भूल-115
नेताजी सुभाष बोस के प्रति दुर्व्यवहार
नेताजी की मृत्यु की जाँच करवाने, जाँच रिपोर्ट को प्रभावित करवाने (भूल#112), आई.एन.ए. के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखने (भूल#114) और नेताजी को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने लायक न समझने (भूल#111) के अलावा नेहरू सरकार इतनी विरुद्ध रही कि उसने सन् 1947 में संसद् भवन में नेताजी का चित्र लगवाने से भी इनकार कर दिया। 11 फरवरी, 1949 के एक गोपनीय मेमो में, जिस पर मेजर जनरल पी.एन. खंडूरी के हस्ताक्षर हैं, में सरकार ने सिफारिश की—‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस के चित्रों को प्रमुख स्थानों—यूनिट लाइंस, कैंटीन, क्वार्टर गार्ड्स या रिक्रिएशन रूम में स्थापित नहीं किया जा सकता।’
भारतीय स्वतंत्रता के वास्तविक नायक को इतिहास के पन्नों में दफन कर नेहरू, कांग्रेस और ‘प्रसिद्ध’ मार्क्सवादी-नेहरूवादी सरकारी इतिहासकारों ने कभी माफ न की जानेवाली कृतघ्नता प्रदर्शित की है। पूर्व की आई.एन.ए. की रानी झाँसी रेजीमेंट की लेफ्टिनेंट मानवती आर्य के सहलेखन में लिखी गई पुस्तक ‘जजमेंट : नो एयरक्रैश, नो डेथ’ इस बात को विस्तार से बताती है कि कैसे नेहरू ने नेताजी की मौत के पीछे की सच्चाइयों को सामने आने से रोकने के पूरे प्रयास किए; कैसे नेहरू सरकार ने नेताजी के योगदानों को इतिहास के पन्नों से मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेफ्टिनेंट मानवती आर्य अपनी पुस्तक में बताती हैं कि आकाशवाणी (ए.आई.आर.) के साथ एक बातचीत के दौरान उन्हें कार्यक्रम के निर्माताओं ने बिना भूले पहले ही उस राष्ट्रीय नीति के बारे में बता दिया था कि उन्हें आई.एन.ए. का जिक्र तक नहीं करना है, जिसमें नेताजी का नाम भी शामिल है। (यूआरएल58)
यह एस. निजलिंगप्पा की पुस्तक ‘इनसाइड स्टोरी अॉफ सरदार पटेल : द डायरी अॉफ मणिबेन पटेल : 1936-50’ की प्रस्तावना से लिया गया है—“यह बड़ी अजीब सी बात है कि आजादी के बाद कई अन्य नेताओं (विशेष तौर पर नेहरू और गांधी) के संयुक्त कार्यों को सरकार द्वारा प्रकाशित किया गया है, किंतु दो अग्रणी नेताओं—सरदार पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के चुने हुए या कैसे भी कामों को किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा आगे नहीं बढ़ाया गया।” (मणि)
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भूल-115
नेताजी सुभाष बोस के प्रति दुर्व्यवहार
नेताजी की मृत्यु की जाँच करवाने, जाँच रिपोर्ट को प्रभावित करवाने (भूल#112), आई.एन.ए. के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखने (भूल#114) और नेताजी को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने लायक न समझने (भूल#111) के अलावा नेहरू सरकार इतनी विरुद्ध रही कि उसने सन् 1947 में संसद् भवन में नेताजी का चित्र लगवाने से भी इनकार कर दिया। 11 फरवरी, 1949 के एक गोपनीय मेमो में, जिस पर मेजर जनरल पी.एन. खंडूरी के हस्ताक्षर हैं, में सरकार ने सिफारिश की—‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस के चित्रों को प्रमुख स्थानों—यूनिट लाइंस, कैंटीन, क्वार्टर गार्ड्स या रिक्रिएशन रूम में स्थापित नहीं किया जा सकता।’
भारतीय स्वतंत्रता के वास्तविक नायक को इतिहास के पन्नों में दफन कर नेहरू, कांग्रेस और ‘प्रसिद्ध’ मार्क्सवादी-नेहरूवादी सरकारी इतिहासकारों ने कभी माफ न की जानेवाली कृतघ्नता प्रदर्शित की है। पूर्व की आई.एन.ए. की रानी झाँसी रेजीमेंट की लेफ्टिनेंट मानवती आर्य के सह- लेखन में लिखी गई पुस्तक ‘जजमेंट : नो एयरक्रैश, नो डेथ’ इस बात को विस्तार से बताती है कि कैसे नेहरू ने नेताजी की मौत के पीछे की सच्चाइयों को सामने आने से रोकने के पूरे प्रयास किए; कैसे नेहरू सरकार ने नेताजी के योगदानों को इतिहास के पन्नों से मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेफ्टिनेंट मानवती आर्य अपनी पुस्तक में बताती हैं कि आकाशवाणी (ए.आई.आर.) के साथ एक बातचीत के दौरान उन्हें कार्यक्रम के निर्माताओं ने बिना भूले पहले ही उस राष्ट्रीय नीति के बारे में बता दिया था कि उन्हें आई.एन.ए. का जिक्र तक नहीं करना है, जिसमें नेताजी का नाम भी शामिल है। (यूआरएल58)
यह एस. निजलिंगप्पा की पुस्तक ‘इनसाइड स्टोरी अॉफ सरदार पटेल : द डायरी अॉफ मणिबेन पटेल : 1936-50’ की प्रस्तावना से लिया गया है—“यह बड़ी अजीब सी बात है कि आजादी के बाद कई अन्य नेताओं (विशेष तौर पर नेहरू और गांधी) के संयुक्त कार्यों को सरकार द्वारा प्रकाशित किया गया है, किंतु दो अग्रणी नेताओं—सरदार पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के चुने हुए या कैसे भी कामों को किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा आगे नहीं बढ़ाया गया।” (मणि)