जो कहा नहीं गया – भाग 7
(मौन की सीढ़ियाँ)
स्थान: प्रयाग से काशी की ओर
समय: उसी रात
संगम की लहरों में ताबीज खोने के बाद रिया कुछ देर किनारे खड़ी रही। हवा में नमी थी, और उस नमी में जैसे कोई अदृश्य स्वर बार-बार उसके कानों में फुसफुसा रहा था — "अगला संकेत… वह नहीं देगा… तुम्हें खुद खोजना होगा।"
डायरी उसके हाथ में थी, लेकिन अब उसके पन्नों का रंग पहले से और मटमैला लग रहा था, मानो समय खुद उसकी स्याही को पी रहा हो। उसने पृष्ठ पर अंक "7" को देखा और मन ही मन सोचा — क्या यह कोई तारीख है, कोई स्थान, या फिर… कोई सीढ़ी?
उसी समय किनारे पर खड़े एक नाविक ने पुकारा —
"माँ, काशी जाना है? अभी रात की धारा तेज है, मगर नाव ले जाऊँगा।"
रिया ने सिर हिला दिया, लेकिन भीतर से एक बेचैनी उठी — काशी… तुलसी घाट… और वो धड़कनें। उसने नाव में कदम रखा। नाव गंगा के अंधेरे पानी में तैरने लगी। ऊपर आसमान में बादलों के बीच आधा चाँद, और दूर कहीं मंदिर की घंटियों की धीमी गूँज…
नाव बीच धारा में पहुँची तो अचानक पानी के नीचे से एक अजीब-सी खड़खड़ाहट सुनाई दी। नाविक ने चप्पू रोक दिए।
"ये आवाज़…?" रिया ने पूछा।
नाविक की आँखें सिकुड़ गईं —
"ये गंगा के नीचे से आती है, जब कोई पुराना मंदिर डूबा हो… कहते हैं, वहाँ कुछ आत्माएँ अब भी आरती उतारती हैं।"
रिया की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। उसने पानी की सतह पर झुककर देखा — और क्षण भर को, उसे लगा कि नीचे, गहरे अंधेरे में, कोई आकृति खड़ी है… बस उसकी ओर देखती हुई।
नाव काशी किनारे लगी। रिया उतरकर तुलसी घाट की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। रात का सन्नाटा टूटता केवल लहरों के थपेड़ों और दूर-दराज के मंत्रोच्चार से था।
ऊपर पहुँचते ही उसे एक पीतल का दीपक दिखाई दिया, जो जल रहा था, लेकिन उसके चारों ओर कोई नहीं था। दीपक के पास एक कागज़ रखा था।
उस पर केवल दो शब्द लिखे थे —
"मौन सीढ़ियाँ"
रिया को याद आया — तुलसी घाट के पीछे एक पुराना रास्ता था, जिसे लोग मौन सीढ़ियाँ कहते थे, क्योंकि वहाँ पर जाने वाला अपनी आवाज़ खो देता था… मानो दीवारें ही आवाज़ सोख लेती हों।
वह उस संकरे रास्ते में उतरी। हर कदम के साथ शहर का शोर फीका होता गया। बस उसकी साँसों की आहट बची।
सीढ़ियों के अंत में एक छोटा-सा दरवाज़ा था, आधा टूटा हुआ। उसने उसे खोला — और भीतर अँधेरा।
अँधेरे में कदम रखते ही उसे लगा, कोई उसके कंधे के पास से गुज़रा। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
अचानक सामने एक लालटेन जली, और उसकी रोशनी में, पत्थर की दीवार पर कुछ उभरा —
"राध्या"
उसने हाथ बढ़ाकर उस नाम को छूना चाहा, लेकिन तभी लालटेन बुझ गई। अंधेरे में एक आवाज़ गूँजी —
"अगर सच जानना चाहती हो… तो सुबह सातवें प्रहर लौटना।"
रिया ने मुड़कर देखने की कोशिश की, पर वहाँ कोई नहीं था। बस दीवार की ठंडी नमी और उस नाम की अदृश्य छाप उसके हाथ में रह गई।
वह सीढ़ियों से बाहर आई तो आसमान में पहली किरणें उग रही थीं। गंगा का जल लालिमा से भर गया था।
लेकिन रिया का मन अब और भारी हो गया था — क्योंकि अब वह जान चुकी थी कि यह खोज, केवल किसी प्रेमी की तलाश नहीं… शायद किसी अधूरी प्रतिज्ञा को पूरा करने की शुरुआत थी।
और दूर घाट के कोने पर, एक छाया खड़ी थी… बिल्कुल स्थिर, जैसे उसकी हर हरकत पर नज़र रख रही हो।
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