चैप्टर 5 – जुर्म की गंध
रात का अँधेरा गहराता जा रहा था।
बारिश थम चुकी थी, लेकिन शहर की सड़कों पर अब भी नमी और सन्नाटा पसरा हुआ था।
उस रात बिज़नेसमैन संजय मेहरा की चीख़ पूरे मोहल्ले ने सुनी।
लोग भागकर उसके बंगले के बाहर पहुँचे।
दरवाज़ा खुला और अंदर का मंजर किसी डरावने सपने जैसा था—
फर्श पर खून की लकीरें, और संजय मेहरा की लाश, उसके सीने में चाकू धंसा हुआ।
पुलिस पहुँची। जाँच शुरू हुई।
लेकिन हैरानी की बात ये थी कि कत्ल की रात किसी ने अरुण को उसी इलाके में घूमते हुए देखा था।
किसी ने कहा—
“हाँ, मैंने उसे गली के मोड़ पर देखा था… जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो।”
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फँसाया हुआ सबूत
दो दिन बाद पुलिस अरुण के हॉस्टल पहुँची।
उसका दरवाज़ा खोला गया, अलमारी खंगाली गई।
अचानक इंस्पेक्टर सागर ने हाथ में एक प्लास्टिक बैग उठाया।
उसमें खून से सना चाकू था।
पूरा कमरा सन्न हो गया।
अरुण वहीं खड़ा काँप रहा था—
“ये… ये यहाँ कैसे आया? ये मेरा नहीं है!”
इंस्पेक्टर सागर ने ठंडी नज़र से कहा—
“तुम्हारा नहीं? तो फिर तुम्हारे कमरे में मिला कैसे? लगता है बहुत चालाक समझते हो खुद को…”
और उसी वक़्त अरुण को हथकड़ी डाल दी गई।
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रिया की चीख़
जब रिया को खबर मिली, वो दौड़ी-दौड़ी थाने पहुँची।
“नहीं! अरुण ऐसा नहीं कर सकता। वो मासूम है… आप लोग ग़लत कर रहे हैं!”
लेकिन पुलिस की नज़र में मोहब्बत की चीख़ों की कोई कीमत नहीं थी।
सारे सबूत अरुण की ओर इशारा कर रहे थे।
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चैप्टर 6 – गिरफ़्तारी और अदालत का खेल
अदालत का माहौल भारी था।
अरुण को हथकड़ियों में लाया गया।
भीड़ में लोग फुसफुसा रहे थे—
“कितना शरीफ़ बनता था… देखो निकला क्या।”
“प्यार का दिखावा, और असल में क़ातिल।”
अरुण ने सिर झुका लिया।
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कोर्ट की कार्यवाही
सरकारी वकील ने सबूतों के ढेर पेश किए।
“माननीय जज साहब,
1. हत्या का हथियार अरुण के कमरे से मिला।
2. गवाहों ने उसे वारदात की रात घटनास्थल के पास देखा।
3. और मोबाइल की लोकेशन भी उसी क्षेत्र में थी।
क्या ये सबूत किसी अपराधी को दोषी ठहराने के लिए काफ़ी नहीं हैं?”
जज ने अरुण की तरफ देखा।
“क्या कहना चाहते हो?”
अरुण काँपती आवाज़ में बोला—
“साहब, मैंने कोई कत्ल नहीं किया। किसी ने मुझे फँसाया है।
मैं… मैं बस रिया से मिलने आया था उस इलाके में।”
अदालत में खुसर-फुसर होने लगी।
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रिया की पुकार
रिया गवाह के कटघरे में आई।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“जज साहब, अरुण निर्दोष है। वो कभी किसी की जान नहीं ले सकता।
मैं उसे जानती हूँ… वो मासूम है।”
लेकिन जज ने सख़्त आवाज़ में कहा—
“ये अदालत है, यहाँ भावनाएँ नहीं, सबूत चलते हैं।”
रिया टूटकर ज़मीन पर बैठ गई।
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चैप्टर 7 – उम्रकैद की सज़ा
कई सुनवाइयों के बाद आखिरकार फैसला सुनाया गया।
जज ने हथौड़ा बजाया—
“अदालत के अनुसार अभियुक्त अरुण दोषी पाया गया है।
उसे उम्रकैद की सज़ा दी जाती है।”
पूरा कोर्टरूम सन्न रह गया।
अरुण की आँखें पत्थर हो गईं।
उसने पीछे देखा—रिया हाथ जोड़कर रो रही थी, उसकी चीख़ पूरे कोर्ट में गूंज रही थी।
“नहीं… अरुण को मत ले जाओ… वो बेगुनाह है!”
पुलिस अरुण को खींचते हुए बाहर ले गई।
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जेल की रात
जेल की अंधेरी कोठरी में अरुण दीवार से लगकर बैठा था।
उसकी हथेलियाँ अब भी कांप रही थीं।
उसने कोने से कागज़ और पेन उठाया और लिखा—
"मेरी मोहब्बत सच्ची थी, लेकिन दुनिया ने उसे गुनाह बना दिया।
सलाखों में क़ैद हो गया मैं… और रिया की आँखों में मेरी बेगुनाही।"