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shekhar kharadi Idriya

shekhar kharadi Idriya Matrubharti Verified

@shekharkharadi6923
(1m)

बावरी छोरी...

थारो म्हारो छोरा..,
कोणी मजो न आवें..!
थारे चौखो इश्क़ करनो हैं
म्हारे पक्के हिवडै़ सूं..
तो आणा ठाठ-बाट से ,
ऊंची ऊंटनी पर बैठ'र
कदि उदेपुर, जयपुर
आंख्यों सूं मन्ने निरखने ,
सांसों सूं म्हारो पतों पूछणे ?
म्हें..घणी बाबरी छोरी !
रात-दिन बस थारी बाट जोवूं
टेम मिले तो आता अठै !
कदि रेतीले टीले पार
म्हारे सूणे- सूणे सपणो में
थांसू मुलाकात करणे।

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-१/१०/२०२६

- राजस्थानी की देशी भाषा का ठाठ-बाट

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शायराना प्रेम-कविता , तिथि-३०/१/२०२५

असमर्थ

न मैं महलों का राजा
न मैं खानदानी रईसज़ादा ,
न मैं इश्क़ में बातूनी
बस मैं सीधा-साधा ,
इक लेखक, कवि
कलम का पक्का पूजारी ,
रचना का सच्चा जोहरी
तलाश है मुझे कहानी की,
खोज है मुझे काव्य की
इस कलयुग के पाषाण हृदय में
किन्तु असमर्थ हूंँ !
उनकी असहनीय, अकल्पनीय
राक्षसी वृत्ति जानकर ,
अब मेरी दृढ़ शब्द रचना भी
शून्य, मौन, एकांत में ,
क्षण-क्षण कंपकंपाती रहीं
कण-कण धूमिल हुई ,
तुच्छ विचारधारा...
पूर्ण क्षतिग्रस्त होकर ,
मन-मस्तिष्क से ,
पतझड़ की तरह झड़ गई
पुष्प की तरह सूख गई
ऋतुचक्र की प्रक्रिया में ,
शुद्ध रुप से पुनजीर्वित होने ।।


©®- शेखर खराड़ी,
तिथि -२६-९-२०२५

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माँ...अम्बे की पदयात्रा

भाद्रमास की यह पदयात्रा
भक्तों का यह विराट प्रवाह ,
माँ अम्बे की पावन चरणों में
अंबाजी की ओर चलता रहा ।

हर एक भक्त का शुद्ध मन
अरावली के कठिन पथ पर ,
गब्बर की ऊँची छाँव तले
लाखों पाँव स्वयं बढ़ते रहे ।

जहा माँ ने मन से पुकारा
वहा भक्त खिंचा चला आया ,
निरंतर चलता रहा श्रद्धालु
पैरों में छालों की तीव्र पीड़ा ।

मुख पर सदैव माँ का नाम
तन बेशक थककर चूर हुआ ,
पर मन कभी हार न मानें
आँखों में बस एक ही सपना ।

दिल में बस दर्शन की प्यास
बाहर विकट परिस्थिति में भी ,
जाग रहा भीतर दृढ़ विश्वास
हाथों में पवित्र ध्वजा थामें ।

लाल चुनर माथे पर बाँधे
जुबां पर अटूट श्रद्धा से ,
' बोल मारी अम्बे, जय..जय..अम्बे ' का
मधुर सूर सर्वत्र गूँज उठा ।

झुंड के झुंड आगे बढ़ते रहे
बूढ़े-बच्चे और जवान
भूलकर अपना होश, ज्ञान ,
सब रथ के संग नाच रहे ।

सब संघ के साथ चल रहे
पथ-पथ पर आगे-पीछे ,
परस्पर मिल-जुलकर
एकता का स्नेह बाँटकर ।

जगह-जगह पर लगें हैं
निःशुल्क सेवा शिविर ,
पग-पग पर भोजन, विश्राम
कोई दबाता पाँव थके ।

कोई लगाता ज़ख्म पर मरहम
कोई आराम में ले माँ का नाम ,
निराली है मांँ तेरी यह लीला
सब भक्तजन तेरा स्मरण करें।

निस्वार्थ भाव की बहती गंगा
भक्त तेरी करुणा का आधार ,
अरासुरी के इस पावन स्थल पर
तेरा दिव्य और भव्य दर्शन पाने ।

सदैव निर्मल हृदय से
अनन्य भक्त की दृष्टि पड़ी ,
तेरे अनंत धाम पर
सारा कष्ट क्षणभर में मिटे ।

माँ..अम्बे के चरणों में
शीश झुककर धन्य हुआ ,
पुर्ण हुई असीम कृपा से
उसकी हर मनोकामना ।

शक्तिपीठ का यह महाकुंभ
भक्ती का यह अद्भुत संगम ,
श्रद्धा की अविरल धार
पा ले तू जीवन की नैया पार ।

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-२४/९/२०२६

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तुम्हें ढूंढता हूँ, सजल विधा

जब तुम गांव की बाट पर नंगे पांव चलती हो ,
तब मैं माटी की नर्म स्पर्श में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम पांव से ओश बिंदु को सहलाती हो ,
तब मैं शुद्ध बूंदो के चमक में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम मक्के की फसलों को सहलाती हो ,
तब मैं पत्तों की सरसराहट में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम पीले सरसों के खेतों में युंही दौड़ती हो ,
तब मैं श्वासों की तेज धड़कन में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम खुशी से पल्लू हवा में लहराती हो ,
तब मैं हवा के शांत झोंको में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम पके जुवार के हुँडा भूनकर खाती हो
तब मैं दरांँती से कटे ठूठ में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम चूल्हे पर बाजरे की रोटी पकाती हो ,
तब मैं खाने के पुराने स्वाद में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम कुएं से पानी रस्सी से निकालती हो ,
तब मैं प्यासा मुसाफ़िर बनकर तुम्हे ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम मटके को कमर से ठुमकाती हो ,
तब मैं अल्हड़ प्रेमी सा केवल तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम 'छिछोरा छोरा' कहकर डांटती हो ,
तब मैं स्नेह की गहरी झील में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम प्रतिक्षा की राह में घड़ीभर ठहरती हो ,
तब मैं मिलन की लंबी दूरी में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम जंगली पुष्प बालों में सहज लगाती हो ,
तब मैं खुश्बू की तीव्र खींचाव में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम साल-पलाश के पत्तों से कुटिया बनाती हो ,
तब मैं प्रकृति की असीम सादगी में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |


©®- शेखर खराड़ी
तिथि- ७-९-२०२६

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बेवकूफ़ बंदर - हास्य-व्यंग्य विधा

हम तेरे प्यार में पक्के बेवकूफ़ बंदर
दिल के बजाए दिमाग़ से हैं घनचक्कर ,
मन के बिना तेरे आंगन के घुम्मकड़
तेरी छत पर कूद-कूद कर हल्ला मचाएंगे ,
तेरे बाग-बगीचों में ऊधम मचाएंगे
तेरे गमलों के पौधों को उखाड़ फेंकेंगे |

हम तेरे प्यार में पक्के बेवकूफ़ बंदर
मंदिर के बजाय तेरी पूजा-पाठ करेगें ,
पेट भरकर तेरा व्रत उपवास करेगें
तेरी गली में भीख माग उपवास तोडेंगे ,
गधे पर उल्टी शान-शौकत से बैठकर
फटे हाल में केवल तुम्हें मिलने आएंगे |


हम तेरे प्यार में पक्के बेवकूफ़ बंदर
शांति छोड़ हुप..हुप.. चिल्लाएंगे ,
तेरे हाथों के डंडे शौक से खाएंगे
तेरे नाम का टैटू सीने पर बनाएंगे ,
तेरी डांट पर जोर-जोर से हंसेंगे
तेरे नखरें सात समुंदर पार उठाएंगे |

हम तेरे प्यार में पक्के बेवकूफ़ बंदर
गले में टाई की जगह रस्सी लटकाएंगे ,
तन पे शर्ट की जगह जंगली पत्ते लपेटेंगे
पाउडर की जगह चेहरे पर कालिख लगाएंगे ,
तेरी पुरानी सैंन्डल गले में अदब से पहनेंगे
पूरे शहर को तेरा दिवाना मंजनू बताएंगे |

क्योंकी, हम तो हर जगह पे ठहरे फालतु ,
बस तेरे प्यार में हम पक्के बेवकूफ़ बंजर
दिन भर बस मदारी के भालू जैसा नाचेंगे ,
तेरे इशारों पर पिंजरे का तोता जैसा चहकेंगे
दौडेगें तेरे पीछे हमेशा हम दुम हिलाकर ,
घुमेंगे तेरे आगे-पीछे पालतू जानवर जैसा ||


©®- शेखर खराड़ी
तिथि-५/९/२०२६

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खौफ़नाक मंजर...,,

तुफानी नदियां , दरकते पहाड़ नेपाल की धरती पर
वो मंजर नहीं खौफ़नाक तबाही का गहरा सदमा था |
क्षणभर में धरा ढह गई, मलबे के ढ़ेर में जीवन दब गया,
सदियों के सुंदर आशियानें तीनके के भांति बह गए |

हर तरफ़ बर्बादी के रूह कँपकँपाते करुण दृश्य थे |
बाहर पानी का जलजला था, भीतर गहरा सन्नाटा था |
हर एक दिलों में सिर्फ़ वो खौफ़ का काला पहरा था |
हर एक मासूम की पुकार में पीड़ा का गहरा घाव था |

पत्थर,पानी, माटी और टूटते पहाड़ने क्रूरता से प्रहार किया
सबकुछ सैकड़ोें ने ख़ूबसूरत सपनों को युंही उजाड़ दिया
न अब नींद का ठिकाना, बस आंखों में वही दृश्य का बसेरा ,
जाएं तो कहां जाएं कुदरत के आगे सब लाचार, बेबस थे |

अब पहाड़ खामोश हैं, नदियां अब भी सामने बहती हैं,
जो बरसों से जीवन की आधार थी, अब वह शून्य, स्तब्ध हैं।
बस वह गहन मंथन के लिए पीछे अनगिनत प्रश्न छोड़ गईं |
सर्वस्व विनाश करके इन्सान को भीतर से वो तोड़ गईं |

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-३०/८/२०२६

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" ૨૪ ઓગસ્ટ વિશ્વ ગુજરાતી ભાષા દિવસ "

ઈડરિયા ગઢની..,
લીલીછમ ડુંગરોની કોતરમાં
તારો સાદ મને સંભાળાય ક્યાં ?
છાનો છૂપો સંતા કુંકડી રમે...
વગડે વગડે ઘડીક ગોતવા કાઢે.
દૂર દૂર સંતાવાનો ઢોંગ કરે
ઝાડની ડાળી ડાળી થપ્પો કરે
તારો ખાલીખમ પ્રેમ મને ...,
લાગણીના વહેણમાં ખેંચતાણ કરે
હૃદયના ધબકારા વધારીને
પ્રત્યેક્ષ રૂબરૂ મળવમાં,
એક-બે નહીં પણ લાખો બાના કાઢે
તારા હાચા,ખોટા વાદા મને..,
આજકાલ ઈડરિયા ગઢ પર
હેડતા , ચઢતા ધૂંધળા લાગે
નીચે ઊતરતા-ઊતરતા,
આંખોમાં ભ્રમના ટેકરા લાગે.
તારો ખાલીખમ પ્રેમ મને...

©®- શેખર ખરાડી, ઈડર , ગુજરાત

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प्रेम की अहमियत...

तुम लाख चाहकर भी सच्चे प्रेम की अहमियत..
हर पल, हर घड़ी, हर दिन, हर साल भूला नहीं पाओगी
चाहकर भी मन से मेरी छवि मिटा नहीं पाओगी |
क्योंकि तुम्हारी धड़कन में मेरा ही स्पंदन मिलेगा
चाहे मेरा अस्तित्व पैरों तले रौंद भी डालो ,
चाहे मेरा स्नेह के ढ़ेर सारे पत्र जला भी डालो
चाहे मेरे मन्नत के धागे तुरंत तोड़ भी डालो,
मैं फिर भी एक पुष्प बनकर सदा ही प्रिये..
तेरी ही राह में खिल जाऊंगा |
चाहे तुम जितनी भी दूर चली जाओगी
मैं उतना ही तुम्हारे पास चला आऊंगा |
चाहे तुम जितनी भी नाराज़ क्यों न हो ?
मैं उतना ही तुम्हें मनाने दौड़ता चला आऊंगा |
चाहे तुम मेरी प्रत्येक स्मृति हृदय से निकाल दों..!
फिर भी अपने अंर्तमन में मेरा ही एहसास पाओगी ,
हर धड़कन में मेरी ही आहट सून पाओगी
हर सांस में मेरी सांस तुम्हें मिलेगी |
मेरा वजूद मिटेगा पर मेरी अनुभूति नहीं मिटेगी ,
मेरा ख्व़ाब टूटेगा पर मेरी गहरी संवेदना नहीं मिटेगी
समय बीत जाएगा पर मेरी यह प्रीत कभी नहीं छूटेगी ,
तुम चाहो मुझे विस्मृत कर देना संसार की भांति..
पर मेरे प्रेम की छाया सदैव जिंदा रहेगी तुम्हारे भीतर
मेरे काव्य की एक एक पंक्ति सिर्फ़ तुम्हें पुकारेंगी |
मेरे चक्षु की एक एक दृष्टि सिर्फ़ तुम्हें ढूढ़ेगी,
केवल मृत्यु की अनंत गहराइ तक ||

©®- शेखर खराड़ी

तिथि- २२/८/२०२६

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अंगुलिमाल ( उल्टा पिरामिड़ काव्य श्रेणीं )

अनंत करुणा का निर्मल-स्वच्छ भाव
एक हत्यारे के हृदय से टकराकर ,
वो घमंड़ क्षणभर में मिट गया |
क्रूर हिंसा के मार्ग से रूठकर ,
अंगुलियों के माला से छूटकर
बुद्ध की शांत छवि देखकर ,
तुरंत नया जीवन पाकर |
किन्तु पश्चपात से ,
अंगुलिमाल
भीतर
रोता
हैं।

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-२१/८/२०२६

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