Devil ki Daastaan - 31 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Devil की दास्तान - 31

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Devil की दास्तान - 31

हवेली की दीवारें हिल रही हैं। टुकड़े-टुकड़े काँच फर्श पर बिखरे हैं। बिजली की चमक में दो परछाइयाँ नज़र आ रही हैं — करण और रूद्र की।)

“वो सिर्फ़ दो जिस्मों की लड़ाई नहीं थी...
वो दो आत्माओं का हिसाब था — दोस्ती, धोखे और खून का।”

(सिमरन कोने में खड़ी है। उसकी आँखें भय से चौड़ी हैं। करण और रूद्र हवा में टकराते हैं, आवाज़ गूँजती है। बीच-बीच में उनके शब्द सुनाई देते हैं।)

रूद्र (गुस्से में) बोला - 
“याद है करण? पाँच साल पहले... जब हम पहली बार इंसानी खून पीने पृथ्वी पर आए थे?”

(करण की आँखों में झिलमिलाती यादें उभरने लगती हैं।  फ्लैशबैक शुरू होता है।)

🌒 फ्लैशबैक – पाँच साल पहले 🌒

(रात का जंगल। दोनों — रूद्र और करण — तेज़ी से भागते हैं। उनके सामने एक अपराधी भाग रहा है।)

अपराधी (साँस फुलाकर) बोला - 
“कौन... कौन हो तुम लोग?”

(रूद्र मुस्कुराता है, उसके दाँत चमकते हैं।)

रूद्र बोला - 
“बस... प्यासे हैं।”

(अगले ही पल रूद्र और करण उस पर टूट पड़ते हैं। अपराधी की चीख रात के सन्नाटे को तोड़ देती है। खून की बूँदें उड़ती हैं। दोनों के चेहरे पर लाल निशान।)

“पहली बार उन्होंने इंसानी खून का स्वाद चखा था...
और उस रात कुछ बदल गया था।
वो प्यास, वो नशा — जिसने दोस्ती को भी ज़हर बना दिया।”

(रूद्र हँसता है, खून से लथपथ।)

रूद्र बोला - 
“देखा करण... इंसान का खून... कितना मीठा होता है!”

(करण थोड़ी देर तक चुप रहता है, फिर कहता है)

करण बोला - 
“हाँ... पर खून पीने से ज्यादा नशा... उसके डर में है।”

(रूद्र उस वक़्त उसकी बात पर बस हँस देता है।)

रूद्र बोला - 
“तू हमेशा भावनाओं में फँस जाता है करण...
हम अमर हैं... इंसान नहीं।”

🌩️ वर्तमान समय — हवेली में 🌩️

(करण और रूद्र फिर आमने-सामने हैं। रूद्र की आँखें गुस्से से लाल हैं।)

रूद्र बोला - 
“तब से तू बदल गया करण... तूने इंसानियत को गले लगाया और अपने ही खून से मुँह मोड़ लिया।”

करण (गरजते हुए) बोला - 
“और तूने अमरता को चुना लेकिन अपनी आत्मा खो दी!”

(दोनों फिर से भिड़ते हैं। फर्नीचर उड़ता है। हवेली की दीवार पर दरारें पड़ जाती हैं।)

(सिमरन घबराकर चिल्लाती है)

सिमरन बोली - 
“रुको! बस करो! ये लड़ाई कुछ नहीं देगी तुम्हें!”

(करण और रूद्र दोनों एक पल के लिए रुकते हैं। करण की आँखों में भावनाएँ हैं, रूद्र की आँखों में नफरत।)

रूद्र (ठंडी हँसी में) बोला - 
“भावनाएँ? देखो करण... ये ही तो तेरी कमजोरी है।
और ये...” (सिमरन की ओर इशारा करता है)
“तेरी मौत बनेगी।”

(करण एक झटके में रूद्र की ओर झपटता है। दोनों के बीच टकराव होता है — रोशनी की चमक और हवेली की नींव हिल उठती है। सिमरन चीखती है।)

“दो दोस्तों की कहानी अब ख़ून की अदालत में थी...
जहाँ फ़ैसला कोई इंसान नहीं — किस्मत सुनाने वाली थी…”

(बिजली चमकती है, कैमरा दूर होता है — हवेली के ऊपर तूफ़ान छाया है।)

(रात और भी गहरी हो चुकी थी। आसमान में बादल गरज रहे थे, हवा में राख और धूल फैली थी। हवेली के चारों ओर अंधेरे से कई परछाइयाँ निकल रही थीं — रूद्र ने अपनी बिरादरी के और डेविल्स को बुला लिया था।)

“जब दोस्त दुश्मन बन जाए... तो लड़ाई आसान नहीं रहती...
और आज करण के सामने सिर्फ़ रूद्र नहीं, पूरी अंधेरी ताकतें थीं।”

(करण और रूद्र आमने-सामने हैं। रूद्र के पीछे से पाँच-छह और डेविल्स उभरते हैं। उनके चेहरे विकृत हैं, आँखें अंगारों जैसी जल रही हैं।)

रूद्र (हँसते हुए) बोला - 
“अब देख करण... तेरा अंजाम।
तू अकेला... और हम सब!”

(करण पीछे देखता है — सिमरन दीवार के पास खड़ी काँप रही है। उसके चेहरे पर डर साफ़ है।)

सिमरन (काँपती आवाज़ में) बोली - 
“करण जी... यहाँ से चलिए... ये सब आपको मार देंगे!”

(करण की आँखों में एक पल के लिए दर्द और चिंता दोनों झलकते हैं।)

करण (धीरे से, खुद से) बोला - 
“मैं तुम्हे कुछ नहीं होने दूँगा... सिमरन।”

(अगले ही पल रूद्र हमला करता है। करण अपने पंख फैलाता है, ज़मीन काँप जाती है। रूद्र की आग जैसी लपटें हवा में उठती हैं। करण उन्हें रोकने की कोशिश करता है, पर वो थक चुका है। उसकी साँसें भारी हो रही हैं।)

“हर ताकत की भी एक सीमा होती है... और करण की शक्ति आज उसके प्यार के बोझ तले झुक रही थी।”

(रूद्र अपनी तलवार जैसी नुकीली नाखूनों से करण के सीने पर वार करता है। करण पीछे हटता है, खून झरने की तरह बहने लगता है। सिमरन चीखती है।)

सिमरन (चिल्लाकर) बोली - 
“करण जी!!”

(करण दर्द में भी मुस्कुराता है। उसकी आँखें अब लाल नहीं, इंसानी सी हो जाती हैं।)

करण (धीरे से) बोला - 
“मैं हार नहीं सकता... जब मेरा प्यार ज़िंदा है।”

(वो ज़मीन से सिमरन को उठाता है और एक झटके में अपने पंख फैलाकर आसमान की ओर उड़ जाता है। नीचे रूद्र और बाकी डेविल्स गुस्से में चीखते हैं।)

रूद्र (गर्जना करते हुए) बोला - 
“भाग जा करण! पर याद रख... जहाँ अंधेरा होगा, वहाँ मैं तुझे ढूँढ लूँगा!”

(बिजली चमकती है। करण बादलों के बीच उड़ता है, सिमरन उसकी बाँहों में है। सिमरन डर से उसकी छाती से लिपट जाती है।)

सिमरन (डरी हुई) बोली - 
“करण जी... हम कहां जा रहे हैं ?... नीचे देखिए... वो सब पीछा कर रहे हैं!”

(करण तेज़ी से बोलता है)
करण बोला - 
“चुप रहो सिमरन! मैं तुम्हें बचाने जा रहा हूँ... अब कोई तुम्हें छू भी नहीं पाएगा।”

(हवा में उनकी उड़ान और तेज़ हो जाती है। बादलों के बीच वो एक पहाड़ी की गुफा के पास उतरता है। गुफा शांत और ठंडी है — मानो दुनिया से कटी हुई।)

(करण सिमरन को धीरे से ज़मीन पर उतारता है। उसके चेहरे पर पसीना और दर्द है।)

सिमरन (साँस सँभालते हुए) बोली - 
“ये... कहाँ लाए हो मुझे आप?”

करण (धीरे से) बोला - 
“यहीं... कुछ वक्त के लिए हम सुरक्षित हैं... यह वही जगह है जहाँ कोई डेविल नहीं आ सकता... क्योंकि यहाँ भगवान का नाम लिया गया था... बहुत साल पहले।”

(सिमरन उसकी तरफ देखती है। उसके दिल में अब डर नहीं, बल्कि दर्द और ममता दोनों हैं।)

“प्यार भागा नहीं करता... वो बस शरण ढूँढता है...
और आज करण ने पहली बार... किसी और के लिए अपनी जान से ज़्यादा डर महसूस किया था।”

(सिमरन करण का चेहरा पकड़ती है, उसके ज़ख्मों को देखती है। करण मुस्कुराता है लेकिन उसकी आँखों में थकावट है। बाहर तूफ़ान चल रहा है, अंदर सन्नाटा है...)

(गुफा के अंदर ठंडी और अंधेरी हवाएँ चल रही हैं। करण जमीन पर बैठा है, साँसें भारी हैं, ज़ख्म खून से भरे हैं। सिमरन उसके सामने बैठी है। उसके हाथ काँप रहे हैं, लेकिन वो धीरे-धीरे करण के हाथों को पकड़कर पट्टी बाँधना शुरू करती है।)

सिमरन (धीरे-धीरे, फुसफुसाते हुए) बोली - 
“करण जी... ये सब ठीक हो जाएगा। आप बस मेरी बात सुनिए... मैं आपके साथ हूँ।”

(करण उसकी मासूमियत और साहस देखकर हैरान है। वो पहली बार महसूस करता है कि कोई उसके डर और पीड़ा को समझ रहा है।)

करण (धीरे से, दर्द भरे स्वर में) बोला - 
“सिमरन... मैं... मैं खुद को रोक नहीं पा रहा... मेरा शरीर अब भी तुम्हारे पास होने पर झुनझुना कर रहा है।”

(सिमरन ने करण की गर्दन और कंधों के पास पट्टी बाँध दी। वो काँपते हुए भी उसे सहलाती है।)

सिमरन (मुस्कान के साथ, पर आँसुओं के साथ) बोली - 
“अब आप आराम करिए। मैं यहाँ हूँ, आप सुरक्षित हो। मैं आपको छोड़के नहीं जाऊंगी।”

(करण धीरे-धीरे उसकी बाँहों में सिर टिकाता है। उसके हाथ काँपते हैं। पहली बार उसकी लाल आँखों में इंसानियत की चमक भी दिखाई देती है।)

“उसकी मासूमियत ने उस दीवानी आत्मा को रोक दिया।
आज करण ने महसूस किया कि प्यार सिर्फ़ दिल में नहीं, हाथों और देखभाल में भी बसा होता है।”

(सिमरन अपनी पूरी शक्ति से उसे सहलाती है। करण धीरे-धीरे साँसें नियमित करता है। गुफा में सन्नाटा है, लेकिन अब डर नहीं, सिर्फ़ प्यार और सुरक्षा का एहसास है।)