hindi Best Moral Stories Books Free And Download PDF

Stories and books have been a fundamental part of human culture since the dawn of civilization, acting as a powerful tool for communication, education, and entertainment. Whether told around a campfire, written in ancient texts, or shared through modern media, Moral Stories in hindi books and stories have the unique ability to transcend time and space, connecting people across generations and cult...Read More


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  • विद्रोहिणी - 5

    नाटक शुरू हुए एक सप्ताह से अधिक समय हो चुका था । श्यामा के लिए निकल भागने का समय...

  • सुख – दुःख

    हर्तिषा धीरे -धीरे चलती हुई अपने सुख -दुःख करने की जगह आ बैठी। उसका मानना है कि...

  • संताप

    “आज उम्र के जिस पड़ाव पर बैठा हूँ, यहाँ आराम से बैठकर पीछे देखना सुविधाजनक लगने ल...

विद्रोहिणी - 5 By Brijmohan sharma

नाटक शुरू हुए एक सप्ताह से अधिक समय हो चुका था । श्यामा के लिए निकल भागने का समय आगया था।
आधी रात का समय था। चारों ओर श्याह अंधेरा था। कौशल्या व श्यामा की आंखों में नींद नहीं थी।...

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मंझली दीदी - 1 By Sarat Chandra Chattopadhyay

किशन की मां चने-मुरमुचे भून-भूनकर और रात-दिन चिन्ता करके वहुत ही गरीबी में उसे चौदह वर्ष का करके मर गई। किशन के लिए गांव में कही खडे होने के लिए भी जगह नहीं रही। उसकी सौतेली वडी बह...

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क्या यही प्यार है By Saroj Prajapati

सुबह सुबह बुआ जी का फोन आ गया। मैंने नमस्कार कर पूछा "बुआ जी आज कैसे आपको अपनी भतीजी की याद आ गई। " "अरे याद तो रोज ही आती है बस टाइम ही नहीं मिल पाता। अच्छा छोड़ ।आज मैंने एक खुश...

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बड़ी दीदी - 8 - अंतिम भाग By Sarat Chandra Chattopadhyay

कार्तिक के महीना समाप्ति पर है। थोड़ी-थोड़ी सर्दी पड़ने लगी है। सुरेन्द्र नाथ के ऊपर बाले कमरे में खिड़की के रास्ते प्रातःकाल के सूर्य का जो प्रकाश बिखर रहा है, सुरेन्द्र दिखाई दे...

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नोरा By Shweta Misra

एक दशक पहले यूरोप से अफ्रीका जब मेरा आना हुआ तो रुई के फाहे की तरह गिरते बर्फ की जगह यहाँ की ठंडी पुरवाई मेरे मन को लुभाती चली गयी मन हज़ार तरह की आशंकाओं से घिरा था l यूरोप का अत्य...

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सुख – दुःख By Upasna Siag

हर्तिषा धीरे -धीरे चलती हुई अपने सुख -दुःख करने की जगह आ बैठी। उसका मानना है कि घर में एक जगह ऐसी भी होनी चाहिए जहाँ इंसान अपना सुख -दुःख करके अपने आप से बतिया सके। इस बात पर उसके...

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संताप By Pritpal Kaur

“आज उम्र के जिस पड़ाव पर बैठा हूँ, यहाँ आराम से बैठकर पीछे देखना सुविधाजनक लगने लगा है. पिछले कई साल से अनुभव करने लगा हूँ, देह की, मन की आग अब वैसी तीव्रता से नहीं जलाती, जैसी तब थ...

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भाभी By Roopanjali singh parmar

आप मेरी शादी कराना चाहती हैं ना, ठीक है तो सुनो.. मैं भाभी से शादी करना चाहता हूँ.. चटाक.. (थप्पड़ की आवाज़ से कमरा गूंज गया) क्या बक रहा है विवेक! तेरा दिमाग़ तो ख़राब नहीं हो गया। भा...

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कौन है ये लोग ? By Akshay Mulchandani

भारत को जीतने के लिए इस ओवर में चाहिए केवल ७ रन ..!और ये पहली गेंद, और इस गेंद पर महेंद्र सिंह धोनी का लाजवाब छक्का और बस एक रन की ही दूरी बची है श्रृंखला को १-१ से बराबर करने में....

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बिटिया! बदल गई तुम By VIRENDER VEER MEHTA

बिटिया! बदल गई तुम मेरी प्यारी बिटिया, ढेरों प्रेम भरा स्नेह और आशीर्वाद। जानता हूँ अपने मेल बॉक्स में मेरी मेल देखकर तुम हैरान अवश्य हो रही होगी, क्योंकि शायद ही कभी मैंने तुम्हें...

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लाइफ़ @ ट्विस्ट एन्ड टर्न. कॉम - 20 - Last Part By Neelam Kulshreshtha

मीशा आज अब तक कमरे से क्यों नहीं निकल रही है ? दामिनी ने जाकर उसके कमरे को नॉक किया मीशा फ़ोन पर बात कर रही थी, बहुत गुस्से में लग रही थी उसने ने सुना, ``कह दिया न मुझे एम बी ए...

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इंद्रजाल By Shailendra Chauhan

शैलेन्द्र चौहान उनके हाथों में जब-तब एक लॉलीपॉप रहता।अक्सर तो वे अपने हाथों का उपयोग कुछ लेने के लिए ही करते थे परंतु जब भी वे अपने आसपास किसी भोले-भाले शरीफ़ आदमी को देखते तो उनके...

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समझोते By Upasna Siag

माँ ! आज आप सुरभि आंटी के पास जरूर जा कर आना ! मानसी ने मुझसे कहा।
अब सुरभि क्या करेगी ? पढाई तुमने करनी है। जिसमें रूचि हो वह विषय लो ! मैं कुछ कहती इससे पहले मानसी के पापा ब...

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अनुराधा - 6 By Sarat Chandra Chattopadhyay

इसीत से तरह पांच-दिन बीत गए। स्त्रियों के आदर और देख-रेख का चित्र विजय के मन में आरंभ से ही अस्पष्ट था। अपनी मां को वह आरंभ से ही अस्वस्थ और अकुशल देखता आया है। एक गृहणी के नाते वह...

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सांच कि, झूठ By Sapna Singh

रंभा ने गोबर के ढे़र में पानी का छींटा मारकर सींचा और उन्हें सानने के लिये अपने दोनों हाथ उसमें घुसेड़ दिये। घिन बर आई, पिछले कुछ वर्षों में ये सब काम करने की आदत कहाॅँ रह गई है? हि...

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वह रात किधर निकल गई By Geeta Shri

वह रात नसीबोवाली नहीं थी.
देर रात फोन पर झगड़ने के बाद बिंदू किसी काम के लायक नहीं बची थी।
आयशा और वैभव दोनों दूर से सब देख समझ रहे थे, खामोशी से। आयशा ने कई बार कूल..रहने का इशा...

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अश्लील क्या है.. नज़रिया या कपड़े?? By Roopanjali singh parmar

एक शब्द है जिस पर अक्सर ही बहुत सारे विचार पढ़ने या सुनने को मिलते हैं.. और वो शब्द है 'अश्लीलता'। अगर चर्चा अश्लीलता पर होगी तो महिलाओं का ज़िक्र होना स्वाभाविक है। कुछ समय...

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छलिया कौन By Dr. Vandana Gupta

सब कहते हैं और हमने भी सुना है कि जिंदगी एक अबूझ पहेली है। जिंदगी के रंग कई रे.…. और सबसे गहरा रंग है प्यार का.... और ये रंग गहरा होने के बाद भी अलग अलग तरह से चढ़ता है और कई कई...

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अतृप्त रिश्ते By r k lal

अतृप्त रिश्तेआर 0 के0 लालअरे रुकना जरा, पहचाना तुमने। प्रभात ने उसे रोकते हुए कहा। शोभा ने भी आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, - "व्हाट ए प्लेज़ेंट सरप्राइज, तुम्हें देखकर। में कैसे न...

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यूँ ही By Pranava Bharti

एक उम्र होती है न जो पीछे जितनी छूटती जाती है, उतनी ही परछाईं की तरफ़ दौड़ लगाती है जैसे ---उसकी उम्र भी शायद कुछ ऎसी ही है शायद इसलिए, कभी-कभी अपना ही स्वभाव समझ नहीं आता या यूँ क...

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माँ से ही मायका होता है By Upasna Siag

कब्रें विच्चों बोल नी माए
दुःख सुःख धी नाल फोल नी माए
आंवा तां मैं आमा माए
आमा केहरे चावा नाल
माँ मैं मुड़ नहीं पैके औणा
पेके हुंदे माँवा नाल।
सुरजीत बिंदरखिया का यह गीत हस्पत...

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पगडंडी. By Pritpal Kaur

हंस में प्रकाशित
स्कूटर की चाबी पकड़ाते समय उसकी अंगुलिओं के बढ़े हुए सुडोल नाखून उसकी हथेली पर छू गए थे. झटका सा लगा जैसे. सारा बदन झनझना उठा. भीतर तक काँप गया. नीचे झुके उसके चेहर...

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ब्लाइंड डेट By Geeta Shri

वह मुस्कुराने की कोशिश कर रहा है। चेहरे पर स्याह रंगत वह देख समझ सकती है। क्या ईशान भी उसके चेहरे को पढ़ पा रहा है। विदा की बेला में वह ज्यादा बात नहीं करना चाहती। न खुद बोलना चाहत...

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परिणीता - 12 - अंतिम भाग By Sarat Chandra Chattopadhyay

माँ को लेकर शेखर वापस आ गया, परंतु अभी शादी के दस बाहर दिन शेष थे।
दो-तीन दिन व्यतीत हो जाने पर, ललिता सवेरे के समय भुवनेश्वरी के पास बैठी हुर्इ, कोर्इ चीज उठा-उठाकर टोकरी में रख...

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सिंगल पेरेंटिंग By r k lal

सिंगल पेरेंटिंग आर 0 के0 लाल"अभी तो तुम मायके गई थी, फिर जाने की तैयारी कर ली हो। आखिर तुम्हारी हमारे प्रति कोई जिम्मेदारी है या नहीं। तुम्हारी इस घर में शादी हुई है। जब देखो तब मा...

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आधा सुख-आधा चांद By Rajesh Bhatnagar

घड़ी ने रात के बाहर बजा दिये । घड़ी का अलारम टन...टन....टन... करता हुआ बारह बार बोलकर खामोष हो गया और इसी खामोषी के साथ रात का भयावह पहर शुरू हो गया । बैडरूम के बीचों-बीच पड़े डबल बैड...

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टांगें By Pritpal Kaur

कनिका ने कांपते हुए अपने घुटने ढके और वेटर का बेसब्री से इंतजार करने लगी. इस वक़्त वह साउथ दिल्ली के एक पॉश रेस्तरां में अपने कुछ मित्रों के साथ शाम के खाने का आनंद ले रही थी.
अक्ट...

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विद्रोहिणी - 5 By Brijmohan sharma

नाटक शुरू हुए एक सप्ताह से अधिक समय हो चुका था । श्यामा के लिए निकल भागने का समय आगया था।
आधी रात का समय था। चारों ओर श्याह अंधेरा था। कौशल्या व श्यामा की आंखों में नींद नहीं थी।...

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मंझली दीदी - 1 By Sarat Chandra Chattopadhyay

किशन की मां चने-मुरमुचे भून-भूनकर और रात-दिन चिन्ता करके वहुत ही गरीबी में उसे चौदह वर्ष का करके मर गई। किशन के लिए गांव में कही खडे होने के लिए भी जगह नहीं रही। उसकी सौतेली वडी बह...

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क्या यही प्यार है By Saroj Prajapati

सुबह सुबह बुआ जी का फोन आ गया। मैंने नमस्कार कर पूछा "बुआ जी आज कैसे आपको अपनी भतीजी की याद आ गई। " "अरे याद तो रोज ही आती है बस टाइम ही नहीं मिल पाता। अच्छा छोड़ ।आज मैंने एक खुश...

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बड़ी दीदी - 8 - अंतिम भाग By Sarat Chandra Chattopadhyay

कार्तिक के महीना समाप्ति पर है। थोड़ी-थोड़ी सर्दी पड़ने लगी है। सुरेन्द्र नाथ के ऊपर बाले कमरे में खिड़की के रास्ते प्रातःकाल के सूर्य का जो प्रकाश बिखर रहा है, सुरेन्द्र दिखाई दे...

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नोरा By Shweta Misra

एक दशक पहले यूरोप से अफ्रीका जब मेरा आना हुआ तो रुई के फाहे की तरह गिरते बर्फ की जगह यहाँ की ठंडी पुरवाई मेरे मन को लुभाती चली गयी मन हज़ार तरह की आशंकाओं से घिरा था l यूरोप का अत्य...

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सुख – दुःख By Upasna Siag

हर्तिषा धीरे -धीरे चलती हुई अपने सुख -दुःख करने की जगह आ बैठी। उसका मानना है कि घर में एक जगह ऐसी भी होनी चाहिए जहाँ इंसान अपना सुख -दुःख करके अपने आप से बतिया सके। इस बात पर उसके...

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संताप By Pritpal Kaur

“आज उम्र के जिस पड़ाव पर बैठा हूँ, यहाँ आराम से बैठकर पीछे देखना सुविधाजनक लगने लगा है. पिछले कई साल से अनुभव करने लगा हूँ, देह की, मन की आग अब वैसी तीव्रता से नहीं जलाती, जैसी तब थ...

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भाभी By Roopanjali singh parmar

आप मेरी शादी कराना चाहती हैं ना, ठीक है तो सुनो.. मैं भाभी से शादी करना चाहता हूँ.. चटाक.. (थप्पड़ की आवाज़ से कमरा गूंज गया) क्या बक रहा है विवेक! तेरा दिमाग़ तो ख़राब नहीं हो गया। भा...

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कौन है ये लोग ? By Akshay Mulchandani

भारत को जीतने के लिए इस ओवर में चाहिए केवल ७ रन ..!और ये पहली गेंद, और इस गेंद पर महेंद्र सिंह धोनी का लाजवाब छक्का और बस एक रन की ही दूरी बची है श्रृंखला को १-१ से बराबर करने में....

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बिटिया! बदल गई तुम By VIRENDER VEER MEHTA

बिटिया! बदल गई तुम मेरी प्यारी बिटिया, ढेरों प्रेम भरा स्नेह और आशीर्वाद। जानता हूँ अपने मेल बॉक्स में मेरी मेल देखकर तुम हैरान अवश्य हो रही होगी, क्योंकि शायद ही कभी मैंने तुम्हें...

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लाइफ़ @ ट्विस्ट एन्ड टर्न. कॉम - 20 - Last Part By Neelam Kulshreshtha

मीशा आज अब तक कमरे से क्यों नहीं निकल रही है ? दामिनी ने जाकर उसके कमरे को नॉक किया मीशा फ़ोन पर बात कर रही थी, बहुत गुस्से में लग रही थी उसने ने सुना, ``कह दिया न मुझे एम बी ए...

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इंद्रजाल By Shailendra Chauhan

शैलेन्द्र चौहान उनके हाथों में जब-तब एक लॉलीपॉप रहता।अक्सर तो वे अपने हाथों का उपयोग कुछ लेने के लिए ही करते थे परंतु जब भी वे अपने आसपास किसी भोले-भाले शरीफ़ आदमी को देखते तो उनके...

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समझोते By Upasna Siag

माँ ! आज आप सुरभि आंटी के पास जरूर जा कर आना ! मानसी ने मुझसे कहा।
अब सुरभि क्या करेगी ? पढाई तुमने करनी है। जिसमें रूचि हो वह विषय लो ! मैं कुछ कहती इससे पहले मानसी के पापा ब...

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अनुराधा - 6 By Sarat Chandra Chattopadhyay

इसीत से तरह पांच-दिन बीत गए। स्त्रियों के आदर और देख-रेख का चित्र विजय के मन में आरंभ से ही अस्पष्ट था। अपनी मां को वह आरंभ से ही अस्वस्थ और अकुशल देखता आया है। एक गृहणी के नाते वह...

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सांच कि, झूठ By Sapna Singh

रंभा ने गोबर के ढे़र में पानी का छींटा मारकर सींचा और उन्हें सानने के लिये अपने दोनों हाथ उसमें घुसेड़ दिये। घिन बर आई, पिछले कुछ वर्षों में ये सब काम करने की आदत कहाॅँ रह गई है? हि...

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वह रात किधर निकल गई By Geeta Shri

वह रात नसीबोवाली नहीं थी.
देर रात फोन पर झगड़ने के बाद बिंदू किसी काम के लायक नहीं बची थी।
आयशा और वैभव दोनों दूर से सब देख समझ रहे थे, खामोशी से। आयशा ने कई बार कूल..रहने का इशा...

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अश्लील क्या है.. नज़रिया या कपड़े?? By Roopanjali singh parmar

एक शब्द है जिस पर अक्सर ही बहुत सारे विचार पढ़ने या सुनने को मिलते हैं.. और वो शब्द है 'अश्लीलता'। अगर चर्चा अश्लीलता पर होगी तो महिलाओं का ज़िक्र होना स्वाभाविक है। कुछ समय...

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छलिया कौन By Dr. Vandana Gupta

सब कहते हैं और हमने भी सुना है कि जिंदगी एक अबूझ पहेली है। जिंदगी के रंग कई रे.…. और सबसे गहरा रंग है प्यार का.... और ये रंग गहरा होने के बाद भी अलग अलग तरह से चढ़ता है और कई कई...

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अतृप्त रिश्ते By r k lal

अतृप्त रिश्तेआर 0 के0 लालअरे रुकना जरा, पहचाना तुमने। प्रभात ने उसे रोकते हुए कहा। शोभा ने भी आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, - "व्हाट ए प्लेज़ेंट सरप्राइज, तुम्हें देखकर। में कैसे न...

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यूँ ही By Pranava Bharti

एक उम्र होती है न जो पीछे जितनी छूटती जाती है, उतनी ही परछाईं की तरफ़ दौड़ लगाती है जैसे ---उसकी उम्र भी शायद कुछ ऎसी ही है शायद इसलिए, कभी-कभी अपना ही स्वभाव समझ नहीं आता या यूँ क...

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माँ से ही मायका होता है By Upasna Siag

कब्रें विच्चों बोल नी माए
दुःख सुःख धी नाल फोल नी माए
आंवा तां मैं आमा माए
आमा केहरे चावा नाल
माँ मैं मुड़ नहीं पैके औणा
पेके हुंदे माँवा नाल।
सुरजीत बिंदरखिया का यह गीत हस्पत...

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पगडंडी. By Pritpal Kaur

हंस में प्रकाशित
स्कूटर की चाबी पकड़ाते समय उसकी अंगुलिओं के बढ़े हुए सुडोल नाखून उसकी हथेली पर छू गए थे. झटका सा लगा जैसे. सारा बदन झनझना उठा. भीतर तक काँप गया. नीचे झुके उसके चेहर...

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ब्लाइंड डेट By Geeta Shri

वह मुस्कुराने की कोशिश कर रहा है। चेहरे पर स्याह रंगत वह देख समझ सकती है। क्या ईशान भी उसके चेहरे को पढ़ पा रहा है। विदा की बेला में वह ज्यादा बात नहीं करना चाहती। न खुद बोलना चाहत...

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परिणीता - 12 - अंतिम भाग By Sarat Chandra Chattopadhyay

माँ को लेकर शेखर वापस आ गया, परंतु अभी शादी के दस बाहर दिन शेष थे।
दो-तीन दिन व्यतीत हो जाने पर, ललिता सवेरे के समय भुवनेश्वरी के पास बैठी हुर्इ, कोर्इ चीज उठा-उठाकर टोकरी में रख...

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सिंगल पेरेंटिंग By r k lal

सिंगल पेरेंटिंग आर 0 के0 लाल"अभी तो तुम मायके गई थी, फिर जाने की तैयारी कर ली हो। आखिर तुम्हारी हमारे प्रति कोई जिम्मेदारी है या नहीं। तुम्हारी इस घर में शादी हुई है। जब देखो तब मा...

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आधा सुख-आधा चांद By Rajesh Bhatnagar

घड़ी ने रात के बाहर बजा दिये । घड़ी का अलारम टन...टन....टन... करता हुआ बारह बार बोलकर खामोष हो गया और इसी खामोषी के साथ रात का भयावह पहर शुरू हो गया । बैडरूम के बीचों-बीच पड़े डबल बैड...

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टांगें By Pritpal Kaur

कनिका ने कांपते हुए अपने घुटने ढके और वेटर का बेसब्री से इंतजार करने लगी. इस वक़्त वह साउथ दिल्ली के एक पॉश रेस्तरां में अपने कुछ मित्रों के साथ शाम के खाने का आनंद ले रही थी.
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