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तलाश यूं ही अनमनी सी, मन की गहराइयों में मैं, कुछ खोज रही थ,ी जिसे ढूंढ न पाई मैं | कुछ कचोटता था, जो मुझमें नदारद था , दिल में दबा था, जबा पर अभी तक अलुप्त था, तलाश रही थी वो बीते सपने सुनहरे, कुछ कामना कुछ अभिलाष के टूटे कतरे, जग ने दिए थे सीख के नाम पर, घाव जो गहरे, सहलाकर, सुषुप्त भाव पलकों पर वो जो आ ठहरे, ढूंढती रही जहाँ में वो सतरंगी नजारे, बैरंग बचे थे मेरी आँखों में, आज वो सारे, जीने की आस, ऊर्जा, वो उम्मीदें , भुलाए भूलती नहीं ,कटुता भरी यादें , स्मरण है, मुझे और रहेगा धोखा, छलावा, अपनेपन की बातों से, वो गर्ज, वो दिखावा , झंझावात भरी वो जिम्मेदारियां सारी, जिनको निभाने में आयु गुजरी हमारी , याद करती हूँ जब वह बचपन के किस्से , मुझे याद रह गए बस, इस घर के रिश्ते, वो मन की उलझनें वो तनाव भरी रातें , वो स्वाभिमान से जीने की खोखली बातें , निकल ही तो गई उम्र मेरी सारी , कभी ,कहीं भी न बनी मैं बेचारी, पाया वो अनंत जो मेरे भाग्य बदा था , अंतर व्यथा अनकहि गहरे दह दबा था, वो आत्म मंथन वो संस्कार की बातें, वो सीख सलाह वो भली-बुरी, सौगातें , इन्हीं शब्दों ने हरदम मुझको छला है, किसी को सीख, तो किसी को धन मिला है, अब तक की बीत गई, आगे भी जाएगी बीत, बस अब न निभा पाऊँगी, मैं दुनिया की यह रीत, तलाश रही थी जो मुझमे वो मुझे कहीं न मिला , क्योंकि मेरा जीवन सदा जग अनुरूप ही ढला | प्रभा पारीक
रंगों भरी तितली रंग बिरंगी पंखों वाली, तितली भंवरे से यूं बोली l तू है काला गोल मटोल, मेरे बीच-बीच मत ङोल। पुष्पों का मीठा रस पीती, पंखों में पराग भर लेती l तू फिरता बस इधर-उधर , कभी डाल पर कभी है घर l मेँ रंग भरी प्रकृति की शान, तू करता बस मीठा गान l भंवरा बोला यूं मुस्काकर, अपनी प्यारी छटा बिखराकर l पीछे तेरे मेँ इसलिए फिरता, तुझको मीठा गान सुनाताl तेरे रंगों में मेँ रम जाता, तितली भंवरा संग कहाता l प्रभा पारीक
जीवन क्यों आज सवाल जहर का नहीं है , वो तो मैं पी गई, , लोग चकित थे ये देख कर कि मेँ फिर भी जी गई । गर मौका मिला कभी तो अपनी चुप्पी लिखूंगी लोग जिसे मेरा स्वार्थी स्वभाव समझते रहे, मेरे मनकी वो गुत्थी लिखूंगी, लिखूंगी उन थकी रातों का हिसाब जो नींद से ज्यादा जिम्मेदारियों से दबी थीं। और चेहरे की वो मुस्कान जो मुझे सुखी दिखाती रहीं थी, मै फतह का नहीं बस शिकस्त, का हिसाब लिखूंगी, जिनके कारण गिर गिर कर मै हर बार मजबूत बनी थी। अपना स्थान जीवन में जिस दिन समझ पाऊंगी पूरी कहानी लिखूंगी। जब स्वयं को उतारने लगुंगी कागज पर सच के सिवा कुछ भी न लिखूंगी प्रभा पारीक
बदलते समय अपेक्षित रिश्तों की स्थिति। मेरी रिश्तों की पोटली यूं ही अचानक आज हाथ से छूटकर मेरे ही सामने खुल कर गिर पड़ी रिश्तों की पोटली। हड़बड़ी में लगी जब समेटने तो उलझे-उलझे से लगे रिश्ते मुझे कुछ सूखे-सूखे कुछ रूखे-रूखे से कुछ सूखे पत्तों से दरकते कुछ सिक्कों की खनक में अकडते कुछ रिश्ते नितांत अकेले से रिश्तों की गांठ को जस की तस झेलें कुछ मुरझाए से रिश्तों को दरकार थी मुस्कान की फुहारों की कुछ पोपले मुख अनुभव के भार से समृद्ध बिल्कुल अकेले तक रहे थे कि, कोई बांह आगे आए आऔर थाम ले, चाहत से प्यार से, तरोताज़ा करने की चाह में कुछ रिश्तों को थपथपाया , किसी को बस सहलाया, और ख़ुद को गुदगुदाया। बस खिल उठे सारे रिश्ते जो थे उलझे-उलझे से, एक दूजे में गूंथे-गूंथे से, प्रेम की चाशनी में पगे से, प्रेम विश्वास से सहेज कर रिश्तो की पोटली मैं चल पड़ी निर्जन पथ पर भरी-भरी आस-विश्वास लिए नितांत अकेली। प्रभा पारीक
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