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Deepak Kumar Tiwari

Deepak Kumar Tiwari

@deeptansh
(46)

जिंदगी इक पटरियों पर दौड़ती सी रेल है,
सांस की हर चाल में इक अजब सा खेल है।

जब भगाता हूँ इसे मैं वक्त की रफ्तार पर,
डर सा रहता है अनायास हो न घात पर।

साँस की गर रफ़्तान इतनी तेज हो जाए,
हर धड़कन अनहोनी के साए में खो जाए।

खींचकर जब हाथ फिर मैं बेड़ियों को थामता,
धैर्य का दामन पकड़कर फिक्र को बिसराता हूँ

तब धुंधली सी वो मंजिल बहुत दूर दिखती है,
कछुए सी चाल में हर रात लंबी लगती है।

और जब यह उम्र खुद परवान होकर भागती,
जी चाहता है वक्त की सुई यहीं थम जाए

मगर थमने लगे जब जिंदगी का ये कारवां,
तो पीछे छूट जाता कोई अपना साथी-कारवां।

बस इसी कशमकश में, उधेड़बुन की धार में,
कभी इस जीत में और कभी इस हार में

पता ही नहीं चलता कि कब ये जिंदगी का तेल,
रेड लाइन से नीचे आ कर हो गया है खेल!

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ठंडी पड़ती इन सांसों में, बस एक ही कसक बची है,
ज़िंदगी की आख़िरी शाम, तेरे दीदार को तरसी है।


हाथ कँपकँपा रहे हैं, और धुंधली हो रही है ज़मीन,
पर दिल चीख कर कह रहा—काश! तुम होते यहीं।

एक पल को छू लेते मुझे, तो हँसते-हँसते मर जाता,
तेरी बाहों का कफ़न मिलता, तो मैं तर जाता।

अब बिना तुम्हारे, ये रूह तड़पकर निकल रही है,
जैसे बिन पानी के कोई तिनका, आग में जल रही है।

अलविदा! मेरी साँसों की डोर अब टूट रही है,
तेरी यादों की आख़िरी परछाईं भी छूट रही है।

अगले जनम की दुआ भी, मैं माँगूँ तो कैसे माँगूँ?
जब इस जनम की अधूरी मोहब्बत, मुझे जीने नहीं दे रही है।

मैं हार गया इस दुनिया से, और हार गया तक़दीर से,अब छूट रहा है हाथ मेरा, तेरी यादों की ज़ंजीर से।

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साँसों की टूटी माला है, और आख़िरी ये रात है
होंठों पर बस एक सिसकी, और अधूरी बात है।

ज़िंदगी की इस दहलीज़ पर, मौत खड़ी मुस्काती है,
पर तुझको न पा पाने की तड़प, इस जान को ले जाती है।

देखा था जो एक ख़्वाब मिलकर, वो काँच सा चूर हुआ,
किस्मत का कैसा खेल देखो, तू मुझसे कितना दूर हुआ।

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तुम्हारे नाम की धड़कन, तुम्हारे रूप का साया,
कि जैसे प्रेम का अमृत, स्वयं इस धरा पर आया।


नैनों में जो बसी मूरत, वही मेरी इबादत है,
तुम्हें ही सोचना हर पल, मेरी पावन सी आदत है।


तुम्हारी मंद मुस्काानें, जैसे सावन की पहली फुहार,
छू जाए जो रूह को मेरी, कर दे सब कुछ तार-तार।


बिना बोले जो सुन ले तू, वो अनकही सी बात हूँ मैं,
तुम हो चंदा की शीतल चांदनी, तो शांत सी रात हूँ मैं।

न कोई शर्त है इसमें, न पाने की ही कोई चाह,
बस तुम्हारी ओर मुड़ती है, मेरी चाहत की हर एक राह।


यही तो प्रेम रस का सार है, जो दो शरीरों को एक जान करता है,
दिलों की इस इबादत को, ज़माना आज भी याद करता है।

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महफ़िल में हंसने की आदत ने हमें यूं रुला दिया,
अपने ही गमों ने हमको चुपके से मिटा दिया।


लोग कहते हैं कि बहुत खुशमिजाज इंसान हैं हम,
और हमारी इसी अदा ने हमें अंदर से जला दिया।

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ख़ामोशी से जीने की आदत जो डाली हमने,
फिर किसी से कोई भी शिकायत न पाली हमने।


लोग पूछते हैं क्यों इतनी उदास रहती हैं आँखें,
बस तुम्हारी तस्वीर देख कर उम्र गुज़ार डाली हमने।

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न कोई शिकवा रहा, न कोई मलाल बाकी है,
बस तुम्हारी आँखों का एक अधूरा सवाल बाकी है।


तुम्हारी यादों से अब कोई शिकरत नहीं बची,
बस सीने में दबा हुआ कोई पुराना ख़्याल बाकी है।

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शब-ए-फ़िराक़ में आँखों से ख़्वाब रूठ गए,
तुम्हारी याद के सारे हिसाब टूट गए।
तलाशते रहे तुमको हम हर एक रस्ते पर,
नसीब ऐसे मुड़े कि तमाम ख़्वाब टूट गए।


तड़प ये दिल की भला किससे जाकर बोलें हम,
कि बेबसी के समंदर में डूबते-डूबते बोलें हम।
तेरी जुदाई का सदमा उठाए कैसे भला हम
बिखड़ गए हैं इस तरह कि जुड़ न पाएंगे हम।

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तेरी जुदाई की रातों में यूँ उम्र कट रही है,
जैसे किसी मज़लूम की सांसें घट रही हैं।

कोई चारा नहीं जो इस दर्द को मिटा दे,
बस तेरी आरज़ू में हर एक रात कट रही है।

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तुझे गुरूर है अपने हुस्न पर इतना,
हिमालय की ऊँचाई को भी नहीं उतना।
मगर भूल जाती हो शायद तुम,
कि तुम कोमल हो वो कठोर कितना।


ज़रा सी धूप से तुम मुरझा जाती हो पल में,
वो पत्थर सी चट्टानों में रहता है हर पल में।
तुम्हारी नाज़ुक सी कलियों सी है ये काया तेरी,
वो आंधी-तूफानों को भी सहता है जल-थल में।

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