call part 3 in Hindi Short Stories by sky books and stories PDF | कॉल - 3

The Author
Featured Books
Categories
Share

कॉल - 3

आर्य अंदर आता है और कमरे को ध्यान से देखने लगता है। उसे सब कुछ बिल्कुल सामान्य लगता है। वह मान लेता है कि यह सब सिर्फ एक सपना था। वह जैसे ही बिस्तर पर लेटने वाला होता है, तभी उसका फोन बज उठता है। आर्य डर जाता है, क्योंकि उसने सच में रिचार्ज नहीं कराया था। वह डरते हुए फोन उठाता है और देखता है कि कॉल उसी अनजान नंबर से थी।

वह घड़ी की ओर देखता है। ठीक रात के 12 बज रहे थे।

आर्य डरते हुए धीमी आवाज़ में कहता है, "हैलो... कौन है?"

दूसरी तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आती।

आर्य फिर पूछता है, "मैं पूछ रहा हूँ कौन है? और मुझे क्यों परेशान कर रहे हो? मैं तुम्हारी पुलिस में शिकायत कर दूँगा।"

इतना कहकर वह दूसरी तरफ़ से जवाब आने का इंतज़ार करने लगता है, लेकिन तब भी कोई आवाज़ नहीं आती। आर्य कॉल काटने ही वाला होता है कि तभी बहुत धीमी आवाज़ सुनाई देती है—

"मुझे... क्यों मारा...?"

इतना कहते ही एक लड़की रोने लगती है। उसका रोना धीरे-धीरे चीखों में बदल जाता है।

आर्य डर के मारे काँपने लगता है। उसके हाथ से फोन छूट जाता है और ज़मीन पर गिरकर दो टुकड़ों में टूट जाता है।

उसे समझ नहीं आता कि आखिर उसके साथ क्या होरहा है। इन्हीं सब बातों को सोचते-सोचते उसे नींद आ जाती है और उसकी आँख सीधी सुबह खुलती है।

वह उठता है और रात की घटनाओं के बारे में सोचते हुए नहाने चला जाता है। जब नहाकर शीशे के सामने खड़ा होता है तो देखता है कि उसकी आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे पड़ गए हैं और वह पहले से काफी कमजोर दिखाई दे रहा है।

लेकिन उसकी नज़र जिस चीज़ पर जाकर टिक जाती है, वह थी उसके गले पर बने हुए गहरे निशान।

आर्य उन्हें हाथ से छूकर देखता है।

"आह..."

निशान इतने गहरे थे मानो किसी ने पूरी ताकत से उसका गला दबाया हो।

उसे रात का सपना याद आता है, लेकिन वह खुद से कहता है, "वो तो सिर्फ सपना था... फिर ये निशान कैसे?"

उसे कुछ समझ नहीं आता।

वह यह सब छोड़कर तैयार होने लगता है। जैसे ही ऑफिस जाने के लिए दरवाज़ा खोलता है, उसे खाने की भीनी-भीनी खुशबू आती है, जो उसके फ्लैट के बाहर से आ रही थी।

वह देखता है कि दरवाज़े के पास ज़मीन पर वही बर्तन रखे हुए हैं जो कल रात रखे थे।
 
आर्य उन्हें उठाकर खोलता है।

अंदर गरमा-गरम पोहे और साथ में गर्म चाय रखी थी।

उसे लगता है कि पड़ोस वाली आंटी ने ही नाश्ता भेजा होगा।

वह दरवाज़ा बंद करता है, नाश्ता लेकर बिस्तर पर बैठ जाता है और बड़े स्वाद से खाता है।

नाश्ता खत्म करने के बाद वह सारे बर्तन धोकर रसोई में रख देता है और सोचता है कि शाम को लौटकर आंटी को वापस दे देगा।

इतना सोचकर वह फ्लैट में ताला लगाता है और ऑफिस के लिए निकल जाता है।

---

ऑफिस में

जैसे ही आर्य ऑफिस पहुँचता है, आज का माहौल उसके लिए बिल्कुल अलग था।

आज लोग उसे अजीब नज़रों से नहीं, बल्कि मुस्कुराकर देख रहे थे। हर कोई उसे "गुड मॉर्निंग" कह रहा था।

यह उसके लिए बिल्कुल असामान्य था, क्योंकि पहले तो लोग उससे सीधे मुँह बात तक नहीं करते थे।

आज सभी उससे हँसकर बातें कर रहे थे। पूरा दिन बहुत अच्छा बीतता है।

दोपहर में जब वह कैंटीन में खाना खाने जाता है तो उसका मन बिल्कुल नहीं करता।

उसे सिर्फ पिछली रात के खाने और आज सुबह के नाश्ते की तलब हो रही थी।

वह बिना कुछ खाए वापस अपने काम में लग जाता है।

देखते ही देखते रात हो जाती है।

जैसे ही वह ऑफिस से निकलने वाला होता है, उसका दोस्त समीर उसे मिल जाता है।

"अरे आर्य! कैसा है तू?"

"मैं ठीक हूँ। तू बता?"

"मैं भी ठीक हूँ। लेकिन एक बात पूछूँ?"

"हाँ, पूछ।"

"सब ठीक तो है ना? मतलब... कोई परेशानी तो नहीं? अगर पैसों की कोई दिक्कत हो तो मुझसे कह देना।"

आर्य मुस्कुराते हुए कहता है,

"नहीं यार, अब कोई परेशानी नहीं है। हाँ, कल तक थी
लेकिन पता नहीं क्यों, आज सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा है। मन भी हल्का है। लेकिन तू अचानक ऐसा क्यों पूछ रहा है?"

समीर अजीब-सी मुस्कान के साथ कहता है,

"नहीं... बस ऐसे ही। अगर कभी भी कोई परेशानी हो तो बता देना।"

आर्य के मन में आता है कि वह उसे उस अनजान कॉल के बारे में बता दे, लेकिन न जाने क्यों उसके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकलता।

थोड़ी देर बाद समीर वहाँ से चला जाता है और आर्य भी घर के लिए निकल पड़ता है।

घर पहुँचकर वह देखता है कि उसके फ्लैट का दरवाज़ा खुला हुआ है।

वह सीधे अंदर चला जाता है।

घर में घुसते ही उसे खाने की वही मनमोहक खुशबू आती है।

इस बार वह बिना कुछ सोचे सीधे खाने पर टूट पड़ता है।

ऐसे ही दो-तीन दिन गुजर जाते हैं।

हर सुबह नाश्ता... हर रात गरम खाना।

अब आर्य को उस खाने की आदत पड़ चुकी थी।
बाहर का कोई खाना उसे अच्छा नहीं लगता था।

यहाँ तक कि ऑफिस की कैंटीन का खाना भी उसे बेस्वाद लगने लगा था।

धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी बदलने लगी।

ऑफिस में लोग उससे प्यार से बात करने लगे।

जो लड़की पहले उसे देखकर नज़रें फेर लेती थी, अब वही उससे मुस्कुराकर बातें करने लगी थी।

लेकिन उसकी यह अच्छी ज़िंदगी ज़्यादा दिनों तक नहीं चली।

एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने उसके सारे भ्रम तोड़ दिए...

उस सुबह की शुरुआत भी बाकी दिनों जैसी ही हुई।

लेकिन जैसे ही आर्य की आँख खुली, उसे बेहद कमजोरी महसूस हुई।

मानो उसने कई दिनों से कुछ खाया ही न हो।

वह किसी तरह उठकर ब्रश करने गया।
जब उसने शीशे में खुद को देखा तो हैरान रह गया।

उसका चेहरा पहले से भी ज़्यादा आकर्षक लग रहा था, जैसे रातों-रात उस पर कोई अजीब-सा निखार आ गया हो।

तैयार होकर वह सीधे रसोई में गया।

लेकिन आज वहाँ नाश्ता नहीं था।

उसे लगा शायद आज आंटी ने नाश्ता नहीं भेजा।

लेकिन अब वह उस नाश्ते के बिना रह ही नहीं सकता था।

वह तुरंत घर से बाहर निकला और पड़ोस का दरवाज़ा ज़ोर-ज़ोर से पीटने लगा।

कोई दरवाज़ा नहीं खोल रहा था।

वह लगातार दरवाज़ा पीट रहा था, मानो अगर आज उसे नाश्ता नहीं मिला तो वह पागल हो जाएगा।

तभी पीछे से किसी ने आवाज़ दी—

"आर्य..."

वह पलटकर देखता है।

सामने पड़ोस वाली आंटी खड़ी थीं।

आर्य खुशी से उनकी ओर बढ़ता है।

"अच्छा हुआ आंटी आप आ गईं। जल्दी से मुझे नाश्ता दे 

 दीजिए... मुझे बहुत भूख लगी है।"

आंटी उसकी बात सुनकर हैरान रह जाती हैं।

"बेटा... कौन-सा नाश्ता? और तुमने अपनी ये क्या हालत बना ली है?"

लेकिन आर्य को उनकी कोई बात सुनाई नहीं देती।

वह बार-बार सिर्फ एक ही बात दोहराता रहता है—

"आंटी... प्लीज़... मुझे नाश्ता दे दीजिए। आपको जितने पैसे चाहिए मैं दे दूँगा... बस मुझे वही नाश्ता चाहिए।"

अब आंटी डरने लगी थीं।

वह धीरे-धीरे पीछे हटते हुए बोलीं,

"बेटा... मुझे तुम्हारी हालत ठीक नहीं लग रही..."

इतना सुनते ही आर्य की आँखें असामान्य रूप से फैल जाती हैं।

मानो उसकी पुतलियाँ आँखों से बाहर निकल आएँगी।

वह गुस्से से भरकर भारी आवाज़ में चिल्लाता है—

"आंटी... मुझे नाश्ता दो!"
आंटी डर के मारे चीख उठती हैं।

"कोई है! बचाओ! देखो आर्य को क्या हो गया है!"

उनकी आवाज़ सुनकर पूरे फ्लोर के लोग बाहर निकल आते हैं।

आर्य की हालत देखकर सब सन्न रह जाते हैं।

उसकी आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे थे।

चेहरा पूरी तरह सूखकर मुरझा चुका था।

शरीर किसी सूखी लकड़ी की तरह दुबला हो गया था।

और उसकी बड़ी-बड़ी आँखें बिना पलक झपकाए सिर्फ आंटी को घूर रही थीं।

सभी लोग उसे पकड़ने की कोशिश करते हैं।

"आर्य... क्या हुआ तुम्हें?"

"आर्य... होश में आओ!"

लेकिन उसे किसी की आवाज़ सुनाई नहीं देती।

वह सिर्फ बड़बड़ाए जा रहा था—

"मुझे... नाश्ता चाहिए..."

अचानक वह सबको धक्का देकर अपने घर के अंदर भाग 

जाता है।

सीधे रसोई में पहुँचकर रात वाले बर्तनों को खोलता है।

लेकिन जैसे ही ढक्कन हटाता है...

भीषण सड़ी हुई बदबू पूरे कमरे में फैल जाती है।

आर्य तुरंत अपनी नाक ढँक लेता है।

बदबू इतनी भयानक थी कि साँस लेना मुश्किल हो रहा था।

उसे कुछ समझ नहीं आता।

वह गुस्से और बेचैनी में पूरे घर का सामान इधर-उधर फेंकने लगता है।

तभी उसके पेट में ऐसा दर्द उठता है मानो किसी ने भीतर से ज़ोरदार मुक्का मारा हो।

उसे उल्टी होने लगती है।

लेकिन इस बार उल्टी में सिर्फ कीड़े निकलते हैं।

उनसे उठती सड़ांध पूरे घर में फैल जाती है।
आर्य वहाँ एक पल भी नहीं रुक पाता।

वह अपना मुँह ढँककर घर से भाग निकलता है...

और वह बस इस बदबू से दूर जाना चाहता था। वह भागते-भागते पता नहीं कहाँ आ गया था। वह अपने आस-पास देखता है। आस-पास लोग वैसे ही रह रहे थे जैसे कुछ हुआ ही न हो, लेकिन आर्य के मन का भँवर उसे कचोट रहा था। वह हाँफते हुए सोचता है कि अब वह कहाँ जाए। उसे भूख भी लग रही थी। वह अपने पास खड़े हुए ठेले पर देखता है, वहाँ ऑमलेट बन रहा था। वह सोचता है कि क्यों न खा लिया जाए। वह अपने लिए एक ऑमलेट ऑर्डर करता है, लेकिन जैसे ही वह पहला निवाला लेता है, वह उसे थूक देता है। उसे वह खाना बहुत कड़वा लग रहा था। वह प्लेट वापस वहीं रखकर पैसे देकर वहाँ से चल देता है।


उसका मन कहीं नहीं लग रहा था। उसका दिल बहुत परेशान था। वह घर वापस नहीं लौटता, न ही ऑफिस जाता। उसका फोन भी टूट चुका था, जो उसने अभी तक ठीक नहीं कराया था। वह बस समुद्र किनारे बैठा रहा पूरा दिन और कब रात हो गई उसे पता ही नहीं चला!


रात के 11:30 बज रहे थे। आर्य अभी भी समुद्र किनारे बैठा हुआ था और लहरों को आते-जाते देख रहा था, मानो ये लहरें उसके अंदर की कशमकश को शांत कर रही हों। तभी वहाँ पर एक वॉचमैन आ जाता है। वह आर्य को कहता है कि बहुत रात हो गई है, अब तुम्हें घर जाना चाहिए।

आर्य को घर का नाम सुनते ही सुबह की सारी बातें याद आ जाती हैं। उसका मन घर जाने का बिल्कुल नहीं था, लेकिन उसके पास कोई चारा भी तो नहीं था। वह उठता है और घर के लिए निकलता है। 15-20 मिनट में ही वह घर पहुँच जाता है।

घर पहुँचकर वह देखता है कि उसके घर पर ताला लगा है, लेकिन उसे अच्छे से याद है कि उसने जाते वक्त दरवाज़ा खुला छोड़ा था। आर्य ताला खोलता है और घर के अंदर जाता है। घर में घुसते ही उसे खुशबू आती है और उसके पेट से आवाज़ आने लगती है। वह जल्दी-जल्दी किचन में जाता है तो देखता है वहाँ खाना रखा हुआ था।

वह पहले तो डर जाता है, क्योंकि उसे आंटी की बात याद आने लगती है—"कौन-सा खाना आर्य...?"

उसे समझ नहीं आता, लेकिन उसके पेट की आवाज़ से साफ पता चल रहा था कि वह कितना भूखा है। वह खुद को रोक नहीं पाता और खाना खाना शुरू कर देता है। वह इतना बेचैन होकर खाना खा रहा था मानो कितने जन्मों का भूखा हो। इतने बड़े-बड़े निवाले खाने के बाद आर्य ऐसे ही बेड पर लेट जाता है।

तब उसे कुछ याद आता है और उठकर अपने आस-पास देखता है। उसे याद आता है कि जब वह घर से गया था तो घर पूरी तरह फैला हुआ था, लेकिन अब सब अपनी जगह पर वैसे ही रखा था। लेकिन यह सब सोचना भी उसके लिए भारी लग रहा था। आर्य बिस्तर पर वापस लेट जाता है और गहरी नींद में सो जाता है। 
.
.
Agle part ki jhalak..
आख़िर कौन है वो लड़की? क्यों परेशान कर रही है वो मुझे? और 'लाल' से उसका क्या लेना-देना..."