भूल-98
‘लोकतंत्र’ नेहरू की देन?—असत्य है
आपको यदा-कदा ही ऐसे लोग मिलेंगे, जो नेहरू का विरोध करने का प्रयास करें और आपको याद दिलवा दें कि ऐसा सिर्फ नेहरू के लोकतंत्र की ही बदौलत है, जिसका आनंद आज सभी भारतीय लूट रहे हैं और इसमें उनकी आलोचना करना भी शामिल है। क्या यह विरोधाभास जमता है?
अंग्रेजों के राज में भी भारत में चुनाव होते थे। कांग्रेस ने सन् 1937 में हुए चुनावों में न सिर्फ जीत हासिल की, बल्कि कई राज्यों में तो मंत्रिमंडल का भी गठन किया। चुनावों के बाद हाथ में सत्ता आने के चलते वे इतने अधिक भ्रष्ट हो चुके थे कि गांधी ने स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस को भंग करने की मंशा जाहिर की थी। स्वतंत्रता से पूर्व अंतिम चुनाव वर्ष 1946 में आयोजित हुए थे। स्वतंत्र भारत को विरासत में कई लोकतांत्रिक संस्थाएँ मिलीं, जिनमें चुनाव मशीनरी भी शामिल थी; आवश्यकता थी तो बस, सबको मताधिकार के लिए बढ़ावा देने की।
वास्तव में, वह डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में तैयार किया गया संविधान था, जिसे कई योग्य और अनुभवी लोगों से सुसज्जित संविधान सभा द्वारा पारित किया गया था, जिसकी अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र प्रसाद कर रहे थे, जिसने सबको अपने मताधिकार का प्रयोग करने का हक और लोकतांत्रिक प्रणाली प्रदान की थी। तो फिर, सिर्फ नेहरू को इसका श्रेय कैसे दिया जा सकता है?
सन् 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नेहरू का खुद का चुनाव, जिसके परिणामस्वरूप वे स्वतंत्रता-प्राप्ति पर भारत के पहले प्रधानमंत्री बने, पूरी तरह से अलोकतांत्रिक था। (अधिक जानकारी के लिए कृपया भूल#6 देखें।)
देश के दीर्घकालिक हित में एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक व्यक्ति ने एक बहु-दलीय या कम-से-कम द्वि-दलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पूरी मेहनत से काम किया होता। हालाँकि, यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे या उनका वंश हमेशा सत्ता में बना रहे, नेहरू ने यह तय किया कि भारत का नवजात लोकतंत्र एक मजबूत विपक्ष से हमेशा वंचित ही रहे। उन्होंने विपक्ष को बदनाम करने, उसका अनादर करने और उसे कमजोर करने के तमाम प्रयास किए।
आखिर, ऐसा कैसे संभव है कि भारत में वंशवादी राजनीति (अगली भूल) को प्रारंभ करनेवाले नेहरू को लोकतांत्रिक व्यक्ति कहा जाए? भारत के सामने सबसे बड़ा खतरा भ्रष्टाचार या शासन या सुधारों की कमी या बाबूवाद नहीं है, बल्कि वंशवाद है; क्योंकि वह इस सबके मूल में है। नेहरू ने भारत को वास्तव में एक परिपक्व लोकतंत्र बनाने की दिशा में कभी काम ही नहीं किया। उन्होंने सारी मेहनत उसे एक वंशानुगत, नेहरू-वंशवादी लोकतंत्र में बदलने के लिए की थी। ऐसा करने के क्रम में भारत भाई-भतीजावाद तंत्र, सामंती तंत्र और चमचा तंत्र में बदल गया।
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भूल-99
नेहरू ने लोकतंत्र को नहीं, बल्कि वंशतंत्र को आगे बढ़ाया
मोतीलाल ने जवाहरलाल को बढ़ावा दिया
जवाहरलाल नेहरू को उनके पिता मोतीलाल नेहरू ने गलत तरीके से आगे बढ़ाया था और जवाहरलाल ने सच्ची वंशवादी परंपरा का पालन करते हुए इंदिरा को आगे बढ़ाया, जिन्होंने बदले में और अधिक बेशर्मी से अपनी संतान को आगे बढ़ाया। मोतीलाल नेहरू जब सन् 1929 में कांग्स रे के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए तो उन्होंने गांधी के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया कि उनके बाद गद्दी उनके बेटे को मिले, वह भी उनसे कहीं अधिक वरिष्ठ और सक्षम लोगों को दरकिनार करते हुए। (कृपया भूल#1 देखें)
नेहरू ने अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित को आगे बढ़ाया
यह जानने के लिए कि नेहरू ने कैसे अपनी बहन का पक्ष लिया, कृपया भूल#11 देखें। एस. निजलिंगप्पा ने अपनी पुस्तक ‘माय लाइफ ऐंड पॉलिटिक्स’ में लिखा—
“मुझे तब का एक और मामला याद आता है, जब डॉ. एस. राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति थे। मैं जब भी दिल्ली में होता, उनसे मुलाकात करने जरूर जाता। वे मेरे साथ अपनी बातचीत में, जैसाकि मुझे लगता है, काफी दोस्ताना और खुले रहते थे। एक दिन जब मैं उनके पास पहुँचा तो उन्होंने मुझसे कहा, ‘निजलिंगप्पा, आज मैंने अपने अधिकारों का प्रयोग किया। आप जानते हैं, क्यों?’ उन्होंने आगे कहा, ‘पं. नेहरू मेरे पास आते हैं और मुझसे चाहते हैं कि मैं उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित को भारत का उप-राष्ट्रपति बना दूँ। मुझे उनसे कहना पड़ा—‘आप भारत के प्रधानमंत्री हैं, आपकी बेटी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष है और आप चाहते हैं कि आपकी बहन उप-राष्ट्रपति बन जाए। लोग क्या कहेंगे? मैं ऐसा नहीं कर सकता।’...मैंने अपने अधिकारों का इस्तेमाल किया और उन्हें वापस भेज दिया।’ मुझे ऐसा लगता है कि नेहरू ने अपनी बहन को इस पद को देने का वादा किया था और जब वह पद उन्हें नहीं मिल सका तो वे अपने भाई से बेहद नाराज हुईं। वे जब सवेरे के नाश्तेपर मेरे घर आईं, तब उन्होंने मुझसे शिकायत की और कहा कि उनके भाई ने अपना वादा पूरा नहीं किया। मैंने उन्हें वह बताया ही नहीं, जो मुझे डॉ. एस. राधाकृष्णन ने बताया था।” (निज/102)
नेहरू ने इंदिरा गांधी को आगे बढ़ाया
हालाँकि, इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के लिए बहुत काम किया था, इसके बावजूद उन्हें सन् 1955 में सीधे कांग्रेस कार्यसमिति का सदस्य नियुक्त कर दिया गया—नीचे से ऊपर पहुँचने के बजाय सीधे ऊपर से प्रवेश। सन् 1957 में इंदिरा को शक्तिशाली केंद्रीय चुनाव समिति का सदस्य बना दिया गया।
दुर्गा दास अपनी पुस्तक में लिखते हैं—“सन् 1957 में ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में अपने साप्ताहिक कॉलम में उन्होंने लिखा था कि नेहरू अपनी बेटी को उत्तराधिकार के लिए तैयार कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने कॉलम को लिखने से पहले मौलाना आजाद से इस विषय में बात की थी और आजाद ने भी कहा था कि वे भी स्वतंत्र रूप से बिल्कुल इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं। यहाँ तक कि गोविंद बल्लभ पंत की भी बिल्कुल यही राय थी। बाद में जब नेहरू ने उस कॉलम को लेकर दुर्गा दास के सामने विरोध प्रकट किया तो नेहरू को शांत करने के लिए उन्होंने नेहरू को यह बात समझाई कि उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, वह इंदिरा के लिए अच्छा प्रचार करेगा और उन्हें अच्छे से पाँव जमाने में मदद करेगा। जिस पर नेहरू खुश हुए और मुसकरा दिए।” (डी.डी./370)
सन् 1958 में इंदिरा केंद्रीय संसदीय बोर्ड की सदस्य बनीं। नेहरू ने बोर्ड से खुद इस्तीफा देकर उनके लिए एक पद खाली कर दिया—एक चतुराई भरी चाल! इसके बाद सन् 1959 में सबको आश्चर्यचकित करते हुए वे कांग्रेस अध्यक्ष बन गईं और ऐसा हुआ परदे के पीछे चले एक गहन नाटक के बाद, जिसे नेहरू ने दूसरों के जरिए प्रबंधित किया था। नेहरू ने उनके अध्यक्ष बनाए जाने पर कहा था, “मुझे इंदिरा गांधी पर अपनी बेटी के रूप में, अपने कॉमरेड के रूप में और अब अपने नेता के रूप में गर्व है। मेरे लिए यह कहना कि मैं उससे प्रेम करता हूँ, अनावश्यक है। मुझे उसकी ईमानदारी और सच्चाई पर गर्व है।”
राजमोहन गांधी ने लिखा—“इस मोड़ पर इंदिरा गांधी, जवाहरलाल की बेटी, अचानक से पार्टी अध्यक्ष बना दी गईं। उनकी प्रतिभा अभी तक एक रहस्य ही थी और उन्हें पार्टी के कामकाज का भी कोई अनुभव नहीं था। नेहरू के कई सहयोगी इस पसंद से बेहद नाराज थे, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। सी.आर. (राजगोपालाचारी) बेहद नाराज थे।” (आर.जी.3/373)
कुलदीप नैयर ने लिखा—“मैंने यहीं पर पहली बार सुना था कि कांग्रेस अध्यक्ष यू.एन. ढेबर इस्तीफा दे रहे हैं और इंदिरा गांधी कमान सँभाल रही हैं। पंत ने विनोबा के आश्रम में तो नेहरू का समर्थन किया था, लेकिन सी.डब्ल्यू.सी. में नहीं। इंदिरा गांधी को पार्टी अध्यक्ष के रूप में नामित किया गया था। वे प्रत्यक्ष रूप से नेहरू की बेटी का विरोध न करने को लेकर पूरी तरह से सतर्क थे; लेकिन उन्होंने तर्क रखा कि उनका खराब स्वास्थ्य आड़े आ सकता है, क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्हें लंबी यात्राओं पर जाना पड़ सकता है। आवाज को ऊँचा करते हुए नेहरू ने पंत से कहा कि ‘वे हम दोनों से अधिक स्वस्थ हैं’ और काम को कहीं अधिक समय दे सकती हैं। इसके बाद के विचार-विमर्श, जैसाकि मैंने ध्यान दिया, उनके कार्यभार को सँभालने की तारीख नियत करने से संबंधित थे। यह पहली बार था, जब वंशवादी राजनीति सामने आई थी और कांग्रेस उसके बाद से ही बिना बदले शीर्ष पर नेहरू परिवार को रखने की उसी परिपाटी पर चल रही है। नेहरू की चलती तो वे प्रधानमंत्री के रूप में भी इंदिरा गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे, लेकिन उस समय केंद्र में देश की आजादी के लिए बलिदान और संघर्ष करनेवाले और कई नेता भी मौजूद थे।” (के.एन.)
इसके अलावा, नेहरू ने इंदिरा को सार्वजनिक हस्ती के रूप में विकसित करना प्रारंभ कर दिया। उन्हें एक आधिकारिक मेजबान की भूमिका देकर नेहरू ने उन्हें विदेशी गण्यमान्य हस्तियों और मेहमानों से रू-बरू करवाया। नेहरू ने उन्हें कई विदेशी दौरों पर भी भेजा, जैसे यूनेस्को के कार्यकारी बोर्ड में भारत की प्रतिनिधि बनाकर और अपने बदले में विदेशी दौरों पर भी।
सन् 1962 की पराजय के बाद और अपनी गिरती लोकप्रियता को देखते हुए नेहरू ने 1963 की ‘कामराज योजना’ को इस्तेमाल करके वरिष्ठों को इंदिरा के रास्ते से हटा दिया। मोरारजी देसाई, जिन्होंने उस समय तो विरोध नहीं किया, ने बाद में माइकल ब्रीजर को ‘कामराज योजना’ के बारे में बताया, “ऐसा लगता है कि इसका मकसद सिर्फ उन्हें (मोरारजी को) रास्ते से हटाना ही नहीं था, बल्कि प्रधानमंत्री के पद के लिए इंदिरा गांधी का रास्ता भी साफ करना था, बिल्कुल वैसे ही जैसे मोतीलाल (नेहरू) ने कांग्रेस का अध्यक्ष पद उन्हें (जवाहरलाल को) सौंपा था।” (आई.एम.2)
आचार्य कृपलानी का मानना था कि देश की सभी बुराइयों की जड़ ऊपर से ही निकलती है और यह भी कि संरक्षण और शक्ति का दुरुपयोग करने के मामले में नेहरू सबसे आगे हैं। (डी.डी./371)
ऐसा भी कहा जा सकता है कि नेहरू ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री नहीं बनाया, बल्कि वे तो सिर्फ इस दिशा में काम कर रहे थे। हालाँकि, वे अपनी इस अभिलाषा के पूरा होने से पहले ही गुजर गए। हालाँकि, वे पहले ही जमीनी काम पूरा कर चुके थे—उन्हें जरूरी अवसर प्रदान कर। लाल बहादुर शास्त्री ने खुद बताया था कि ‘पंडितजी के मन में उनकी बेटी हैं’।
कुलदीप नैयर लिखते हैं—“मैंने एक दिन शास्त्रीजी से पूछने की धृष्टता की, ‘आपके खयाल से नेहरू के मन में अपने उत्तराधिकारी के रूप में कौन बसा है?’ उन्होंने जवाब दिया, ‘उनके दिल में तो उनकी बेटी बसी है।’... निजलिंगप्पा का कहना है कि उन्हें इस बात का यकीन था कि नेहरू के मन में उत्तराधिकारी के रूप में उनकी बेटी हैं। उन्होंने 15 जुलाई, 1959 को अपनी डायरी में लिखा—‘नेहरू हमेशा से ही निश्चित रूप से और बड़ी शांति के साथ उन्हें प्रधानमंत्री के पद के लिए तैयार कर रहे थे’।” (के.एन.)
एम.ओ. मथाई ने लिखा—“कुछ साल पूर्व विजयलक्ष्मी ने मुझसे पूछा, ‘भाई (नेहरू) ने अपने जीवन के अंतिम दौर में मुझे पूरी तरह से क्यों छोड़ दिया?’ मैंने उस समय उस सवाल का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा और विषय को बदलने में कामयाब रहा। मैं इस अध्याय में पहले ही इसका कारण बता चुका हूँ। इसका दूसरा भाग यह है कि नेहरू अपनी बेटी, जो अभी काफी युवा थीं, के लिए एक और प्रतिद्वंद्वी खड़ा नहीं करना चाहते थे। इस बारे में और अधिक इंदिरा पर अध्याय में।” (मैक/142)
नेहरू ने वंशतंत्र—वंशवादी लोकतंत्र—की नींव रखी
मजबूत सामंती मानसिकता वाले एक देश पर थोपे गए लोकतंत्र के वंशतंत्र में बदल जाने की पूरी संभावना है, जब तक कि वे नेता, जो इसके प्रति समर्पित हैं, खुद को ऐसा सुनिश्चित करने के लिए समर्पित नहीं करते, वह भी खुद एक उदाहरण स्थापित करके और उचित व्यवस्था को लागू करके। नेहरुओं ने इसका बिल्लकु उलटा किया। नेहरू द्वारा शुरू की गई और बाद में पवित्र कर दी गई वंशवादी राजनीति तथा जिसे उनकी बेटी ने और भी अधिक बेशर्मी से परवान चढ़ाया, ने अब हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को पगं ु बना दिया है और ये अब जहर की तरह फलै गई है। मोतीलाल, जवाहरलाल और इंदिरा के पद-चिह्नों पर चलते हुए अधिकांश नेता अब अपने बच्चों को आगे बढ़ाते हैं। हम अब पहले से ही स्थापित हो चुके वंशतंत्र की चपेट में हैं! यह अब व्यापक रूप ले चुका है और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को बरबाद कर चुका है। बहुत जल्द समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था कुछ चुनिंदा राजवंशों के बीच सत्ता की लड़ाई बनकर रह जाएगी!
सिर्फ नेहरू के ही वारिस नहीं हैं, अब हमारे पास लगभग हर प्रदेश में उत्तराधिकारी मौजूद हैं। जम्मूव कश्मीर में अब्दुल्ला एवं उनके बेटे तथा मुफ्ती की बेटी; उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, उनके बेटे और परिवार; पंजाब में बादल और उनके बेटे; हरियाणा में चौटाला और उनके बेटे, हुड्डा और उनके बेटे; बिहार में लालू-राबड़ी और उनके बेटे; महाराष्ट्र में शरद पवार और उनकी बेटी तथा भतीजा, ठाकरे और उनके बेटे व भतीजे; आंध्र प्रदेश में वाई.एस.आर. का परिवार; तेलंगाना में के.सी.आर. और परिवार; तमिलनाडु में करुणानिधि और उनके बेटे; और कई अन्य राजनेताओं के जीवन-साथी, बेटे-बेटियाँ तथा अन्य रिश्तेदार। कई निर्वाचन क्षेत्र अब निजी जागीर हैं।
पैट्रिक फ्रेंच की पुस्तक ‘इंडिया : ए पोट्रेट’ (पी.एफ.2) में विस्तार से पेश किए गए एक अध्ययन के अनुसार, भारतीय संसद् में करीब 28.6 प्रतिशत सांसद एच.एम.पी.-वंशानुगत (हेरिडिटरी) सांसद हैं। इससे भी अधिक चौंकानेवाले आँकड़े हैं कि 40 साल या उससे कम उम्रवाले 66 सांसदों में से दो-तिहाई से अधिक एच.एम.पी. हैं, जबकि 30 साल से कम उम्र के सभी सांसद एच.एम.पी. हैं! अगर हम इसी हिसाब से आगे बढ़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं, जब हम स्वतंत्रता से पूर्व के ‘अच्छे’ दौर में पहुँच जाएँगे, जिसमें वंशानुगत राजा, महाराजा और राजकुमार शासन करते थे। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रवृत्ति को उस व्यक्ति द्वारा शुरू किया गया था, जिसने आजादी से पूर्व के दौर में राजाओं, महाराजाओं और सामंती व्यवस्था का सबसे मुखर विरोध किया था—जवाहरलाल नेहरू।
असमर्थनीय का समर्थन करना : वंशतंत्र
नेहरू राजवंश के सबसे बड़े अपराधों में से एक यह है कि उन्होंने वंशवादी राजनीति से अपराध-बोध एवं शर्म को बाहर कर दिया है और अपने उदाहरण के जरिए दूसरों को ऐसा करने के लिए प्रेरित किया है। हालाँकि, भारत एक ऐसा देश है, जिसकी संस्कृति एवं सोच को राजवंशों और उनके पिछलग्गुओं तथा प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लाभार्थियों द्वारा प्रभावित किया गया है कि असमर्थनीय (राजवंशीय लोकतंत्र) का भी बचाव किया जाता है। वंशतंत्र के प्रति सहिष्णु ‘बुद्धिजीवी’ अकसर पूछते हैं—क्या राजवंशी अलोकतांत्रिक तरीके से स्थान पाने का प्रयास कर रहे हैं? नहीं। तो फिर क्या परेशानी है? अगर कोई चुनाव लड़ता है, निर्वाचित होता है और राजनेता बन जाता है तो उसमें क्या अवैध या गलत किया गया है? सबकुछ लोकतांत्रिक है और खुल्लमखुल्ला है।
हालाँकि, ये बातें पूरी तरह से बेतुकी हैं, लेकिन कोई भी ऐसी दलीलों को सुनकर आश्चर्य में नहीं पड़ता। वंशवार जो हो रहा है, चाहे वह नेहरू-गांधी या डी.एम.के. या लालू या फिर किसी और राजवंश की बात हो, निश्चित रूप से पूरी तरह से गलत है कि न तो इसका बचाव किया जाना चाहिए और न ही उस बचाव को ढेर करने के लिए कोई तर्क होना चाहिए। हालाँकि, मूल राजवंश पिछले कई दशकों में आज्ञाकारी मुख्यधारा की मीडिया, बुद्धिजीवियों और नेताओं के जरिए ऐसा प्रचार करने में सफल रहा है कि बिल्कुल उलटा ही हुआ है—वंशवादी उत्तराधिकार पर सवाल उठाना अब खुद सवालों के घेरे में आ गया है।
इससे उपजनेवाला एक और प्रमुख तर्क यह सामने आता है कि धीरूभाई अंबानी के बेटे भी तो व्यवसायी हैं। इसका मतलब है कि व्यापारी की औलादें अधिकतर व्यापार ही सँभालती हैं। कलाकारों—गायकों, संगीतकारों, लेखकों और अन्य लोगों की संतानें भी कलाकार बन जाती हैं। बॉलीवुड कलाकारों के बेटे और बेटियाँ भी अभिनय के क्षेत्र में रम जाते हैं। डॉक्टर के बच्चे भी डॉक्टर बन जाते हैं। किसान का बेटा अकसर किसान ही बनता है। वंशवाद हर जगह है। ऐसे में, सिर्फ राजनीतिक राजवंशों पर ही निशाना क्यों? यह सतही तर्क सिर्फ भोले-भाले लोगों को ही बेवकूफ बना सकता है। डॉक्टर, कलाकार, अभिनेता, व्यवसायी की संतानों का भी डॉक्टर, कलाकार, अभिनेता, व्यवसायी बन जाना सिर्फ उन्हें ही प्रभावित करता है, दूसरों को नहीं। हालाँकि, किसी नेता/राजनेता की संतान के नेता बनने से बड़ी संख्या में जनता प्रभावित होती है। लोकतंत्र में प्रतिनिधि होना आवश्यक है और वह भी गैर-वंशवादी। व्यावसायिक घरानों या कला घरों अथवा पेशेवर प्रतिष्ठानों को प्रातिनिधिक होने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
राजनीति में भी कभी वंशानुगत राजा, महाराजा और राजा व रानी मौजूद थे। लेकिन उस पुराने दौर की व्यवस्था के दिन अब लद चुके हैं। अब एक लोकतांत्रिक प्रणाली उनका स्थान ले चुकी है। इसलिए अब आनुवंशिक या फिर वंशानुगत उत्तराधिकार अलोकतांत्रिक है। फिर इसे पिछले दरवाजे से क्यों लाया जाए? यह संविधान की भावना के खिलाफ है। राजवंशीय उत्तराधिकार सामंती, अनुचित, अन्यायपूर्ण और राष्ट्र के लिए पूरी तरह से हानिकारक है, फिर चाहे वह साम्यवादी उत्तर कोरिया में हो या इसलामी सऊदी अरब में अथवा फिर लोकतांत्रिक या वंशतंत्री भारत में।
वंशवाद-समर्थक ‘क्या वे चुनाव नहीं लड़ते और जीतते हैं’ कहनेवालों के लिए सवाल है—“वे कैसे जीतते हैं? उनसे कहीं अधिक सक्षम प्रतियोगी को दल का टिकट तक नहीं मिलेगा। लेकिन उत्तराधिकारी या वारिस के लिए वह पहले से ही रखा है। उन्हें अपने माता-पिता द्वारा वर्षों तक सींचा गया निर्वाचन-क्षेत्र थाली में सजा मिलता है। उनके पास निर्वाचित होने के लिए ढेर सारा पैसा है। एक बार निर्वाचित होने के बाद (पार्टी या संगठन या फिर सरकार में एक पद उनके लिए पहले से ही आरक्षित होता है) कुछ ऐसा, जिससे उनसे कहीं अधिक सक्षम और कम पहुँच वाले दावेदारों को इनकार कर दिया जाता है। पूरी स्थिति अन्यायपूर्ण, अनुचित और अलोकतांत्रिक है।
कुतर्क करनेवाले पूछते हैं, “क्या आप यह कहना चाहते हैं कि किसी राजनेता के बच्चों को राजनीतिक कॅरियर से वंचित किया जाना चाहिए? क्या ऐसा करना लोकतांत्रिक होगा?” ऐसा नहीं है कि किसी राजनेता की संतानों या रिश्तेदारों को राजनीतिक कॅरियर से वंचित किया जाना चाहिए। बात केवल यह है कि उन्हें अनुचित लाभ प्राप्त करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। ऐसा होना तभी संभव है, जब सभी चीजों को वास्तव में लोकतांत्रिक तरीके से लागू किया जाए, भाई-भतीजावाद को जड़ से उखाड़ा जाए और नियंत्रण प्रतिभा तथा क्षमता के हाथों में सौंपा जाए। क्या राजनीतिक दलों में कोई अंतर-दलीय लोकतंत्र मौजूद है? क्या हो, अगर इन तथाकथित वंशों से आनेवाले व्यक्ति में योग्यता हो? ऐसे में, क्या उसकी योग्यता बाकियों की योग्यता के मुकाबले अधिक है? अगर हाँ, तो अच्छा है। लेकिन एक निष्पक्ष तुलना, प्रतिस्पर्धा और बहस होने दें।
वंशतंत्र विनाशकारी क्यों है?
वंशतंत्र (वंशवादी लोकतंत्र) सिर्फ इसलिए ही बुरा नहीं है कि हम अनुचित लाभ लेने को गलत मानते हैं, बल्कि यह इसलिए भी बुरा है, क्योंकि इसका नतीजा साधारण कोटि का व्यक्ति और योग्यता से समझौता होता है। एक वंशवादी प्रक्रिया से सामने आनेवाले नेतृत्व की गुणवत्ता वास्तव में कभी अच्छी नहीं हो सकती। प्रमाण के लिए राज्य या केंद्र में राजवंशों के दबदबे वाले नेतृत्व के बयान न किए जानेवाले अवगुणों की जाँच करें, यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी और बदतर होती गई है। उदाहरण के लिए, नेहरू से गिरकर राहुल गांधी तक आती बुरी तरह से गिरते मानकों की रिवर्सज्यामितीय श्रेणी!
क्या वे लोग, जो यह बोलते हुए वंशवाद का पक्ष लेते हैं कि ‘आखिरकार वे भी चुने गए हैं’, समझते हैं कि उनके सँभालने या कहें तो दशकों तक देश को सँभालने के चलते ही भारत दुनिया के चुनिंदा सबसे गरीब और भ्रष्ट देशों में ही शामिल हो पाया है और अभी भी ‘डार्क एज’ वाला तीसरी दुनिया का देश है!
वंशवादी राजनीति के सबसे बड़े खतरे इस प्रकार हैं—(ए) यह योग्यता से समझौता करती है और सक्षम को आगे बढ़ने से रोकती है। (बी) यह राजनीतिक दलों के आंतरिक लोकतंत्र को बाधित करती है। (सी) वंशवादी राजनीति, भाई-भतीजावाद, संस्थागत भ्रष्टाचार और गैर- जवाबदेही एक साथ आगे बढ़ते हैं। (डी) वंशवादी राजनीति हमेशा राष्ट्र की कीमत पर होती है। (ई) यह सबसे बड़ा संकट है। यह भारत के दुःखों की नींव है।