Raahe - 3 in Hindi Women Focused by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 3

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राहें - 3

बनते बिगड़ते सम्बन्ध

रात आठ बजे थके हारे साहू साहब आफिस से घर आये तो
पत्नी किरण ने पूछा - बहुत थके लग रहे हो? क्या लोगे चाय या
खाना लगाऊ।
साहू साहब ने कहा - बहुत थकान लग रही है चाय पिला
दो, खाना थोड़ी देर से खा लूंगा। आज कल आफिस में काम
अधिक है, इसलिये देरी हो जाती है। विधानसभा में सत्र चल रहा है,
कई सवालों के जवाब बनाने पड़ते हैं, जो बनाने जरूरी होते हैं।
इसलिये थक जाता हूँ।
पत्नी किरण चाय बनाकर ले आयी, साहू साहब ने पूछा - घर
सूना सूना लग रहा है, रूचि नहीं है क्या?
हॉ, यहाँ उसका मन नहीं लगता, फिर मायके चली गई -
किरन ने बताया।
साहू साहब बोले - क्या करें साल भर शादी किये हो गया, जब
देखो तब मायके चल देती है। यहाँ तो ढंग से महीने दो महीने भी
नहीं रही है। ना तो उसको मेरी इज्जत की चिंता है, और ना ही
अपने पिता की इज्जत का ख्याल है। सौरभ भी क्या सोचता होगा?
कैसी पत्नी मिली है?
किरन बोली-- लड़की ठीक ठाक दिखी तो हम लोग भी शादी
कर लिये, हमें क्या पता था इतनी बद जबान लड़की है।
साहू साहब बोले -- सब जगह कहती है , सास खाना नहीं देती
दिन भर घर का काम करवाती है - घर में सदस्य ही कितने है, रूचि
सहित 4 लोग है हम, उसमें भी कहती रहती है कि दिन भर काम
करते करते थक जाती हूँ , और फिर काम वाली बाई भी तो है फिर
इतना क्या काम रहता है?

किरन बोली - कुछ ज्यादा काम नहीं रहता। मैं भी तो काम
करती रहती हूँ, मुझसे भी बैठ के नहीं रहा जाता। अकेली बहू है सब
इन्हीं लोंगों का है तो, भी नहीं समझते - यदि आप कहो तो मैं रूचि
के मायके जाकर उनसे बात करके आऊँ?
साहू साहब बोले --तुम अकेले मत जाओ। रविवार तक
आफिस का काम कम हो जायेगा तो रविवार को रूचि के माता पिता
से बैठकर बात करेंगें, मैं भी चलूँगा। मुझे भी यह सब अच्छा नहीं
लगता मेरी इज्जत का विषय है लोग तरह तरह की बातें करते हैं।
दूसरों की बहुओं को देखता हूँ घर बाहर सब सम्हाल लेती हैं, एक
रूचि को देखता हूँ तो मन दुखी हो जाता है।
किरन बोली - मैने भी कुछ बातें सुनी है, रूचि का किसी और
लड़के के साथ चक्कर चल रहा है, वह उससे शादी करना चाहती थी. 
और माता पिता के दबाव में यहाँ शादी करनी पड़ी है उसका मन
उसी लड़के से लगा हुआ है इसलिये भाग-भागकर मायके जाती
रहती है।
साहू साहब बोले - ये सब तो उसके पैरेन्टस को सोचना था।
हमें क्या मालूम किसका क्या चक्कर है? अब शादी शुदा है, उसे
सोचना चाहिये। चलो रविवार को जाकर उन सबसे बात करता हूँ.
मामला तय होना चाहिये।
रविवार को किरन और साहू साहब भिलाई रूचि के पापा दिनेश
के घर पहुँचे। रूचि घर पर नहीं थी। रघु के साथ कहीं पिकनिक
मना रही थी। माँ रंजना की खबर पर वह रघु से बोली - सौरभ के
मम्मी पापा घर आये हैं। वे लोग मुझे लेने ही आये होंगें, तुम मुझे
ठीक से बताओ, मुझसे शादी करोगे या नही?
रघु बोला--- मैं तुम्हारे बिना रह नहीं सकता, मैं तो अभी भी 
तुमसे शादी करने को तैयार हूँ । मै तो पहले भी तुमसे शादी करना
चाह रहा था, तुम्हीं शादी करके बाहर चली गई। मैं तो तुम्हारे
इंतजार मैं अभी तक कुंआरा बैठा हूँ।
तो आज फाइनल बात कर लेती हूँ - मेरा मन वहाँ नहीं
लगता है, मैं भी तुमसे शादी करना चाहती हूँ। उस समय भी मैं पापा
से साफ साफ नही बोल पायी इसलिये शादी करनी पड़ी।
रघु बोला - तुम्हीं डगमग होती हो, मैं तो आज भी अपनी जगह
पर खड़ा हूँ। मैने तो घर में भी कह दिया है कि मैं रूचि के अलावा
किसी और से शादी नहीं करूंगा, चाहे जीवन भर कुआरा रहना
पड़ेगा तो रह जाऊंगा।
रघु की इस बात पर रूचि मन ही मन खुश हो गई और उसे विश्वास हो
गया कि रघु उससे सच्चा प्रेम करता है और इसलिये उसने अभी तक
शादी नही की है और रूचि को अपने शादी करने पर पश्चाताप हो
आया।
रूचि ने कहा - मैं आज सब बात क्लीयर कर देती हूँ और उन
लोगों को घर से भगा ही देती हूँ।
रूचि मन में साहू साहब को अपमानित करने का विचार रास्ते
भर बनाती रही। रघु से शादी करने की गुदगुदी उसके मन में थी
इसलिये बड़े उत्साह से रूचि शाम को घर आई। किरन और साहू
साहब के सामने सोफा पर मुस्कुराती हुयी बिना किसी अभिवादन के
बैठ गई।
किरन ने ही पूछा - कैसी हो रूचि?
बिल्कुल ठीक रूचि बोली।
कहाँ गई थी- कहाँ से आ रही हो -- किरन ने पूछा।
रघु के साथ पार्क में घूमने गई थी - रूचि ने बेझिझक किरन
के सवालों का जवाब दिया। उसे बिल्कुल ही नहीं लगा कि वह सासू
मॉँ से बात कर रही है।
हम तुमको लेने आये हैं- चलो घर चलो, किरन और साहू
साहब ने कहा।
रूचि के पिता दिनेश भी वहीं बैठे थे , उन्होनें भी कहा बेटे - यह

लोग तुम्हें लेने आये हैं - अब तुम्हारा घर वहीं है इनके साथ चली
जाओ।
रूचि बोली-- पापा मैं अब उस घर में नहीं जाऊंगी, मेरा मन
वहाँ नहीं लगता।
किरन ने कहा - जो तुम्हारे मन में है, उसे छोड़ो - अब दो
घरों की इज्जत का सवाल है, जो हो गया वह बचपन का खेल समझ
कर भूल जाओ, तुम अब शादी शुदा हो- तुम्हारे पिता और ससुर
दोनों की इज्जत तुम्हारे हाथ में है। हमारा तो एक ही बेटा है उसका
काम अच्छा चलता है तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होने देंगें । रूचि की
माँ रंजना ने भी समझाया -सौरभ सी.ए. है उसका काम भी अच्छा
चलता है, साहू साहब भी बड़े अधिकारी हैं, सब प्रतिष्ठित लोग हैं.
हमारी भी इज्जत का सवाल है- तू चली जा। सभी ने रूचि को बहुत
समझाया।
रूचि पर इन बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह बोली --मैं
अब नहीं जाऊँगी, आप लोग मुझ पर दबाव ना बनाओं, मैं रहूँगी तो
रघु के साथ, नहीं तो मैं मर जाऊँगी।
ऐसी बात सुनकर सब सन्न रह गये, साहू साहब को लगा कि
किसी ने उन्हें जमीन पर ला पटका है, वे कुछ भी नहीं बोल पाये -
इतना ही बोले -"रूचि सब सोच समझ कर बोलों' ।
रूचि ने फिर बोला - मैं सब सोचकर बोल रहीं हूँ, मुझे आप
से कोई शिकायत नहीं है। परन्तु मैं सौरभ के साथ नहीं रह सकती।
रूचि का जवाब सुनकर साहू साहब और किरन अपने घर वापस
आ गये। इ्धर रूचि बहुत खुश थी कि एक झंझट तो गई। उसने रघू
को फोन लगाकर सब बातें बतार्यीं कि किस तरह उसने किरन व
साहू साहब को अपमानित करके घर से भगा दिया।
रघु भी बहुत खुश होकर बोला- पगली, तलाक तो लेना पड़ेगा
तब तो हम लोग शादी कर पायेंगें, बिना तलाक लिये यदि हम लोग
शादी करेंगें तो फंस जायेंगे।
रूचि ने पूछा --उसके लिये क्या करना होगा?
रघु ने कहा - किसी वकील से सलाह कर ले।
रूचि ने कहा - मैं अभी सलाह करके तलाक ले लेती हूँ।
रूचि ने जल्दी ही वकील से सलाह करके तलाक के लिये
आवेदन लगा दिये ।
सौरभ ने रूचि के साथ घर बसाने के कुछ सपने देखे थे। शादी
हुये साल भर से अधिक हो गया परन्तु एक दिन भी रूचि का व्यवहार
उसके प्रति सकारात्मक नहीं रहा। कभी कभी वह सोचता--- किसी गैर
के साथ भी हम सम्बन्ध बनायें रखना चाहते हैं, मैंने व मम्मी- पापा ने
रूचि के लिये क्या नहीं किया,--- कीमती वस्त्र, आभूषण सब श्रृंगार के साधन---
उसके लिये जुटाये-- परन्तु रूचि कभी खुश नही हुयी, ना ही उसे लगा
कि हम लोग उसके लिये कुछ कर रहे हैं। सौरभ के सब सपने टूट
चुके थे। उसने रूचि के साथ अनेकों स्वप्न देखे थे। सौरभ मन ही
मन घुटता रहा।
कुछ महीनों बाद सौरभ और रूचि का तलाक हो गया, दोनों
अब स्वतंत्र हो गये । इस निर्णय से सौरभ के साथ साथ किरन, साहू
साहब, दिनेश व रंजना बहुत आहत हुये, उनकी सामाजिक मान्यतायें
यह स्वीकार नहीं कर पा रही थी परन्तु रूचि की इच्छा के आगे सब
लाचार थे ।
तलाक की औपचारिकता पूरी होते ही रूचि ने रघु को बड़े
उत्साह से बताया कि - सब पाप कट गया, अब आजाद हो गई
हूँ - अब हम लोग कब शादी कर रहे हैं? डेट तय करिये।
रघु बोला - मैं अपनी मम्मी से बात करता हूँ, वह ही सब तय
करेंगी।
ठीक है जल्दी करो, अब कब तक इन्तजार करेंगे? - रूचि ने
कहा
रघु बोला -ठीक है घर में बात करता हूँ।

जैसे ही रघु ने अपनी माँ से रूचि के साथ शादी की बात
चलायी तो मॉ भड़क गई - क्या बोलता है रूचि से शादी करेगा?
दिमाग तो खराब नहीं हो गया तेरा?
मेरा कुँवारा बेटा उस तलाक शुदा लड़की से शादी करेगा? ऐसा
कभी नही हो सकता क्या हमें लड़की नहीं मिलेगी, जो उससे मैं
अपने बेटे की शादी करूँगी ? नही यह कभी नहीं हो सकता।
मॉ फिर बोली - रूचि जब इतने बड़े घर में इतने अच्छे लड़के
के साथ एडजस्ट नहीं कर पाई तो हम साधारण लोंगों के साथ क्या
निभायेगी ? साहू साहब की इज्जत के बारे मे उसने नहीं सोचा तो
हमारे घर की इज्जत के बारे में क्या सोचेगी? सौरभ इतना पढ़ा
लिखा लड़का है ,उसके साथ रूचि नहीं रह पाई तो तेरे साथ कितने
दिन रहेगी ?
रघु की मम्मी ने साफ मना कर दिया कि "मैं तलाक शुदा 
लड़की से अपने कुँवारे बेटे की शादी कभी भी नहीं होने दूगी"। माँ
की बातों का रघु पर भी प्रभाव पड़ा और वह माँ की जिद के आगे
चुप रह गया।
सौरभ व परिजन धीरे-धीरे विषाद से उबरने लगे ,कुछ दिनों बाद
किरन ने एक समझदार, सुशील, घरेलू लड़की से सौरभ की शादी कर
दी।
इधर धीरे धीरे रघु रूचि से कन्नी काटने लगा, रूचि जब भी
उससे अपनी शादी की बात करती तो वो टालमटोल करता ।
रघु की मॉं को भी लगा कि अगर रघु की शादी जल्दी नही
किये तो रघु कोई गलत कदम उठा सकता है। इसलिये उन्होनें एक
सुशील लड़की से रघु की शादी करवा दी। रघु भी उस लड़की के
साथ शादी करके रूचि को भूल गया।
इस तरह रूचि एक बासी फूल की तरह हो गई जो ना भगवान
को समर्पित किया जाता है और ना गुलदस्ते में सजाया जाता है।
                     *****
         छत्तीसगढ़ रत्न डॉ. शिरोमणि माथुर 
                                        दल्ली राजहरा
shiromanimathur@gmail.com 
9893742299