भाग 9
हवेली का असली श्राप
“मैं तुम्हारे साथ घर आ गया…”
उस बच्चे की मुस्कान देखते ही आरव की साँस रुक गई।
पूरा कमरा काले पानी से भरा हुआ था। दीवारों पर बने हाथों के निशान धीरे-धीरे नीचे की तरफ खिसक रहे थे… जैसे किसी ने अभी-अभी उन्हें छुआ हो।
आरव की माँ काँपते हुए रो रही थीं।
“ये… ये कौन है…?”
लेकिन आरव के मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
उसकी नजर सिर्फ उस बच्चे पर जमी थी।
वो कोने में बैठा था।
घुटनों को मोड़कर।
सिर टेढ़ा किए।
और उसकी सफेद आँखें बिना पलक झपकाए सीधे आरव को देख रही थीं।
फिर उसने बहुत धीरे से कहा—
“तुमने दरवाज़ा खोल दिया…”
“न… नहीं…” आरव पीछे हट गया।
बच्चा हँस पड़ा।
ही… ही… ही…
लेकिन उसकी हँसी के साथ कमरे की दीवारों से भी आवाज़ें आने लगीं।
धीमी फुसफुसाहटें।
“अब देर हो चुकी है…”
“वो बाहर आ चुका है…”
अचानक कमरे की सारी लाइट बंद हो गईं।
धप्प!
पूरा घर अँधेरे में डूब गया।
आरव ने तुरंत मोबाइल की flashlight ऑन की।
और रोशनी जलते ही…
बच्चा गायब था।
सिर्फ काले गीले पैरों के निशान बचे थे।
जो धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे।
ऊपर…
आरव का गला सूख गया।
उसी समय ऊपर किसी दरवाज़े के धीरे-धीरे खुलने की आवाज़ आई।
चरररर…
उसकी माँ रोते हुए बोलीं, “ऊपर मत जाओ…”
लेकिन तभी…
ऊपर से किसी बच्चे के दौड़ने की आवाज़ आई।
ठक! ठक! ठक!
और फिर…
एक औरत की धीमी हँसी।
आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।
वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
हर कदम के साथ घर की हवा ठंडी होती जा रही थी।
इतनी ठंडी… कि दीवारों पर धुंध जमने लगी।
ऊपर पहुँचते ही उसने देखा—
उसके कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था।
अंदर अँधेरा।
लेकिन उसी अँधेरे में कोई खड़ा था।
लंबा।
पतला।
सफेद आँखें।
आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
उसके हाथ काँप रहे थे।
“क… कौन है?”
कोई जवाब नहीं।
तभी बिजली चमकी।
और उस एक सेकंड की रोशनी में…
आरव ने देखा—
वो खुद था।
उसकी ही शक्ल।
लेकिन चेहरा पूरी तरह काला।
और होंठों पर डरावनी मुस्कान।
आरव डर के मारे पीछे हट गया।
उसी समय वो चीज़ अचानक गायब हो गई।
और कमरे के अंदर से फुसफुसाहट आई—
“अब तुम भी इसी हवेली का हिस्सा हो…”
धड़ाम!!!
दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
पूरा घर काँप उठा।
फिर अचानक…
आरव के दिमाग में तेज़ दर्द शुरू हो गया।
उसकी आँखों के सामने images flash होने लगीं।
तेज़… टूटी हुई… खून से भरी images।
हवेली…
तहखाना…
ठाकुर वीरेंद्र सिंह…
और फिर…
एक और चेहरा।
जिसे देखकर आरव का दिल रुक गया।
वो चेहरा उसके अपने पिता का था।
“नहीं…”
आरव हाँफते हुए जमीन पर गिर पड़ा।
उसके दिमाग में लगातार आवाज़ें गूँज रही थीं।
“सच जानो…”
“सच जानो…”
फिर धीरे-धीरे सब साफ होने लगा।
उसे दिखाई दिया—
कई साल पहले की हवेली।
लेकिन इस बार वहाँ सिर्फ ठाकुर नहीं था।
उसके साथ एक छोटा लड़का भी था।
करीब दस साल का।
डरा हुआ।
रोता हुआ।
और वो लड़का…
आरव के पिता थे।
आरव की साँसें रुक गईं।
“पापा…?”
उसने देखा—
ठाकुर वीरेंद्र सिंह उस बच्चे को तहखाने में ले जा रहा था।
वहाँ वही 13वाँ दरवाज़ा था।
और उसके सामने जमीन पर बैठी थीं— रानी सुनयना।
लेकिन इस बार…
वो ज़िंदा थीं।
कमज़ोर। घायल। और डरी हुई।
वो रोते हुए कह रही थीं—
“उसे मत खोलो… वो सबको मार देगा…”
लेकिन ठाकुर पागलों की तरह हँस रहा था।
“अब बहुत देर हो चुकी है।”
फिर उसने छोटे लड़के की तरफ देखा।
“अगर कुछ गलत हुआ… तो तुम इस राज़ को अपने साथ दफना दोगे।”
लड़का डर के मारे रोने लगा।
तभी…
13वें दरवाज़े के पीछे से आवाज़ आई—
“मुझे भूख लगी है…”
पूरा तहखाना काँप उठा।
ठाकुर ने दरवाज़े का आखिरी ताला खोला।
और उसी पल…
अंदर का अँधेरा बाहर फूट पड़ा।
चीखें। खून। आग।
सब कुछ एक साथ।
आरव ने देखा—
काला अँधेरा सीधे ठाकुर के शरीर में घुस गया।
उसकी आँखें सफेद हो गईं।
हड्डियाँ टूटने लगीं।
टक! टक! टक!
फिर उसने अपना सिर घुमाया…
और मुस्कुराया।
लेकिन वो ठाकुर नहीं था अब।
कुछ और था।
कुछ बहुत पुराना।
उसने सुनयना की तरफ देखा।
और बहुत धीरे से कहा—
“अब ये हवेली मेरी है…”
अगले ही पल पूरा तहखाना खून से भर गया।
लोग चीखते रहे।
मरते रहे।
लेकिन छोटा लड़का… यानी आरव के पिता…
किसी तरह वहाँ से भाग निकले।
भागते वक्त उन्होंने पीछे मुड़कर आखिरी बार देखा—
सुनयना दीवार में चुनवाई जा रही थीं।
ज़िंदा।
वो लगातार चीख रही थीं—
“दरवाज़ा बंद करो!!!”
लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी।
और फिर…
पूरी हवेली आग में जल उठी।
आरव अचानक होश में वापस आया।
उसकी साँसें टूट रही थीं।
अब उसे सब समझ आ चुका था।
उसके पिता वहाँ थे।
उन्होंने सब देखा था।
और उन्होंने ये सच पूरी जिंदगी छिपाकर रखा।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“अब समझे…?”
आरव धीरे-धीरे पलटा।
और उसका खून जम गया।
वही बच्चा दरवाज़े पर खड़ा था।
लेकिन अब वो पहले से बड़ा दिख रहा था।
उसका शरीर लंबा हो चुका था।
हाथ जमीन तक पहुँच रहे थे।
और उसके पीछे…
पूरा कमरा अँधेरे से भर रहा था।
“तुम्हारे पिता भाग गए थे…” वो मुस्कुराया।
“लेकिन तुम नहीं भाग पाओगे।”
आरव काँपती आवाज़ में बोला, “तू… क्या है?”
कुछ सेकंड तक वो सिर्फ मुस्कुराता रहा।
फिर उसने धीरे-धीरे अपना मुँह खोला।
और उसके अंदर…
सिर्फ अँधेरा था।
गहरा। अंतहीन।
उस अँधेरे के अंदर सैकड़ों चेहरे चीख रहे थे।
फिर उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँजी—
“मैं वो हूँ… जिसे तुम्हारी दुनिया ने बंद कर दिया था…”
अचानक पूरा घर काँपने लगा।
दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।
काला पानी तेजी से फैलने लगा।
और उसी अँधेरे में…
रानी सुनयना फिर दिखाई दीं।
लेकिन इस बार…
उनका चेहरा पूरी तरह टूट चुका था।
वो दर्द में चीख रही थीं।
“वो पूरी तरह जागने वाला है!”
आरव ने घबराकर पूछा, “उसे रोका कैसे जाए?!”
सुनयना काँपती आवाज़ में बोलीं—
“जिस रात दरवाज़ा खुला था… उस रात एक चीज़ अधूरी रह गई थी…”
“क्या?”
कुछ सेकंड तक वो चुप रहीं।
फिर धीरे-धीरे बोलीं—
“उसका असली शरीर अभी भी हवेली की दीवारों के अंदर बंद है…”
अगला भाग जल्द ही...