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तुम हो तो लगता है, ज़िंदा हूँ मैं मुझमें कहीं तुम हो तो लगता है, हाँ प्यार के लायक हूँ मैं तुम हो तो लगता है, मेरा घर भी अब 'घर' है वरना इन चार दीवारों में, क्या रखा है मेरी जाँ... तुम हो तो जीने की इक नई उम्मीद है, जब भी मैं तुम्हें देखती हूँ, लगता है थोड़ा और जियूँ, बस सिर्फ तुम्हारे लिए! जब से तुम मेरी ज़िंदगी में आई हो, लगता है जैसे दो परियाँ मेरा ख्याल रखने, उस ऊपर वाले ने ज़मीन पर भेज दी हैं... (बेटियां बहुत प्यारी होती है जितना हो सके उतना उन्हें प्यार दे) DHAMAK
प्रभु… मेरा निस्वार्थ प्रेम था, फिर भी मुझमें खामियाँ ही देखी गईं। बिना वजह जो ईर्ष्या और नफरत करते रहे, मेरी सच्चाई उन्हें कभी दिखी नहीं। हे प्रभु… ऐसे लोग मुझे किसी भी जन्म में, अनंतकाल तक न मिलें। बस यही मेरी प्रार्थना है… बस यही… मेरी प्रार्थना है… (लेखिका का पता नहीं कहीं दो लाइन पड़ी थी उसमें से यह बना दिया यह दो पंक्तियों के वेदना मेरा दिल छू गई) ढमक
साथ चले इतना ही जिंदगी के लिए काफी है। लेखक: धमक (हां… हां… हम्… हम्…) न तुम पर हक जताना है न मुझको कुछ मनवाना है बस यूँ ही उम्र भर साथ चलते जाना है ना बड़ी सी ख्वाहिश है ना कोई फरमाइश है तेरा हाथ मेरे हाथ में बस इतनी सी गुज़ारिश है (हां… हां…) दिन अपने अपने होंगे रास्ते भी अलग होंगे पर शाम ढले जब मिलें तो चेहरे पे सुकून होंगे ना कहना “तुम मेरे हो” ना सुनना “मैं तुम्हारी” बस साथ बैठी चुप्पी भी लगती है कितनी प्यारी साथ चले बस इतना ही ज़िंदगी के लिए काफी है तू पास रहे मुस्काता हुआ यही मेरी ख़ुशी साफ़ी है (हम्… हम्… हां… हां…
क्या इतना मुश्किल है? कोई जो मुझसे पूछे, मेरी खुशी का राज क्या है? तो कहूंगी, मैंने अपना 'वजूद' संभाल रखा है, इसलिए खुश हूं। क्योंकि मैं हूं... और मैं ही रहूंगी... क्यों किसी और के जैसा बनना है तुम्हें? क्यों दूसरों के सांचे में ढलना है तुम्हें? तुम जैसे हो, वैसे ही रहो, यही तुम्हारी पहचान है, तुम्हारा अपना होना ही, सबसे बड़ा सम्मान है। बस एक बार खुद से प्यार करना सीख लो, फिर ये सारा जहां तुम्हें हसीन लगेगा। एक बार खुद से मोहब्बत तो करके देखो, बस एक बार... खुद से प्यार करके देखो। ढमक कहती है क्या वाकई इतना मुश्किल है... खुद से प्यार करना? अब वक्त है, खुद पर थोड़ा वक्त खर्च करो... DHAMAK
બંનેની વેદનાઓને ન્યાય આપવાની કોશિશ કરી છે હું સ્ત્રી છું એટલે પુરુષની વેદના અને એટલી ન સમજી શકુ પણ છોકરાઓ મોટા થઈ ગયા છે તેમને જોઈ અને ઘણું સમજાય છે. તમારો અભિપ્રાય જરૂરી છે જો ઠીક લાગે તો કોમેન્ટ કરો તો આ વિષય પર થોડીક વધારે જાણકારી મળે देखो, स्त्री की वेदना पुरुष की वेदना से कुछ अलग नहीं है... [स्त्री की वेदना] जाने क्यों... हर बार हम ही गलत हो जाते हैं, कुछ कहें... तब भी, चुप रहें... तब भी। रिश्तों की लाज में खुद को मिटाते हैं, संभल कर चलें... तब भी, ठोकर लगे... तब भी। [पुरुष की वेदना] हर बार... हम ही मजबूत माने जाते हैं, दर्द हो... तब भी, दिल टूटे... तब भी। ज़िम्मेदारियों के बोझ तले खुद को दबाते हैं, थक जाएँ... तब भी, हार जाएँ... तब भी। [दोनों की समान पीड़ा] दुनिया की नज़रों में बस कसूरवार ठहरते हैं, हँसें... तब भी, रोएँ... तब भी। अपनी ही खुशियों का गला घोंट देते हैं, जियें... तब भी, दम तोड़ें... तब भी। DHAMAK
(હિન્દીમાં કોકની સરસ સાંભળેલી કવિતા ઉપરથી ) આ આંખો તારાથી થોડું જૂઠું બોલી શકી હોત, તો વેદનાના આ અસંખ્ય ઘા મેં છુપાવી લીધા હોત. તારા જ સ્પર્શથી મેં તૂટેલા આ મનને ફરી સાંધ્યું છે, જરા રિસાઈને ફરી તારા જ સ્નેહમાં દિલને બાંધ્યું છે. ભલે જાણતા-અજાણતા તેં દિલને મારા ચારણી કર્યું, પણ આશાનું બીજ તો એમાં જ તારા હાથે ફરી રોપ્યું. રોઈને પણ હસી પડી બસ તારી 'ખેરિયત' જાણીને, આજ તને ખબર પણ ન હોત, જો આંખો જૂઠું બોલી હોત તને. (એકદમ એવું તો નથી પણ ઠીક છે કંઈક સરસ બનીગયુ) હિના
મારુ સોગ બહુ મોટું છે પણ છેલ્લો ભાગ છે પાછતળનો તેનું થોડોક તમને અહીં પ્રસ્તુત છે
कहाँ खो गई? तुझे ढूँढूँ मैं, पर तू मिले नहीं... सारे घर में आगे-पीछे, मैं ढूँढूँ तुझे यहाँ-कहीं... पर तू तो... पर तू तो... कहाँ खो गई? इतनी ज़्यादा तू... खुद में क्यों खो गई? मैंने रोका था बहुत, पर तू तो रुकी नहीं... (आई... आई... आई...) ऐसे अचानक तू कैसे बदल गई? जैसे कोई पराई हो, वैसी तू तो हो गई... (आई... आई... आई...) इतनी ज़्यादा तू... खुद में क्यों खो गई? मोहब्बत की wo राह अब सूनी हो गई... (आई... आई... आई...) मैं यहीं रह गया और तू चली गई... अल्फ़ाज़ खत्म हुए और बात पूरी हो गई... (आई... आई... आई...) भीगी आँखों से देखूँ, पर तू दिखती नहीं... तू तो गई... तू तो गई... आई... आई... आई... जाने में... कहाँ खो गई?
Shivratri special song with my original lyrics
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