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Shivam Dhuriya

Shivam Dhuriya

@shivamdhuriya291955
(358)

कुछ पंक्तियाँ पढ़ी और डूबने सा लगा
वक्त ठहरा , आसमां चलने सा लगा
जो सोचकर आया था यहाँ ,
वो अब गलत सा लगा
इस बार शायद ...
कोई अपना सा लगा ।।







- Shivam Dhuriya

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​तुम्हारे साथ ज़रा लम्हें बिताने पर
समय का यूँ गुज़रना,
लगता है जैसे...
​मेरी घड़ी को तुमसे 'रश्क' और
मुझे 'इश्क़' होने लगा है ।।

(रश्क = ईर्ष्या)



- Shivam D.

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न जाने क्यूँ चाँद से एक रिश्ता सा लगता है
इसे देखते ही दिल के अरमाँ,
जुबाँ पे उछलने लगता हैं l
और क्या कहूं, इस सितारे के बारे में
ये हम, तो चाँद तुम सा लगता है ll







- Shivam Dhuriya

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बहुत गुरूर था सड़कों को अपनी लंबाई पे...
मैंने इसे कदमों से पैदल ही नाप दिया था।
​मैं कभी भूख से व्याकुल, तो कभी पानी की तलाश में था,
कहीं बच्चों के पैरों में दर्द, तो कहीं माताओं की आँख में पानी था॥

कभी पैरों में चप्पल थी, नहीं तो नंगे पैरों से दौड़ लगाया था
अपनों के लिए ही दूर गया था,
आज अपनों के लिए ही भागा था॥

कभी कुछ मिला तो खाया नहीं तो भूख को गले लगाया था,
एक 'काल' से बचने की चिंता में मग्न...
'मति' का मारा मैं वहाँ क्यों सोने को जा रहा था?
​अब मुझे क्या पता, कि दूसरे 'काल' को वहीं से गुज़र के जाना था,
शायद भूल गया था कि 'काल को हराना' मुश्किल ही नहीं,
नामुमकिन के बराबर था॥

और कोई नहीं... मैं देश का एक गरीब और अब तो मरा हुआ आदमी था,
जो 'शिवम्' के हाथ से लिखकर आपको कुछ याद दिलाने वापस आया था!!

दिनांक-08/05/2020
(औरंगाबाद रेल्वेट्रैक हादसा)

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​ये मेरा दिल है जनाब
कोई धर्मशाला नहीं,
यहाँ आने वाले लोग जाते नहीं,
'बस' जाते हैं...

"शायद हम बड़े हो गए हैं"

आज सुबह सुबह जब बच्चों की पीठ में टंगे बस्ते और उनकी ड्रेस देखता हूँ... तो लगता है "शायद हम बड़े ही गए हैं"।
आज जब बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए उनकी आया जी आवाज देती हैं तो भाग कर बाहर देखता हूँ और ढूँढ़ता हूँ कि उनकी आवाज में शायद मेरा भी नाम हो... पर... लगता है "शायद हम बड़े हो गए हैं"।
आज जब कोई बच्चा स्कूल जाने में रोता है, उसकी आँखों में आँसू और खूब सारी आवाज होती हैं... तो लगता हैं... "शायद हम बड़े हो गए हैं"।
आज जब दुकानों में बच्चे ₹5 लेके जाते हैं और दुकान वाले से कहते हैं - ₹1 की ये, एक रुपये की वो, अरे नहीं नहीं... ₹2 की ये वाली टॉफी... तो लगता हैं... "शायद हम बड़े हो गए हैं"।
आज भी जब पापा ऑफिस से घर आते हैं तो बच्चों का ये चिल्लाना "पापा आ गए, पापा आ गए"... सुनकर लगता हैं "शायद हम बड़े हो गए हैं"।
आज भी जब किसी बच्चे को माँ के हाथ से खाना खाते देखता हूँ... तो लगता हैं "शायद हम बड़े ही गए हैं"।

आख़िर आज भी ये सब सोचकर, देखकर लिखने बैठता हूँ तो रोता हूँ और देखता हूँ कि अब आँखों में केवल आँसू ही आते हैं, कोई आवाज नहीं...
तो शायद...
शायद नहीं अब यकीन हो जाता हैं कि हाँ, "सच में हम बड़े हो गए हैं"....

(कॉलेज टाइम के विचार)

_Shivam D.

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