तुझे गुरूर है अपने हुस्न पर इतना,
हिमालय की ऊँचाई को भी नहीं उतना।
मगर भूल जाती हो शायद तुम,
कि तुम कोमल हो वो कठोर कितना।
ज़रा सी धूप से तुम मुरझा जाती हो पल में,
वो पत्थर सी चट्टानों में रहता है हर पल में।
तुम्हारी नाज़ुक सी कलियों सी है ये काया तेरी,
वो आंधी-तूफानों को भी सहता है जल-थल में।