साथ चले इतना ही जिंदगी के लिए काफी है।
लेखक: धमक
(हां… हां…
हम्… हम्…)
न तुम पर हक जताना है
न मुझको कुछ मनवाना है
बस यूँ ही उम्र भर
साथ चलते जाना है
ना बड़ी सी ख्वाहिश है
ना कोई फरमाइश है
तेरा हाथ मेरे हाथ में
बस इतनी सी गुज़ारिश है
(हां… हां…)
दिन अपने अपने होंगे
रास्ते भी अलग होंगे
पर शाम ढले जब मिलें
तो चेहरे पे सुकून होंगे
ना कहना “तुम मेरे हो”
ना सुनना “मैं तुम्हारी”
बस साथ बैठी चुप्पी भी
लगती है कितनी प्यारी
साथ चले बस इतना ही
ज़िंदगी के लिए काफी है
तू पास रहे मुस्काता हुआ
यही मेरी ख़ुशी साफ़ी है
(हम्… हम्…
हां… हां…