Nehru Files - 103-104 in Hindi Anything by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - भूल-103-104

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नेहरू फाइल्स - भूल-103-104

भूल-103 
आत्म-प्रचार को सुनिश्चित करना और वंशवाद की वापसी

 बाल दिवस
 एक बेहद दिलचस्प चीज है बाल दिवस—14 नवंबर, नेहरू का जन्मदिन। संयुक्त राष्ट्र ने 20 नवंबर को सर्वव्यापी ‘बाल दिवस’ के रूप में घोषित किया था। हालाँकि, भारत में इसे नेहरू के जन्मदिन के साथ रखने के लिए 14 नवंबर को कर दिया गया। पुराने ‘अच्’ छे दिनों में इसे काफी धूमधाम के साथ मनाया जाता था। यह कहा जाता था और अब भी प्रचारित किया जाता है कि नेहरू को बच्‍चों से बहुत प्रेम था, इसलिए उनके जन्म-दिवस को ‘बाल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। हालाँकि, आपको यह पता होना चाहिए कि बच्‍चे तो सभी को अच्छेलगते हैं। ऐसे विक्षिप्त लोगों की संख्या न के बराबर ही होगी, जिन्हें बच्‍चे अच् न छे लगते हों या जो बच्‍चों को प्यार न करते हों। फिर, नेहरू के बारे में क्या खास है? विश्लेषण करने पर आप इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि यह और कुछ नहीं, बल्कि राजवंश के मुफ्त के प्रचार तथा स्वीकार्य बनाने का एक और तरीका था। लोगों को बचपन से ही राजवंश का समर्थक बना दो! खुद को एक बड़े वर्ग के बीच आसानी से लोकप्रिय बनाएँ। सभी को (बच्‍चों और उनके माता-पिता को) अपने बारे में सकारात्मक और अच्छा महसूस करवाएँ। 

सच्‍चाई यह है कि नेहरू को अगर बच्‍चे पसंद भी थे तो वे उनके अपने बच्‍चे (बल्कि इकलौती संतान इंदिरा) और नाती-पोते थे। वरना नेहरू बच्‍चों के साथ बेहद असहज महसूस करते थे। रुस्तमजी ने लिखा— 
“बहुत कम लोगों को पता होगा कि बच्‍चों के प्रति उनका (नेहरू का) रवैया वैसा नहीं था, जैसा लोग मानते हैं (छोटे बच्‍चों के साथ खेलने की इच्छा) वास्तव में वे कभी छोटे बच्‍चों के साथ रहे ही नहीं। मैं उनके साथ छह वर्षों तक रहा और उस दौरान मैंने उनको कभी एक भी बच्‍चे को गोद में लेते नहीं देखा, न ही वे उनका ध्यान अपनी ओर खींचते थे।” (रुस्त/72) 

“जे.एन. (जवाहरलाल नेहरू) ने अपनी छवि बहुत चतुराई के साथ निर्मित की। यहाँ तक कि छह वर्षों तक उनके साथ रहने के बावजूद मैं यह बताने की स्थिति में नहीं हूँ कि कौन से नेहरू वास्तविक थे और कौन से स्वाँग। वे जब किसी बच्‍चे को उठाने के लिए झुकते थे या किसी महिला की तरफ माला फेंकते थे तो मैं अकसर यह सोचता था उन्होंने ऐसा कैमरे के लिए किया है या फिर अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए? वे हर समय नाटक कर रहे होते थे—निश्चित ही शानदार अभिनय; लकिे न वही अभिनय हर बार किसके लिए?” (रुस्त/124)

बेहिसाब नामकरण 
इसके बाद आपके पास है बेहिसाब ‘नामकरण’। भारत में किसी भी दिशा में एक पत्थर फेंकें। इस बात की संभावना सबसे अधिक है कि वह पत्थर जाकर मोतीलाल या जवाहरलाल या कमला या इंदिरा या राजीव के ऊपर नामित किसी-न-किसी चीज से टकराएगा। असल में, जबरदस्त वंशवादी परंपराएँ, बड़ी चतुराई से बड़े स्तर पर मुफ्त का प्रचार, वह भी सरकार की लागत पर, बिल्लकु दक्षिण कोरिया के किम-इल-जुंग की तर्जपर! 

राजीव श्रीनिवासन ने लिखा—“मुझे नेहरू वंश के खिलाफ एक निश्चित पूर्वाग्रह को स्वीकार करना चाहिए। इसकी शुरुआत हुई किम-जोंग-उन जैसी व्यक्ति-पूजा करते हुए भारत में हर चीज का नामकरण इनके ऊपर करने से—राजीव पब्लिक स्कूल और इंदिरा अस्पताल तथा नेहरू स्टेडियम मेरे जेहन में आ जाते हैं। अमेरिकियों ने अपनी नई परिक्रमा करती एक्स-रे वेधशाला का नाम मशहूर भौतिक विज्ञानी सुब्रह्म‍ण्यम चंद्रशेखर के नाम पर ‘चंद्र’ रखा। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अगर भारत कभी अंतरिक्ष में कोई दूरबीन भेजता है तो निश्चित ही उसका नाम ‘जवाहर’ होगा, जैसे भारत में और कोई मायने ही नहीं रखता!” (यू.आर.एल.111) 

वेब पर प्रो. वद्यै नाथन द्वारा लिखा गया एक लेख (डब्‍ल्यू.एन.4) नेहरू-गांधी परिवार के नाम पर किए गए नामकरणों की विस्तृत सूची प्रदान करता है। इसके अनुसार, (डब्‍ल्यू.एन.4) केंद्र सरकार की 12 योजनाएँ; राज्य सरकार की 52 योजनाएँ; 28 खेल, टूर्नामेंट और ट्रॉफियाँ; 19 स्टेडियम; 5 हवाई अड्डों एवं बंदरगाहों; 98 विश्वविद्यालयों एवं शैक्षिक संस्थानों; 52 पुरस्कारों; 15 छात्रवृत्ति व फेलोशिप; 15 राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य एवं संग्रहालय; 39 अस्पताल एवं चिकित्सा संस्थान; 21 संस्थानों, अध्यक्षों एवं त्योहारों को नेहरू-गांधी के नाम पर रखा गया है, जो कुल मिलाकर 356 की विशाल संख्या में हैं—और इसमें भी पलु, सड़क, चौराहे, बाजार और कई अन्य चीजें शामिल नहीं हैं। 

जवाहरलाल के नाम पर जे.एन.एन.यू.आर.एम. (जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन) क्यों, जिनके राज के दौरान भारत को बेकार बुनियादी संरचनाओं और पगडंडियों जैसे राजमार्गों को भुगतना पड़ा। इसका नाम विश्वेश्वरैया जैसे प्रतिष्ठित इंजीनियर के नाम पर क्यों नहीं, जिन्होंने कृष्णराज सागर बाँध एवं वृंदावन गार्डन का डिजाइन तैयार किया और जिन्हें इंजीनियरिगं के कई अन्य उत्कृष्ट नमूने तैयार करने का श्य रे प्राप्त है? 

जे. एन.यू.–जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्यों? नेहरू की शैक्षणिक उपलब्धियाँ बेहद मामूली थीं। एम.जे. अकबर ने लिखा—“आखिरकार, जब वे (जवाहरलाल) दूसरी कक्षा की अर्धवार्षिक परीक्षा में उत्तीर्ण हुए तो मोतीलाल ने शानदार आयोजन किया। मोतीलाल को इस बात का पूरा भरोसा था कि उनका बेटा अनुत्तीर्ण होगा, इसलिए ऐसा औसत परीक्षा परिणाम भी उत्सव की वजह बना।” (अकब./74-77) 

इग्नू(IGNOU)—इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय क्यों? वे तो स्नातक भी नहीं थीं! इसके जरिए भारत के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गरीब लड़के व लड़कियाँ पूरी तरह से विपरीत परिस्थितियों के बीच स्नातक एवं स्नातकोत्तर कर रहे हैं और दूसरी तरफ एक ऐसा व्यक्ति है, जिसके पास पर्ण ू आर्थिक व पारिवारिक समर्थन था, यहाँ तक कि विदेश में पढ़ने का अवसर भी मिला था, लकिे न फिर भी वह स्नातक तक नहीं कर पाया। 

फिर, इन महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों का नामकरण ऐसे लोगों के नामों पर क्यों? आंबेडकर के नाम पर क्यों नहीं, जिन्होंने न के बराबर संसाधनों और बेहिसाब परेशानियों के बावजूद विदेश से दोहरा डॉक्टरेट प्राप्त किया? या फिर अन्य महान् शिक्षाविदों और वैज्ञानिकों के नाम पर क्यों नहीं, जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता सी.वी. रमन या एस.एन. बोस या जे.सी. बोस या पाणिनि या फिर डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. राधाकृष्णन, सुभाषचंद्र बोस, राजाजी, सरदार पटेल जैसे अन्य राष्ट्रीय नेताओं के नाम पर क्यों नहीं, जो महान् शिक्षाविद् भी थे? अब वह समय आ चुका है, जब ‘नेहरू-गांधी के असीमित नामकरणों’ को पलटा जाए और सिर्फ कुछ तक ही सीमित किया जाए। 
*****

भूल-104 
सांप्रदायिक, वोटबैंक की राजनीति 

अपनी धर्मनिरपेक्ष साख का ढिंढोरा पीटनेवाली कांग्रेस ने नेहरूवादी समय से ही अपनी सांप्रदायिक राजनीति शुरू कर दी थी। पूर्वी बंगाल से होनेवाले मुसलमानों के भी पलायन की सिर्फ इसलिए अनदेखी की गई, ताकि असम के चुनाव जीतने के लिए मुसलमानों के वोट हासिल किए जा सकें। (कृपया भूल#5, 59 देखें) 

नेहरू ने पूछे जाने पर मौलाना आजाद के कद के व्यक्ति को भी एक मुसलमान बहुत इलाके से चुनाव लड़ने की सलाह दी थी, वह भी जाकिर हुसैन के पीछे हट जाने के बाद। कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष चेहरे को देखते हुए वोट बैंक राजनीति ने मिसाल कायम की। 

कांग्रेस ने नेहरू के दौर से ही वोट हासिल करने के लिए दलितों व मुसलमानों की असुरक्षा की भावना का लाभ उठाया और उन्हें बराबरी का दर्जा दिलवाने, सुरक्षित महसूस करवाने और स्वतंत्र भारत का समान नागरिक बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। संक्षेप में कहें तो नेहरू-गांधी राजवंश का स्थिर सूत्र यह था—हमेशा धर्मनिरपेक्षता की बात करो, लेकिन वोट पाने के लिए सांप्रदायिक राजनीति करो। 

कांग्रेस को गरीब-समर्थक, अल्पसंख्यक-समर्थक, दलित-समर्थक और वंचितों का रहनुमा बनाकर पेश करो। हालाँकि, गरीबों को हमेशा के लिए गरीब रहने दो और अल्पसंख्यकों व दलितों को हमेशा के लिए असुरक्षित महसूस ही करने दो, वरना आपको उनके वोट कैसे मिलेंगे? 

दुर्गा दास ने लिखा—“लेकिन अपने जीवन के अंतिम दो वर्षों में मौलाना आजाद की नेहरू को लेकर राय पूरी तरह से बदल गई थी। अपने जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने महसूस किया कि मुसलमानों के लिए सबसे अच्छी सुरक्षा हिंदुओं की सद्भावना और एक मजबूत सरकार थी। उन्होंने मुझे बताया कि नेहरू की नीतियों ने प्रशासन को कमजोर कर दिया है और उनके आर्थिक सिद्धांत लोगों के जीवन-स्तर को सुधारने में पूरी तरह से नाकाम रहे हैं, विशेषकर मुसलमानों के।” (डी.डी./377-8)