान उसकी तरफ मुड़ा।
“उसके अंदर कुछ टूटा हुआ है।”
“मतलब?”
काला ने गिलास नीचे रखा।
“जो आदमी मरने से नहीं डरता…”
उसकी आँखें अंधेरी हो गईं।
“…वो या तो भगवान होता है।”
वो हल्का सा हँसा।
“या ऐसा इंसान… जिसे जीने की वजह नहीं बची।”
बारिश लगातार गिरती रही।
और उसी बारिश में—
शिवपुर की तीन सबसे खतरनाक ताकतें पहली बार एक-दूसरे को पहचान चुकी थीं।
अर्नब।
काला।
और ACP कबीर।
अब खेल सिर्फ इलाके का नहीं था।
अब ये युद्ध बनने वाला था।