बहुत गुरूर था सड़कों को अपनी लंबाई पे...
मैंने इसे कदमों से पैदल ही नाप दिया था।
मैं कभी भूख से व्याकुल, तो कभी पानी की तलाश में था,
कहीं बच्चों के पैरों में दर्द, तो कहीं माताओं की आँख में पानी था॥
कभी पैरों में चप्पल थी, नहीं तो नंगे पैरों से दौड़ लगाया था
अपनों के लिए ही दूर गया था,
आज अपनों के लिए ही भागा था॥
कभी कुछ मिला तो खाया नहीं तो भूख को गले लगाया था,
एक 'काल' से बचने की चिंता में मग्न...
'मति' का मारा मैं वहाँ क्यों सोने को जा रहा था?
अब मुझे क्या पता, कि दूसरे 'काल' को वहीं से गुज़र के जाना था,
शायद भूल गया था कि 'काल को हराना' मुश्किल ही नहीं,
नामुमकिन के बराबर था॥
और कोई नहीं... मैं देश का एक गरीब और अब तो मरा हुआ आदमी था,
जो 'शिवम्' के हाथ से लिखकर आपको कुछ याद दिलाने वापस आया था!!
दिनांक-08/05/2020
(औरंगाबाद रेल्वेट्रैक हादसा)