Chapter No. 1
🔥 वीरानगढ़ की दहलीज पर 🔥
🕯️"और बरखुरदार, कैसो है तू? और घर में सगळा राजी-खुशी हैं ना?"
(गर्मी की छुट्टियाँ)
बीस साल का अजय, दिल्ली के शोरगुल और भाग-दौड़ से दूर, कुछ दिनों की शांति और सुकून की तलाश में था। उसके माता-पिता ने सुझाव दिया था कि वो अपने ननिहाल, राजस्थान के पश्चिमी छोर पर बसे एक छोटे से गाँव वीरानगढ़ चला जाए।
अजय को पहले तो कुछ खास उत्साह नहीं था। उसके लिए गाँव का मतलब था बिजली की कटौती, धूल भरी सड़कें, और इंटरनेट से दूरी। लेकिन उसकी माँ ने वीरानगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता, शांत माहौल और ताज़ी हवा के बारे में इतना कुछ बताया था कि अंततः अजय मान गया। उसे उम्मीद थी कि ये बदलाव शायद उसके शहरी जीवन की एकरसता को तोड़ देगा।
दिल्ली से वीरानगढ़ तक का सफर लंबा और थका देने वाला था। ट्रेन की खड़खड़ाहट और सहयात्रियों की बातें, सब मिलकर एक अजीब सी धुन बना रही थीं, जो अजय के कानों में गूँज रही थी। जैसे-जैसे ट्रेन राजस्थान के भीतरूनी इलाकों में प्रवेश कर रही थी, बाहर का नज़ारा बदलता जा रहा था।
हरे-भरे खेत अब धूल भरे मैदानों में बदल रहे थे, और कंक्रीट के जंगल की जगह दूर-दूर तक फैली सूखी झाड़ियाँ और रेतीले टीले ले रहे थे। सूरज की तपिश खिड़की के शीशे से भी महसूस हो रही थी, लेकिन एक अजीब सी शांति भी थी, जो दिल्ली की भीड़-भाड़ में कभी नहीं मिलती थी।
अजय ने अपनी आँखें बंद कर लीं और कल्पना करने लगा कि वीरानगढ़ कैसा होगा। क्या ये सचमुच उतना ही शांत और सुंदर होगा जैसा उसकी माँ ने बताया था, या सिर्फ एक और पिछड़ा हुआ गाँव?
आखिरकार, दोपहर के वक्त, ट्रेन वीरानगढ़ रेलवे स्टेशन पर रुकी। स्टेशन छोटा और साधारण था, जहाँ एक ही प्लेटफॉर्म और कुछ ही लोग दिख रहे थे। हवा में धूल और मिट्टी की महक थी, साथ ही कुछ अजीब सी, सूखी घास की गंध भी।
अजय ने अपना बैग उठाया और ट्रेन से नीचे उतरा। प्लेटफॉर्म पर कुछ देर खड़ा रहा, अपनी आँखों को चारों ओर घुमाया। कुछ लोग अपनी ट्रेनों का इंतजार कर रहे थे, कुछ पानी पी रहे थे, और कुछ आपस में धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे। अजय अपने मामा का इंतजार करने लगा, जिनके आने की उसे उम्मीद थी।
तभी, पीछे से एक जानी-पहचानी, लेकिन थोड़ी मोटी आवाज़ उसके कानों में पड़ी। "अजय! ओ अजय! इठै है का तू?"
अजय चौंककर पीछे मुड़ा। सामने उसके मामा, रामलाल जी, खड़े थे। उनकी उम्र चालीस के आसपास होगी, लेकिन उनके चेहरे पर राजस्थान की धूप और हवा की छाप साफ दिख रही थी। उनका रंग थोड़ा साँवला था, लेकिन उनकी आँखों में एक चमक और चेहरे पर एक भोली मुस्कान थी। उन्होंने एक सादी धोती और कुर्ता पहन रखा था, और उनके सिर पर एक पगड़ी बंधी हुई थी। अजय को देखते ही उनके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई।
"मामा जी!" अजय ने खुशी से पुकारा और तेज़ी से उनकी ओर बढ़ा।
मामा जी भी अजय को अपनी ओर आते देख खुशी से फूले नहीं समाए। उन्होंने अपने दोनों हाथ फैलाए और अजय को अपने सीने से लगा लिया। उनकी पकड़ मजबूत थी, जो उनके प्यार और स्नेह को दर्शा रही थी। अजय को लगा जैसे वो किसी गर्मजोशी भरे आलिंगन में समा गया हो।
मामा जी ने प्यार से अजय की पीठ थपथपाते हुए कहा, "और बरखुरदार, कैसो है तू? और घर में सगळा राजी-खुशी हैं ना?"
उनकी आवाज़ में राजस्थानी लहजे की मिठास थी, जो अजय को तुरंत अपनेपन का एहसास करा गई।
अजय उनसे थोड़ा दूर हटकर मुस्कुराते हुए बोला, "सब ठीक है मामा जी, और मैं तो खुद ही आपके सामने खड़ा हूँ। हट्टा-कट्टा, बिल्कुल जवान और हैंडसम। पर शायद मेरे मामा जी बूढ़े हो गए हैं, ऐसा मुझे लागे है।"
अजय ने मज़ाक में राजस्थानी लहजे की नकल करने की कोशिश की।
मामा जी ने उसकी बात सुनकर एक पल के लिए अपनी भौंहें चढ़ाईं, फिर प्यार से अजय का कान पकड़ते हुए बोले, "नालायक छोरा! थूं कुछ ज्यादा ही बोलणो लाग गयो है। बूढ़े होसी म्हारा दुश्मन और थूं। म्हैं तो अभी पूरा का पूरा जवान हूँ, समझ्यो थूं?"
इतना कहकर मामा जी ज़ोरों से हँसने लगे। उनकी हँसी पूरे प्लेटफॉर्म पर गूँज उठी। मामा जी को हँसते हुए देख अजय भी हँसने लगा। दोनों की हँसी से स्टेशन का माहौल थोड़ा हल्का हो गया।
कुछ देर बाद, मामा जी ने अजय का बैग उठाया और दोनों स्टेशन से बाहर निकल गए। बाहर एक पुरानी जीप खड़ी थी, जो शायद मामा जी की थी। जीप में बैठकर वे गाँव की ओर चल पड़े। रास्ते में अजय ने मामा जी से दिल्ली के बारे में पूछा, और मामा जी ने उसे वीरानगढ़ के बारे में कुछ बातें बताईं।
"अजय, वीरानगढ़ एक पुरानो गाँव है। इठै लोग खेती-बाड़ी करे है, और म्हारा रीति-रिवाज भी पुराना है। थनैं दिल्ली जसी चमक-धमक तो नीं मिलसी, पर शांति और सुकून खूब मिलसी।" मामा जी ने कहा।
अजय ने खिड़की से बाहर देखा। धूल भरी सड़कें, कच्चे घर, और दूर-दूर तक फैले खेत। कुछ बच्चे गलियों में खेल रहे थे, और कुछ महिलाएँ सिर पर पानी के घड़े लिए जा रही थीं। ये सब अजय के लिए एक नया अनुभव था। उसने देखा कि कुछ घरों के बाहर अजीब से निशान बने हुए थे, और कुछ पेड़ों पर रंग-बिरंगे धागे बंधे हुए थे। ये सब देखकर उसे थोड़ी उत्सुकता हुई, लेकिन उसने सोचा कि ये शायद गाँव की कोई पुरानी परंपरा होगी।
लगभग आधे घंटे की यात्रा के बाद, जीप एक बड़े से कच्चे घर के सामने रुकी। ये मामा जी का घर था। घर भी पुराना था, लेकिन साफ-सुथरा और व्यवस्थित। बाहर एक नीम का पेड़ था, जिसकी ठंडी छाया घर के आँगन पर पड़ रही थी।
घर पहुँचकर अजय अपनी मामी जी और उनके इकलौते बेटे मयंक से मिला। मामी जी, सुशीला देवी, एक सीधी-सादी और ममतामयी महिला थीं। उन्होंने अजय को देखते ही प्यार से गले लगा लिया।
"आ गयो म्हारा लाडला! म्हैं तो थारी बाट देख रही ही। सफर कैसो रह्यो?" मामी जी ने पूछा।
"ठीक था मामी जी, बस थोड़ा लंबा था," अजय ने जवाब दिया।
मयंक, जो अजय से लगभग दो साल छोटा था, वो भी अजय को देखकर खुश हुआ। वो अजय का ममेरा भाई था और दोनों बचपन से एक-दूसरे के साथ खूब खेले थे।
"और भाई, कैसो है? दिल्ली री हवा लाग गी थनैं?" मयंक ने मज़ाक में कहा।
"हाँ भाई, दिल्ली की हवा तो लग गपई है, पर अब वीरानगढ़ की हवा भी लेनी है," अजय ने हँसते हुए कहा।
मामी जी ने अजय को गेस्ट रूम में ले जाकर फ्रेश होने और आराम करने को कहा। कमरा भी साधारण था, लेकिन साफ-सुथरा। एक पुराना पलंग था जिस पर एक साफ चादर बिछी थी, और एक छोटी सी खिड़की थी जिससे बाहर का नज़ारा दिख रहा था।
अजय ने अपना बैग रखा, फ्रेश हुआ, और पलंग पर लेट गया। दिन भर की यात्रा की थकान उसे महसूस होने लगी थी। उसकी आँखें बंद होने लगीं, लेकिन उसके दिमाग में वीरानगढ़ की पहली झलक घूम रही थी – धूल, शांति, और कुछ अनजाने रहस्य। उसे नहीं पता था कि ये गाँव उसके लिए क्या कुछ छिपाए बैठा है।
🔥 अजय को वीरानगढ़ की पहली झलक में जो अजीब से निशान और रंग-बिरंगे धागे दिखे, क्या उनका संबंध गाँव के किसी गहरे रहस्य से है?
🔥 मामा जी ने वीरानगढ़ को "पुरानो गाँव" और "रीति-रिवाज भी पुराना है" क्यों कहा? क्या इन पुराने रीति-रिवाजों में कुछ ऐसा छिपा है जो अजय के लिए खतरा बन सकता है?
🔥 अजय के मन में जो "अनजाने रहस्य" की बात घूम रही थी, क्या वो सिर्फ उसकी कल्पना थी या वीरानगढ़ में वाकई कोई अनजानी शक्ति उसका इंतज़ार कर रही है?
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