भूल-107
नेहरूवाद और नेहरू का ‘आइडिया अॉफ इंडिया’
नेहरू के तथाकथित ‘आइडिया अॉफ इंडिया’ के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है; जबकि वह और कुछ नहीं, बल्कि सोवियत-मार्क्सवादी-कम्युनिस्ट प्रणाली (जिसने भारत की गरीबी और दुर्दशा की नींव रखी) के प्रति अपरिपक्व आकर्षण था, जिसे विज्ञान-सम्मत, तर्कसंगत, आधुनिक और ऐतिहासिक रूप से पूर्वनियत दरशाया जाता है। साथ ही इसमें उनकी फर्जी ‘धर्मनिरपेक्षता’ का तड़का भी लगा था, जिसका अधिक संबंध भारत की प्राचीन विरासत (जिसने देश को उसकी वास्तविक पहचान दी) का तिरस्कार करना था और उनकी वोट बैंक की राजनीति की पूर्ति करना था।
इस बात का दावा करना कि नेहरू की धर्मनिरपेक्षता ने भारत को धर्म-शासित हिंदू राष्ट्र बनने से रोक दिया, पूरी तरह से फर्जी है; क्योंकि भारत सदियों से सहिष्णु रूप से धर्मनिरपेक्ष और दूसरे धर्मों के प्रति अत्यंत सम्मानपूर्ण रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है, सहिष्णुहिंदू वैश्विक दृष्टिकोण, जो बाद के दो अब्राहमिक धर्मों के बिल्कुल उलट, दूसरे धर्मों को कोसता नहीं है। असल में, धर्मनिरपेक्षता पश्चिम की एक बड़ी आवश्यकता थी, क्योंकि वहाँ पर गिरजाघर सरकार के कामों में दखल दे रहे थे। भारत में कभी ऐसा था ही नहीं।
नेहरू के ‘आइडिया अॉफ इंडिया’ का अनुमान उपर्युक्त अध्यायों में ‘अर्थव्यवस्था’, ‘शैक्षिक व सांस्कृतिक कुप्रबंधन’ और ‘वंशावली एवं तानाशाही प्रवृत्ति’ के तहत विस्तृत रूप से उनकी भूलों को पढ़कर लगाया जा सकता है। ‘नेहरूवाद’ पर सीता राम गोयल का यह कहना था—
“मैं जवाहरलाल नेहरू को आज एक फूले हुए भूरे साहब के रूप में और नेहरूवाद को तमाम साम्राज्यवादी विचारधाराओं, इसलाम, ईसाइयत, गोरों के उत्तरदायित्व और कम्युनिज्म के संयुक्त अवतार के रूप में देखता हूँ, जो भारत में विदेशी हमलों के चलते आ गया है। और मेरे मन में इस बात को लेकर जरा भी संदेह नहीं है कि अगर भारत को जीवित रहना है तो नेहरूवाद को मरना ही होगा। निश्चित ही यह भारतीय लोगों, उनके देश, उनके समाज, उनकी अर्थव्यवस्था, उनके पर्यावरण और उनकी संस्कृति पर किए गए अपने पापों के बोझ तले दबकर मर रहा है। मेरा निवेदन सिर्फ यह है कि सभी रूपों में नेहरूवाद की एक सचेत अस्वीकृति इसे जल्द मारने में मदद करेगी और हमें उन परेशानियों से बचाएगी, जो आनेवाले समय में आनी हैं।” (एस.आर.जी./56)
“यह बात याद रखी जानी चाहिए कि नेहरू किसी भी तरह से एक अद्वितीय चरित्र नहीं थे। उसी प्रकार, नेहरूवाद भी कोई अनोखी घटना नहीं है। ऐसे कमजोर दिमागवाले व्यक्ति और एक प्रकार की नीची सोच उन तमाम समाजों में देखी जानी आम बात है, जो थोड़े-बहुत समय भी विदेशी शासनों के अधीन रह चुके हैं। सभी समाजों में हमेशा से ऐसे लोग मौजूद रहे हैं, जो सशस्त्र की श्रेष्ठता को सुसंस्कृत की श्रेष्ठता समझ बैठते हैं, जो खुद को कमतर आँकने लगते हैं और जो विजेता के तौर-तरीकों को अपनाने एवं आत्मविश्वास वापस पाने के लिए उन्होंने अपने पूर्वजों से जो पाया होता है, उसमें खोट निकालने लगते हैं और आखिर में, उन तमाम ताकतों से हाथ मिला लेते हैं।” (एस.आर.जी./59)
खाना कैसा पका है, यह तो उसे चखने के बाद ही बताया जा सकता है; और इसलिए नेहरू के ‘भारत के विचार’ और 17 वर्षों के उनके लंबे शासन के दौरान इसके कार्यान्वयन ने भारत को क्या दिया? एक विषाक्त राजनीतिक (वंशवादी और अलोकतांत्रिक), आर्थिक (समाजवादी और गरीबी— स्थायी), औद्योगिक (अक्षम एवं बोझिल सार्वजनिक और राज्य क्षेत्र), कृषि (उपक्षिे त व भूखा, भारत को एक दयनीय रूप से गरीब और भूखा राष्ट्र तथा एक अंतरराष्ट्रीय भिखारी दरशानेवाली), भौगोलिक और बाहरी सुरक्षा (अधिकांश सीमाएँ असुरक्षित और एक कमजोर राष्ट्र, जो अपनी रक्षा करने में असमर्थ है), प्रशासनिक (अक्षम और भ्रष्ट बाबूवाद), ऐतिहासिक (मार्क्सवादी, वामपंथी और नकारात्मकतावादी विकृतियाँ), शैक्षिक (अभिजात वर्ग और कोई सार्वभौमिक साक्षरता नहीं) एवं सांस्कृतिक (भारतीय विरासत में कोई गर्व नहीं) विरासत।