Nehru Files in Hindi Anything by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - और अधिक भूल

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नेहरू फाइल्स - और अधिक भूल

[ 12. और अधिक भूल और उनसे संबंधित पहलू ]

(बी1) नेहरू ने उपहार-स्वरूप दी काबो घाटी
 काबो या कबाव घाटी भारत और बर्मा की सीमा पर 11,000 से भी अधिक वर्ग किलोमीटर में फैली एक पर्वतीय घाटी है, जो मणिपुर और उत्तरी म्याँमार (बर्मा) के बीच बसी हुई है और यहाँ पर कडू, कानन, मेती, मिजो, जो इत्यादि जातीय अल्पसंख्यक समुदाय बसते हैं। यह बेहद उपजाऊ है और सागौन जैसे लकड़ी के अपने उत्पादों के लिए बेहद प्रसिद्ध है।

मणिपुरी एवं बर्मियों के बीच और बाद में मणिपुरियों, बर्मी तथा अंग्रेजों के बीच कई युद्ध हुए। 26 फरवरी, 1826 को हस्ताक्षर की गई ‘युडाबुन की संधि’ से यह बात साबित होती थी कि काबो घाटी पर मणिपुर का हक था। (डब्‍ल्यू.एन11) इसके बाद 25 जनवरी, 1834 को ब्रिटिश और बर्मी आयुक्तों के मध्य लंगथबल में हस्ताक्षरित की गई संधि के अनुसार, ब्रिटिश सरकार को काबो घाटी को बर्मा को पट्टेपर देने के लिए मणिपुर के राजा को 500 सिक्का रुपए की मासिक राशि का भुगतान करना आवश्यक था और उक्त मासिक राशि का भुगतान सन् 1949 तक किया भी गया। (डब्‍ल्यू.एन11) इसके अलावा, इस संधि में यह बात भी निर्धारित की गई थी कि काबो घाटी के मणिपुर में वापस आने पर उक्त मासिक भुगतान खत्म हो जाएगा। (डब्‍ल्यू.एन12) 

मणिपुर ने 57 वर्ष (सन् 1891-1947) के ब्रिटिश शासन के बाद वर्ष 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की और दो वर्ष बाद 1949 में इसका (अंतिम) राजा बोधचंद्र के शासनकाल के दौरान भारतीय संघ में विलय हो गया। 

नेहरू ने बेहद उदारता का परिचय देते हुए (जैसेकि यह उनकी व्यक्तिगत संपत्ति हो) काबो घाटी को बर्मा (म्याँमार) को शांति के प्रतीक के रूप में उपहार-स्वरूप दे दिया, वह भी संसद् की सहमति के बिना ही। (डब्‍ल्यू.एन13) 

घाटी के लिए प्रारंभिक मैत्रीपूर्णवार्त्ता सन् 1953 में शुरू हुई, जब दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों— जवाहरलाल नेहरू और यू नु ने मणिपुर व नागालैंड का दौरा किया और अंत में भारत गणराज्य की सरकार और बर्मा संघ की सरकार के मध्य रंगून में 10 मार्च, 1967 को, जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, तब एक सीमा समझौते के माध्यम से इसे मंजूरी प्रदान की गई। 

(बी2) नेहरू, नेहरू का राजवंश और नेपाल 
डी.एन.ए. में ‘नेपाल में उथल-पुथल नेहरू की देन है’ शीर्षक से प्रकाशित एक समाचार के अनुसार— “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के प्रमुख के.एस. सुदर्शन ने रविवार को भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को स्वतंत्रता के तुरंत बाद अन्य रियासतों की तर्जपर नेपाल के भारत में विलय के प्रस्ताव को खारिज करने के लिए दोषी ठहराया। सुदर्शन ने नेपाल और तिब्बत की मौजूदा उथल-पुथल के लिए नेहरू को जिम्मेदार ठहराया, जिसके पक्ष में उन्होंने कहा कि पड़ोसियों की विस्तारवादी प्रवृत्ति से अवगत होने के बावजूद उनके द्वारा चीन को सौंप दिया गया था। सुदर्शन ने (2008 में) कहा, ‘यह नेहरू की ओर से की गई गलती थी कि उन्होंने नेपाल के प्रधानमंत्री मातृका प्रसाद कोइराला के हिमालय साम्राज्य को भारत में शामिल करने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था...’ यह स्पष्ट करते हुए कि व्यक्तिगत या स्वार्थी हितों की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय हितों की बलि दी जा रही थी। सुदर्शन ने कहा कि तिब्बत में चीन की ज्यादतियाँ नेहरू की मूर्खता का नतीजा थीं।...”(यू.आर.एल.75) 

यहाँ श्री सुब्रमण्यम स्वामी का एक ट्वीट है—
 h t t p s:// t w i t t e r. c o m/ S w a m y 3 9/ s t a t u s/ 1 2 6 8 4 2 8 294136885251?s=09 

Today another folly of neharu emerges from historical records: when the ramas ruled nepal, and nepal royalty was in India. The ranas rulers like other rajas in India offered to merge in India in 1950. Nehru declined!! A genetic flaw runs in one family -- so banish family rule.

हालाँकि, ‘द क्विंट’ का निम्नलिखित कहना है (यू.आर.एल.76) (प्रमुख अंश)— 
“रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान (आई.डी.एस.ए.) के सदस्य प्रोफेसर एस.डी. मुनि कहते हैं कि वे राणा नहीं, बल्कि राजा त्रिभुवन थे, जिन्होंने एक संघ बनाने का प्रस्ताव रखा था और तब भी भारत व नेपाल के विलय का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।...प्रोफेसर मुनि ने इस बात पर भी रोशनी डाली कि कैसे विदेश मंत्रालय उन दस्तावेजों का पता नहीं लगा पाया है और यही वजह है कि इस बात को लेकर ‘मुँह से बोली गई बातों’ के अलावा कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है। एस.डी. मुनि ने कहा, ‘यह बात पूरी तरह से सच है कि राजा त्रिभुवन भारत के साथ सबसे निकटतम संबंध रखने के इच्छुक थे। लेकिन नेहरू चाहते थे कि नेपाल स्वतंत्र ही बना रहे, क्योंकि उन्हें पता था कि ब्रिटिशों के अलावा अमेरिकी भी हस्तक्षेप करेंगे और समस्याएँ पैदा कर सकते हैं।’...‘शोधगंगा’ में प्रकाशित ‘नेपाल और भूटान के प्रति भारत की विदेश नीति’ के एक अंश में लिखा है—‘राणा की तानाशाही के समाप्त होने के बाद राजा त्रिभुवन ने नेपाल के भारत में विलय की इच्छा प्रकट की। हालाँकि, नेहरू ने राजा के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वे चाहते थे कि नेपाल अपनी स्वतंत्रता बनाए रखे।’...त्रिभुवन के प्रस्ताव के बारे में प्रोफेसर मुनि ने कहा कि यह कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं था, बल्कि ‘एक सोच’ थी। उन्होंने कहा, ‘मंत्रालय में कार्यरत कुछ लोग, जो अब जीवित नहीं हैं, ने मुझे बताया था कि राजा त्रिभुवन ने इस आशय का एक पत्र भी लिखा था।’ ” 

‘स्वराज्य’ के एक लेख के अनुसार— “इस बात को दोहराने की कोई आवश्यकता ही नहीं है कि नेपाल के भारत के साथ बेहद करीबी पारंपरिक संबंध रहे हैं। सदियों से साझा धार्मिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत सिद्धांतों ने दोनों देशों के लोगों के बीच संबंधों को मजबूत किया है। लकिन आजादी के बाद नेपाल की राजशाही के प्रति जवाहरलाल नेहरू के अड़ियल रवैए ने दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव की नींव डाली। नेहरू के समाजवादी झुकाव और वामपथिं यों के साथ उनकी निकटता ने नेपाल के राजाओं, जिन्हें दोनों ही देशों के हिंदू भगवान् विष्णु का अवतार मानते हैं, के प्रति उनकी उपेक्षा को तय किया। नेपाल के राजाओं द्वारा भारत के साथ संपर्क स्थापित करने के कई निरंतर प्रयासों को नेहरू ने ठुकरा दिया, जो हिंदू सम्राटों को एक अभिशप्त वस्तु की तरह देखते थे। नेपाल के मामलों पर नजर रखनेवालों ने इस बात को लिखा है कि कैसे नई दिल्ली द्वारा बार-बार झिड़क दिए जाने के बाद नेपाल के राजाओं ने धीरे-धीरे चीन का रुख किया। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि चीन के विस्तारवादी रवैए से बचने के लिए ही काठमांडू में बैठे राजा भारत के साथ संबंध मजबूत करना चाहते थे। नेहरू ने अपने वश्ैविक-दृष्टिकोण में राजशाही को कालानुक्रमिक के रूप में देखा और चूँकि नेपाल एक हिंदू राष्ट्र था, इसलिए भी। ...उस समय नेपाल में राजशाही-विरोधी ताकतों को नई दिल्ली द्वारा दिए गए गोपनीय समर्थन ने नेपाल के शासक कुलीन वर्ग के साथ-साथ देश के नागरिक समाज के हृदय में भारत के प्रति अविश्वास के प्रारंभिक बीज बो दिए। इसने नेपाल के आंतरिक मामलों में भारतीयों के हस्तक्षेप के नेपालियों द्वारा बार-बार दोहराए जानेवाले आरोपों को भी जन्म दिया, जिन्हें अब नियमित रूप से सुना जा सकता है।” (यू.आर.एल.77)

 नेहरू की इस मूर्खता को उनके नाती राजीव गांधी ने तब और अधिक बढ़ा दिया, जब वे भारत के प्रधानमंत्री थे। ‘स्वराज्य’ में प्रकाशित एक लेख के अंश यहाँ दिए गए हैं— 
“लेकिन दोनों देशों के संबंधों में वास्तविक दरार राजीव गांधी के शासनकाल के दौरान आई।...हालाँकि, कूटनीति, रणनीति और वैश्विक मामलों को लेकर उनके दृष्टिकोण और उनके अनाड़ीपन ने कई अन्य आपदाओं को भी जन्म दिया।...नेपाल की राजशाही के प्रति राजीव गांधी की शत्रुता दिसंबर 1988 में उनकी काठमांडू यात्रा के बाद सामने आई।...राजीव गांधी अपनी पत्नी के साथ थे और वे काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर जाना चाहते थे। मंदिर प्रबंधन ने भारतीय दूतावास को अवगत करवाया कि राजीव गांधी का तो स्वागत है, लेकिन सोनिया गांधी को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा, क्योंकि वे हिंदू नहीं हैं। राजीव गांधी ने राजा बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह के सामने इस मामले को उठाया और राजा से यह सुनिश्चित करने का अनुरोध किया कि सोनिया गांधी को भी मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति प्रदान की जाए। राजा ने राजीव गांधी के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया और भारतीय प्रधानमंत्री से कहा कि मंदिर की परंपराएँ तोड़ी नहीं जा सकतीं। राजीव गांधी क्षुब्‍ध थे और ऐसा लगता है कि सोनिया गांधी उस अपमान को कभी भूल नहीं पाई हैं। ऐसा माना जाता है कि नेपाल पर नाकाबंदी लगाने के राजीव गांधी के फैसले के पीछे उनका हाथ था। हालाँकि, दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधी संधियों की समाप्ति को इस नाकाबंदी का प्रत्यक्ष कारण बताया गया, लेकिन विश्लेषक इसके दो वास्तविक कारण मानते हैं—एक तो था नेपाल द्वारा चीन से विमानभेदी तोपों एवं अन्य हथियारों की खरीद और दूसरा कहीं अधिक घातक कारण था, नेपाल को अपनी कैथोलिक पत्नी के साथ किए गए बरताव का सबक सिखाने का। काठमांडू में तैनात रहे एक पूर्व भारतीय राजनयिक ने कहा, ‘यह बात सर्वविदित है कि राजीव गांधी का बरताव नेपाल की राजशाही को लेकर बहुत अच्छा नहीं था और उन्होंने नवंबर 1987 में सार्क(SAARC) सम्मेलन के लिए की गई अपनी यात्रा के दौरान लोकतंत्र-समर्थक नेताओं के साथ मुलाकात भी की थी। पशुपतिनाथ मंदिर की घटना ने उनके मन में राजा के प्रति और द्वेष की भावना को पैदा कर दिया। रॉ (RAW) ने माओवादियों सहित नेपाल के राजशाही-विरोधी लोगों को जो समर्थन देना शुरू किया, वह सर्वविदित है।’ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व विशेष निदेशक अमर भूषण ने अपनी पुस्तक ‘इनसाइड नेपाल’ में इस बात का खुलासा किया है कि एजेंसी ने नेपाल की राजशाही को गिराने के लिए कैसे काम किया। ‘रॉ’ ने राजीव गांधी के निर्देश पर राजशाही-विरोधी सभी ताकतों को एक मंच पर ला दिया और माओवादी नेता पुष्प कमल दहल (उर्फ प्रचंड) को अपनी ओर कर लिया। दक्षिण एशिया के विशेषज्ञों का कहना है कि राजीव गांधी का ‘राजशाही हटाओ’ अभियान बेहद जल्दबाजी का काम था। ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत ने जिन नेपाली माओवादियों की सहायता की और आश्रय दिया, वे मूलतः चीन के समर्थक थे और एक बार उनके सत्ता हासिल कर लेने के बाद यह बात पूरी तरह से सार्वजनिक भी हो गई। भारत से मिली मदद के बावजूद नेपाल के माओवादियों और कम्युनिस्टों के मन में भारत के प्रति प्रेम नहीं था। वहीं दूसरी ओर, भारत समर्थित लोकतंत्र-समर्थक आंदोलन के खतरे को भाँपते हुए नेपाल की राजशाही ने भी चीन से मदद माँगी। बीजिंग तो उसे समर्थन और मदद देने को तैयार ही बैठा था। यह चीन के लिए लगभग जीत की स्थिति थी और भारत को इससे कोई लाभ नहीं हुआ। इसके लिए सिर्फ राजीव गांधी को ही दोषी ठहराया जाना चाहिए। नेपाल के लोगों के लिए बड़ी मुश्किलें पैदा करनेवाली और देश की अर्थव्यवस्था को पंगु बनानेवाली इस नाकाबंदी ने भारत के खिलाफ जबरदस्त क्षोभ पैदा किया...भारत आज नेपाल में जिन समस्याओं का सामना कर रहा है, उसका श्रेय सीधे तौर पर राजीव गांधी और उनकी नीतियों को दिया जा सकता है। और उनके नाना नेहरू को भी, जिनकी हिमालयी भूलों को बड़े स्तर पर प्रलेखित किया गया है और उन पर टिप्पणियाँ भी की गई हैं।...” (यू.आर.एल.77) 

‘माई नेशन’ में एक लेख स्पष्ट करता है— “प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक गलत फैसलों और गलत कूटनीतिक कदमों की एक पूरी शृंखला वर्षों तक नेपाल के बीजिंग की ओर झुकाव के लिए जिम्मेदार रही है। राजीव गांधी को नेपाल में चुनौतियों से निपटने के उनके असफल प्रयासों के लिए याद किया जाएगा, जो आज भी भारत को परेशान कर रही हैं।”(यू.आर.एल.78) 

उपर्युक्त उस सभी को प्रदर्शित करता है, जिसे ‘भूल#99’ में विस्तार से बताया गया है। नेहरू से लेकर, इंदिरा से लेकर, राजीव से लेकर राहुल-सोनिया तक, वंशवादों के दबदबे वाले नेतृत्व की बयाँ न की जा सकनेवाली कमियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी बद-से-बदतर होती जा रही हैं। 

(बी3) बलूचिस्तान की गलती 
‘नेहरू की बलूचिस्तान वाली गलती उनकी हिमालयी भूलों के समान ही विनाशकारी थी’ के अनुसार—
 “हो सकता है कि बलूचिस्तान के मामले में नेहरू की गलती को आज अधिक लोग न जानते हों, लेकिन ऐतिहासिक और रणनीतिक रूप से यह उतना ही विनाशकारी और दोषी है, जितना उनकी हिमालयी भूल या फिर कश्मीर पर की गई चूक। रणनीतिक अदूरदर्शिता और प्राथमिकता की गलत भावना में आकर तत्कालीन भारत सरकार ने कलात के बलूच राजा का समर्थन करने से इनकार कर दिया, जो पाकिस्तानी कब्जे से बचने के लिए नई दिल्ली के साथ सौदेबाजी करने का प्रयास कर रहा था।...और अगर ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक ‘फॉरेन पॉलिसी सेंटर’ की एक रिपोर्ट पर भरोसा किया जाए तो इससे भी बुरा यह हुआ कि नेहरू ने सन् 1947 में कलात के खान द्वारा हस्ताक्षर किए गए विलय के दस्तावेजों को वापस कर दिया।...अंग्रेजों के इस महाद्वीप को छोड़ते समय कलात, जिसमें लगभग पूरा बलूचिस्तान शामिल था, एक स्वतंत्र राष्ट्र था।...

 “तिलक देवाशर ने अपनी नई पुस्तक ‘पाकिस्तान : द बलूचिस्तान कॉनन्ड्रम’ में लिखा है—‘1946 में कलात के खान के कानूनी सलाहकार जिन्ना ने कैबिनेट मिशन को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ भौगोलिक आधार पर बलूचिस्तान को ब्रिटिश भारत से अलग करने की माँग की गई थी।’...यह भारत के लिए अवसर से चूकनेवाली बात थी। शायद नेहरू सरकार स्वतंत्र बलूचिस्तान के सामरिक महत्त्व को समझने में पूरी तरह से विफल रही। हो सकता है कि उसने, चाणक्य के मौलिक सिद्धांत के बिल्कुल उलट गलती से यह मान लिया हो कि एक मजबूत पड़ोसी—इस मामले में पाकिस्तान—भारत के लिए अच्छा था। दुर्भाग्य से, यह मानसिकता अभी भी देश में पूरी तरह से समाई हुई है और एक के बाद एक सरकारें पाकिस्तान के विचार के कृत्रिम निर्माण को देखने से इनकार कर रही हैं। भारत ने इस सच्‍चाई के बावजूद कुछ नहीं किया कि ‘अधिकांश बलूच मानते हैं कि कलात के खान को न सिर्फ पाकिस्तान में विलय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने को मजबूर किया गया, बल्कि यह एक अवैध विलय था।’... 

“देवाशर आगे लिखते हैं कि बलूचिस्तान का वियोजन दोतरफा है। एक ‘बलूच वर्णन’ है, जो ‘स्वतंत्र होने की अमिट ऐतिहासिक यादों पर टिका है और वहाँ के लोगों को लगता है कि जब से उन्हें पाकिस्तान में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया है, तब से उनके साथ अन्याय हुआ है।’ लेखक बलूच राजनीतिक नेता अब्दुल हई बलूच को यह कहते हुए उद्‍‍धृत करते हैं, ‘अधिष्ठान ने कभी इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया कि पाकिस्तान एक बहु-राष्ट्र देश है। पाकिस्तान सन् 1947 में अस्तित्व में आया; जबकि बलूच, पठान, सिंधी, पंजाबी और सरायकी सदियों से यहाँ रहे हैं। उनकी अपनी संस्कृतियाँ और भाषाएँ हैं।’ ” (यू.आर.एल.85) 

(बी4) बाबर को सम्मान देना 
उज्बेकिस्तान में जनमा जहीर-उद्-दीन मुहम्मद बाबर (1483-1530), जो सामूहिक हत्यारे तामेरलेन (तैमूर) का प्रत्यक्ष वंशज था, भारत में मुगल वंश का संस्थापक था और वर्ष 1526 से 1530 तक भारत का पहला मुगल बादशाह था।

 बाबर की आत्मकथा ‘तुज्क-ए-बाबरी’ उत्तर-पश्चिम भारत में बाबर के उस अभियान के बारे में बताती है, जिसमें उसने बड़ी संख्या में हिंदू व सिख नागरिकों की हत्या की तथा छोटी पहाड़ियों पर काफिरों की खोपड़ियों की मीनारों का निर्माण किया। इसके अलावा, ‘बाबरनामा’ में भी हिंदू व सिखों के गाँवों और कस्बों में हुए नर-संहार को दर्ज किया गया है। गुरु नानक बाबर के समकालीन थे, उन्होंने अपनी ‘बाबर बानी’ में बाबर और उसकी सेना द्वारा किए गए अत्याचारों का विस्तृत वर्णन किया है, जिसके वे एक चश्मदीद गवाह थे— “खुरासान पर हमले के बाद बाबर ने हिंदुस्तान को डराया। सृष्टिकर्ता खुद पर दोष नहीं लेता, लेकिन उसने मुगल को यमदूत बनाकर भेजा है। इतने बड़े पैमाने पर नर-संहार हुआ था...लटके हुए उन नरमुंडों (महिलाओं के) पर बाल बिखरे पड़े थे। उनके हिस्सेसिंदूर से रँगे हुए थे—कैंचियों से उन सिरों के बाल मूँड़ दिए गए थे और उनके गलों में मिट्टी भरी हुई थी। ...सैनिकों को आदेश दिए गए थे, जिन्होंने उनका अपमान किया और उन्हें अपने साथ ले गए।...बाबर के शासन की घोषणा होने के बाद से राजकुमारों तक के पास खाने के लिए भोजन नहीं है...उसने विश्राम-गृहों और मंदिरों को जला दिया, राजकुमारों के अंगों को कटवा दिया और उन्हें मिट्टी में मिला दिया।...” (डब्‍ल्यू.आर.एच.5) 

उपर्युक्त को देखते हुए कोई भी मानवीय या सही सोचवाला व्यक्ति या एक भारतीय देशभक्त कभी भी बाबर को सम्मान देने के बारे में सोच भी नहीं सकता। 

नीचे एक लेख ‘व्हाय बाबर बेकॉन्स नेहरू-गांधीज’ के अंश दिए गए हैं— 
“1. नेहरू ने 19 सितंबर, 1959 को बाबर की कब्र (काबुल स्थित) का दौरा किया। 
2. इंदिरा गांधी ने 1968 में बाबर की कब्र का दौरा किया, जैसाकि नटवर सिंह ने अपनी पुस्तक ‘प्रोफाइल एंड लेटर्स’ में बताया है। 
3. इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और राहुल गांधी 1976 में बाबर की कब्र पर गए थे। 
4. राहुल, डॉ. मनमोहन सिंह और उनके विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अगस्त 2005 में बाबर की कब्र का दौरा किया था। तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन भी पूर्वपी.एम. के साथ थे।” 

“ ...1968 में इंदिरा गांधी द्वारा बाबर की कब्र पर कुछ मिनटों का मौन धारण करने के प्रकरण ने, जैसाकि नटवर सिंह द्वारा बताया गया, हिंदू ब्लॉग लेखकों के बीच उत्तेजना पैदा कर दी। लेकिन मुख्यधारा की अंग्रेजी मीडिया ने इसे नजरअंदाज ही किया।” (डब्‍ल्यू.एन14)

 नटवर सिंह ने ‘वन लाइफ इज नॉट एनफ’ में लिखा— “हम बिना किसी की परवाह किए हुए बाबर की कब्र की ओर बढ़े। वे (इंदिरा गांधी) अपना सिर थोड़ा झुकाए हुए खड़ी थीं और मैं उनके पीछे था। उन्होंने मुझसे कहा, ‘मैंने अपने इतिहास को आज स्पर्श किया है।’ ” (के.एन.एस./143) 

“बाबर का मकबरा अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में ‘बाबर के बगीचे’ में स्थित है। आश्चर्य की बात है कि नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य ने कभी अफगानिस्तान के गजनी में स्थित वीर पृथ्वीराज चौहान की कब्र/मकबरे पर जाने के बारे में सोचा तक नहीं।” (डब्‍ल्यू.एन14) 

“ई. जयवंत पॉल की पुस्तक ‘आर्म्स एंड आर्मर : ट्रेडिशनल वेपन्स ऑफ इंडिया’ कहती है कि गजनी के बाहरी इलाके में दो गुंबदनुमा मकबरे बने हुए हैं...बड़ा वाला गोरी का था और कुछ मीटर दूर पृथ्वीराज चौहान का दूसरा छोटा सा मकबरा था।” (यू.आर.एल.86) 

“खबरों के मुताबिक, अफगानिस्तान में यह अब परंपरा का हिस्सा बन चुका है कि मुहम्मद गोरी के मकबरे पर आनेवाले लोग पहले पृथ्वीराज चौहान की कब्र पर जाते हैं और उसका अनादर करते हैं, उस स्थान पर जूते या चप्पलों से मारते हैं और कूदते हैं, जहाँ भारतीय सम्राट् के नश्वर अवशेष दफन हैं। मकबरे के शिलालेख पर दर्ज है— ‘दिल्ली का काफिर राजा यहाँ पड़ा है।’ अब समय आ गया है कि पृथ्वीराज चौहान के अवशेषों को ससम्मान भारत वापस लाया जाए और दिल्ली के साथ-साथ अजमेर में एक भव्य स्मारक तैयार किया जाए।” (यू.आर.एल.87) 

“गांधी राजवंश के सदस्यों ने मुगल साम्राज्य के संस्थापक, जिसने हिंदू काफिरों की जान लेने की अपनी चाहत का खुलकर बखान किया है, के मकबरे का दौरा करना जारी रखा है।... क्या आपने कभी इस बारे में सोचा है कि आखिर इसके पीछे क्या कारण है कि गांधी परिवार का प्रत्येक वंशज अपने देश से इतनी दूर अफगानिस्तान के काबुल में स्थित मुगल बादशाह बाबर के मकबरे पर जाकर उसका सजदा करना क्यों नहीं भूला है?...इस बात का उल्लेख करना भी बहुत आवश्यक है कि गांधी-नेहरू परिवार के किसी भी सदस्य ने गजनी में बनी पृथ्वीराज चौहान के मकबरे पर जाने की जहमत तक नहीं उठाई।...राजवंश के मन में हिंदू राजा के प्रति अपमान की भावना और बाबर के प्रति प्रेम के पीछे के छिपे कारण दो ऐसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं, जिन पर गहन शोध की आवश्यकता है।” (यू.आर.एल.88) 

(बी5) वर्ष 1948 में महाराष्ट्र में हुआ ब्राह्म‍णों का नर-संहार 
वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस द्वारा उकसाए गए गुंडों और कांग्रेस के गुंडों द्वारा सिखों के किए गए भयानक और अवर्णनीय तरीके से क्रूर कत्लेआम, जिसे ‘सिख नर- संहार कहा जाना चाहिए, जिसमें देश भर में 3,400 सिखों (आधिकारिक आँकड़ा; अनधिकारिक आँकड़ा तो 8,000 से 17,000 तक जाता है) को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, नेहरू के राज के दिनों की एक खौफनाक मिसाल थे, जिसे दुर्भाग्य से दुनिया से छिपाकर रखा गया। महात्मा गांधी की हत्या के बाद वर्ष 1948 में महाराष्ट्र में ब्राह्म‍णों पर हुए हमले, जिसे ‘ब्राह्म‍ण नर-संहार’ भी कहा जा सकता है, करीब 8,000 लोगों की जानें गईं। 

चूँकि गांधी की जान लेने वाले महाराष्ट्र के ब्राह्म‍ण थे, इसलिए उनके पूरे समुदाय को निशाना बनाया गया। आरती अग्रवाल ने ‘महाराष्ट्रियन ब्राह्म‍ण जीनोसाइड—8,000 किल्ड’ शीर्षक वाले एक लेख में लिखा— “ब्राह्म‍णों की जानें ली गईं, ब्राह्म‍ण महिलाओं के साथ बलात्कार हुए, उनकी दुकानों और मकानों को आग के हवाले कर दिया गया, उनकी आजीविका नष्ट कर दी गई तथा ब्राह्म‍णों को अपने जीवन और आनेवाली पीढ़ियों की रक्षा के लिए पलायन को मजबूर होना पड़ा।...अपने घर से भागने का प्रयास करने के दौरान नारायण राव सावरकर और उनके परिवार पर पत्थरबाजी की गई। वे गंभीर रूप से घायल हो गए और अंततः 19 अक्तूबर, 1949 को उनकी मृत्यु हो गई।...अनुमान के मुताबिक, 8,000 ब्राह्म‍णों (1984 के सिख-विरोधी दंगों से अधिक) की हत्या की गई (क्योंकि इसका कोई आधिकारिक आँकड़ा दर्ज नहीं है!) और इसका कोई आधिकारिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है कि कितनों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा।...” (यू.आर.एल.98) 

अगर किसी समुदाय का एक सदस्य किसी की हत्या कर दे तो उसके बदले में पूरे समुदाय को निशाना बनाने का क्या तर्क है? पूरी तरह से बेतुका! अगर कोई हत्यारा किसी विशेष धर्म या संप्रदाय या क्षेत्र अथवा जाति या समुदाय से संबंधित हो तो क्या उस पूरे समूह को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया जाए? और अगर ऐसा होता है या फिर होने दिया जाता है तो फिर पुलिस प्रतिष्ठान और आपराधिक-न्याय प्रणाली की मौजूदगी का क्या मतलब रह जाता है? 

लेकिन शायद राजनीति तमाम चीजों पर हावी हो जाती है। “इस नर-संहार से जुड़ा हर पहलू इस बात की ओर इशारा करता है कि यह एक पूर्व नियोजित अपराध था, जो एक विशेष धार्मिक समुदाय, महाराष्ट्र के ब्राह्म‍णों, को निशाना बनाने के इरादे से किया गया था। कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी होना, जिनकी सबसे बड़ी पहचान थी। सैकड़ों लोगों की भीड़ द्वारा इतने कम समय में ब्राह्म‍णों पर हमले करने के लिए बड़ी चालाकी और संचार के असाधारण उपकरणों की आवश्यकता होती है, जो उस दौर में तकनीकी तौर पर उपलब्ध नहीं थे। ये ‘दंगे’ नहीं थे, जैसाकि अकसर इनके बारे में कहा जाता है, बल्कि यह एक सुनियोजित नर-संहार था; क्योंकि यह सिर्फ किसी एक मोहल्ले या शहर में नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र की जमीन पर फैला हुआ था।...” (यू.आर.एल.98) 

“यह एक ऐसा नर-संहार है, जिसके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, एक बार फिर जान बूझकर। वरना ऐसा हो ही नहीं सकता कि किसी एक धार्मिक समुदाय के इतने बड़े पैमाने पर हुए लक्षित जन-संहार के बारे में पता ही न हो, न ही उसे कहीं भी ठीक तरीके से प्रलेखित किया जाए! इन्हें लेकर सिर्फ उन्हीं भुक्तभोगियों के हवाले से जानकारी प्राप्त है, जिन्होंने इनके दंश को झेला था और उन लोगों के पास, जिन्होंने इस घटना के समय इस नर-संहार का दस्तावेजीकरण किया था। इस बात को मानने के हजारों कारण हैं कि इस नर-संहार से जुड़े सभी साक्ष्य नष्ट कर दिए गए, जिनमें तसवीरें और समाचारों के अंश भी शामिल थे।” (यू.आर.एल.98) 

“गांधी की मृत्यु तो सिर्फ एक बहाना थी, ताकि...प्रशासनिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से इस क्षेत्र पर हावी अल्पसंख्यक समुदाय (ब्राह्म‍णों) के खिलाफ नफरत का माहौल बनाकर वोट बैंक को इकट्ठा किया जा सके। चितपावनों का भारतीय राष्ट्रवाद में बेहद महत्त्वपूर्ण योगदान था, जिस पर आज महाराष्ट्र के निवासी गर्व करते हैं। महादेव रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले, लोकमान्य तिलक, वीर सावरकर आदि सभी चितपावन ब्राह्म‍ण ही थे। मराठा प्रभाव को महाराष्ट्र के बाहर फैलानेवाले और अखिल भारतीय मराठा साम्राज्य की स्थापना करने वाले पेशवा भी चितपावन ही थे। लेकिन जैसे ही एक चितपावन ब्राह्म‍ण (गोडसे) ने गांधी की हत्या की, पूरे समुदाय को सारी घृणा की आँच का सामना करना पड़ा।...” (यू.आर.एल.99) 

“भीड़ में आखिर कौन लोग शामिल थे? स्पष्टतः वे ब्राह्म‍ण-विरोधी कार्यकर्ता, राजनीतिक समूह और कुछ चुनिंदा कांग्रेसी गुंडों के समूह थे। आखिर क्यों कभी एक उचित औपचारिक जाँच तक शुरू नहीं की गई? दोषियों को सजा क्यों नहीं मिली? स्वयंभू प्रधानमंत्री नेहरू और अहिंसा की कसम खानेवाले के चेले ने ऐसे एक निंदनीय और व्यापक हिंसा तथा स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद देश के पहले नर-संहार (विभाजन को छोड़कर) के लिए जिम्मेदार लोगों को कानून के दायरे में लाना तक मुनासिब नहीं समझा!”