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prabha pareek

prabha pareek Matrubharti Verified

@prabhapareek070433
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जीवन क्यों
आज सवाल जहर का नहीं है ,
वो तो मैं पी गई, ,
लोग चकित थे ये देख कर कि
मेँ फिर भी जी गई ।
गर मौका मिला कभी तो
अपनी चुप्पी लिखूंगी
लोग जिसे मेरा स्वार्थी
स्वभाव समझते रहे,
मेरे मनकी वो गुत्थी लिखूंगी,

लिखूंगी उन थकी रातों का हिसाब
जो नींद से ज्यादा
जिम्मेदारियों से दबी थीं।
और चेहरे की वो मुस्कान
जो मुझे सुखी दिखाती रहीं थी,
मै फतह का नहीं बस शिकस्त,
का हिसाब लिखूंगी,
जिनके कारण गिर गिर कर
मै हर बार मजबूत बनी थी।
अपना स्थान जीवन में
जिस दिन समझ पाऊंगी
पूरी कहानी लिखूंगी।
जब स्वयं को उतारने
लगुंगी कागज पर
सच के सिवा कुछ भी न लिखूंगी
प्रभा पारीक

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बदलते समय अपेक्षित रिश्तों की स्थिति।

मेरी रिश्तों की पोटली

यूं ही अचानक आज
हाथ से छूटकर
मेरे ही सामने खुल कर
गिर पड़ी रिश्तों की पोटली।

हड़बड़ी में लगी जब समेटने तो
उलझे-उलझे से लगे रिश्ते मुझे
कुछ सूखे-सूखे कुछ रूखे-रूखे से
कुछ सूखे पत्तों से दरकते
कुछ सिक्कों की खनक में अकडते

कुछ रिश्ते नितांत अकेले से
रिश्तों की गांठ को जस की तस झेलें
कुछ मुरझाए से रिश्तों को दरकार थी मुस्कान की फुहारों की

कुछ पोपले मुख अनुभव के
भार से समृद्ध बिल्कुल अकेले
तक रहे थे कि, कोई बांह आगे आए
आऔर थाम ले, चाहत से प्यार से,

तरोताज़ा करने की चाह में
कुछ रिश्तों को थपथपाया ,
किसी को बस सहलाया,
और ख़ुद को गुदगुदाया।

बस खिल उठे सारे रिश्ते
जो थे उलझे-उलझे से,
एक दूजे में गूंथे-गूंथे से,
प्रेम की चाशनी में पगे से,

प्रेम विश्वास से सहेज कर
रिश्तो की पोटली
मैं चल पड़ी निर्जन पथ पर
भरी-भरी आस-विश्वास लिए
नितांत अकेली।

प्रभा पारीक

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