जीवन क्यों
आज सवाल जहर का नहीं है ,
वो तो मैं पी गई, ,
लोग चकित थे ये देख कर कि
मेँ फिर भी जी गई ।
गर मौका मिला कभी तो
अपनी चुप्पी लिखूंगी
लोग जिसे मेरा स्वार्थी
स्वभाव समझते रहे,
मेरे मनकी वो गुत्थी लिखूंगी,
लिखूंगी उन थकी रातों का हिसाब
जो नींद से ज्यादा
जिम्मेदारियों से दबी थीं।
और चेहरे की वो मुस्कान
जो मुझे सुखी दिखाती रहीं थी,
मै फतह का नहीं बस शिकस्त,
का हिसाब लिखूंगी,
जिनके कारण गिर गिर कर
मै हर बार मजबूत बनी थी।
अपना स्थान जीवन में
जिस दिन समझ पाऊंगी
पूरी कहानी लिखूंगी।
जब स्वयं को उतारने
लगुंगी कागज पर
सच के सिवा कुछ भी न लिखूंगी
प्रभा पारीक